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'निर्णायक मोड़ होगा' अफगान राष्ट्रपति चुनाव

Fri, 04 Apr 2014 07:57 AM IST
लिज डूसेट/अंतरराष्ट्रीय मामलों की मुख्य संवाददाता
लिज डूसेट/अंतरराष्ट्रीय मामलों की मुख्य संवाददाता Updated Fri, 04 Apr 2014 07:57 AM IST
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Afghan presidential election will be decision maker

अफगानिस्तान में साल 2004 के राष्ट्रपति पद के चुनाव के बाद यह पहला मौका है जब इस बात पर कोई चर्चा नहीं हो रही कि अमेरिका का उम्मीदवार कौन है, बल्कि इस बात की चर्चा ज्यादा है कि राष्ट्रपति करजई का वफादार कौन हैं। कई लोग पूर्व विदेश मंत्री जाल्मई रसूल को करजई का वफादार मान रहे हैं।

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बीबीसी से हुई राष्ट्रपति करज़ई की बातचीत से पता चलता है इस मामले में उनकी सोच पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। फिलहाल राष्ट्रपति के महल में किसी भी तरह का बदलाव आने की संभावना कम दिखाई देती है। ऐसा लगता है कि आने वाले समय में भी राष्ट्रपति करज़ई महल के पर्दे के पीछे से अपना काम करते रहेंगे।
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अफगानिस्तान के मोबी मीडिया समूह के अध्यक्ष साद मोहसेनी का मानना है कि अफ़ग़ानिस्तान में ऐसे लोगों की संख्या ज़्यादा है जो अभी भी अनिश्चितता की स्थिति में हैं।
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उम्मीदवारों की रणनीतियां

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साद कहते हैं, "ऐसे मतदादातों का संख्या 30 से 40 प्रतिशत तक हो सकती है।" मोबी समूह का टीवी चैनल 'टोलो' अफ़ग़ानिस्तान में बहुत लोकप्रिय है। चुनाव में उम्मीदवारों की रणनीतियों के विषय में पूछने पर साद ने कहा, "कई लोगों को मुफ़्त में भोजन मिलता है, तो कुछ लोगों को डराया-धमकाया भी जाता है।"

कुछ उम्मीदवार पुराने ढंग से भी चुनाव प्रचार कर रहे हैं। साद ने कहा, "उम्मीदवारों में से एक मेरे घर की सड़क पर आया और कहा, 'हैलो, मैं राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ रहा हूं। इसलिए आप मुझे वोट दें।' उसकी सादगी से प्रभावित काबुल के एक युवक ने कहा कि वो उसे ही वोट देगा।"

लेकिन उनकी मां का मानना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की सफलता के मद्देनज़र वो अपनी पसंद को गुप्त रखेंगी। अफगानिस्तान में लोकतंत्र अभी भी आरंभिक स्वरूप में है। इस विकसित होते लोकतंत्र की प्रक्रिया को अभी भी पुरानी परंपराएं जड़ से हिला सकती हैं। इस मुश्किल समय में जिस किसी के पास भी सत्ता आए उसके लिए एक स्पष्ट जनादेश का होना बहुत जरूरी है।

स्पष्ट जनादेश की जरूरत

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पिछले चुनाव में राष्ट्रपति करजई को कड़ी चुनौती देने वाले डॉक्टर अब्दुल्लाह अभी से ही बड़े पैमाने पर औद्यौगिक' घोटाले की बात कर रहे हैं। अभी से ही इस तरह की बातें चुनावी प्रक्रिया को संकट में डाल सकती हैं। मतदान पेटियों को ग़लत तरीके से भरने और जहाँ कोई नहीं रहता वहाँ भी मतदान केंद्र बनाने जैसी घटनाएं भी चिंता का विषय हैं।

2004 के चुनाव में भी इस तरह की घटनाएं सामने आई थीं। यह भी कहा जा रहा है कि चुनाव में भारी संख्या में मतदाता पत्र बांटे जा रहे हैं जो पंजीकृत मतदाताओं की संख्या से अधिक हैं, लेकिन पश्चिमी देशों के प्रेक्षक इस चुनाव की सराहना कर रहे हैं। उनकी मानें तो यह चुनाव बहुत मज़बूती से नियंत्रित और संतुलित है।

अफगान टेलीविज़न पर मतदाताओं को जागरूक करने और चुनाव में होने वाली धोखाधड़ी से बचने के लिए विज्ञापन के माध्यम से हिदायतें दी जा रही हैं। एक विज्ञापन में कहा गया है, ' चुनाव के बारे में सोचना अपने देश के बारे में सोचना है।' काबुल में गृह मंत्रालय के गेट पर और चुनाव आयोग के मुख्य परिसर में हुए तालिबानी हमलों ने सुरक्षा को लेकर आशंकाएं बढ़ा दी हैं।

लेकिन क्या यह सुरक्षित है?

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चुनाव अधिकारियों ने सीधे शब्दों में कहा "हम उनसे नहीं डरते।"अधिकारियों ने यह घोषणा उस वक़्त की जब चुनाव मुख्यालय पर हमले हो रहे थे। चुनाव अधिकारियों का कहना था, "यह तालिबान के लिए हमारा संदेश है।"तालिबान की धमकियों के बावजूद मतदाता पंजीकरण केंद्रों पर लोगों की बढ़ती क़तार उनकी धमकियों को चुनौती देती हुई लगती है।

दरअसल अफ़ग़ानिस्तान में होने वाले हर चुनाव पर बड़े धमाकों की आशंका का डर रहता है। यह चुनाव भी इससे अछूता नहीं है।अफगानिस्तान की खुफिया एजेंसियों ने आने वाले समय में और अधिक हमलों की आशंका जताई है। बहरहाल इस चुनाव में अफ़ग़ानी भिन्न शायद अलग मुद्दों पर वोट देंगे। गांवों और कबीलों में स्थानीय लोगों की वफ़ादारी असर करेगी तो तेज़ी से बदलते अफ़ग़ान के शहरी इलाक़ों में देश का भावी विकास मतदान पर ज़्यादा असर डालेगा।

अफगानिस्तान में पिछले कुछ हफ़्तों से यह बात ज़्यादा सुनी जा रही है कि सालों से युद्ध की त्रासदी झेल चुकी आबादी की 'मूक आवाज़ो' को अब आवाज मिलेगी। लेकिन क्या यह आवाजें 5 अप्रैल को चुनाव के दिन बोलेंगी। क्या सच में उनकी बातें सुनी जाएंगी। अफगानिस्तान के लिए यह एक और निर्णायक क्षण है।

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