{"_id":"d9b4732a594e78e6715eecf366a29e82","slug":"afghan-people-worried-about-2014","type":"story","status":"publish","title_hn":"साल 2014 से क्यों डर रहे हैं अफगान?","category":{"title":"Rest of World","title_hn":"बाकी दुनिया","slug":"rest-of-world"}}
साल 2014 से क्यों डर रहे हैं अफगान?
Updated Mon, 05 Aug 2013 04:15 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अफगानिस्तान से साल 2014 में विदेशी सेना सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी देश की सेना को सौंप कर वहां से रवाना हो जाएगी। नेटो सेना की वापसी के बाद वहां क्या होगा? इस बात को लेकर हर अफगान के चेहरे पर चिंता की एक लकीर साफ दिखाई देती है। बीबीसी संवाददाता ताहिर क़ादरी ने लोगों के डर को समझने की कोशिश की है।
विज्ञापन
आप शादी कब करेंगे?
हाल ही में जब काबुल दौरा हुआ तो मैंने अपने दोस्त से पहला सवाल यही पूछा।
मेरा ये मित्र कई सालों से एक लड़की से प्यार करते थे लेकिन शादी के सवाल पर उसका जवाब था।
''मैं साल 2014 का इंतजार कर रहा हूं। देखते हैं साल 2014 के बाद क्या होता है और उसके बाद ही मैं कोई फैसला लूंगा।''
''साल 2014 का इंतजार कर रहे हैं"। अफगानिस्तान में लोग जहां बच्चे के जन्म, शादी और मौत जैसी बातों से जूझ रहे हैं वहीं कहीं न कही उनके दिमाग के एक कोने में एक सवाल बार बार आ जाता है कि अंतत: जब देश से विदेशी सेना चली जाएगी तो क्या होगा?
विज्ञापन
सवाल
क्या तालिबान द्वारा की जा रही हिंसा की स्थिति और बिगडेगी? क्या हमारे सुरक्षाकर्मी जिम्मेदारी को निभा पाएंगे? कहीं देश वापस गृहयुद्ध की ओर तो लौट नहीं आएगा?
विज्ञापन
वे मुझ से पूछते हैं कि तुम लंदन से आए हो तुम क्या सोचते हो? क्या होने वाला है?
हां मैं लंदन में रहता हूं, और मुझ से यही सवाल कई बार और उतनी की गंभीरता से पूछा भी जाता है।
38 साल के अज़ीज शाह की कपड़े की दुकान शहर मज़ार-ए-शरीफ में है। उनका कहना है कि जिस तरह की अनिश्चतता और डर लोगों में है उसका असर ब्रिकी पर भी पड़ रहा है।
उन्होंने बीबीसी को बताया, ''जैसे लोग पहले खर्च करते थे अब उतना पैसा नहीं खर्च करते। सभी को साल 2014 की चिंता है।''
साल 1989 में जब सोवियत रुस की सेना ने अफगानिस्तान से वापसी की तो देश में गृह युद्ध में शुरु हो गया था।
लेकिन देश से विदेशी सेना की वापसी का मतलब केवल लोगों के दिलों में डर तक ही सीमीत नहीं है बल्कि इसका असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है।
असर
एक ज़माने में यहां घरों की कीमत में काफी उछाल आया था लेकिन अब भारी गिरावट आ गई है।
एक महीने पहले जिन घरों को विदेशी सेनाओं और सिवील कॉंट्रेक्टरों को हज़ारों डॉलर के किराए पर दिया गया था अब वे खाली पड़े हैं।
अब्दुल अहद हेरात प्रांत में एस्टेट एजेंट हुआ करते थे लेकिन प्रॉपर्टी की गिरती कीमतों के चलते उन्होंने अपना ये पेशा छोड़ दिया। अब वे क़ाबुल में नौकरी की तलाश कर रहे हैं।
वे कहते हैं, ''लोग नकद राशि बुरे दिनों के लिए बचा कर रख रहें हैं।''
क्लिक करें अफगानिस्तान में एक समय में बड़ी पार्टियों के लिए काफी प्रसिद्ध था। यहां कई बार एक पार्टी में 1,000 से ज्यादा मेहमान आते थे लेकिन अब इनकी संख्या सिमट कर 200 रह गई है।
एक होटल के मालिक मोहम्मद जलमई कहते हैं, ''एक साल पहले तक हम लोग खूब पार्टियां करते थे लेकिन अब लोग अपने घरों में रहना ही पसंद करते हैं।''
उदासी
यहां आप लोगों के चेहरे पर एक तरह की उदासी देख सकते हैं, जो काफी लाचार नजर आते हैं।
लेकिन आपका दृष्टिकोण इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप देश के किस भाग से आते हैं।
मोहम्मद कहते हैं,''देश के उत्तरी भाग में दक्षिण और पूर्व की तुलना में सुरक्षा से ज्यादा आर्थिक मुद्दों को लेकर ज्यादा लोग चिंतित हैं।''
वहीं ग्रामीण इलाकों में लोगों को साल 2014 से ज्यादा अपनी फसल की कटाई की ज्यादा चिंता है।
लेकिन कई सालों तक युद्ध के साए में रहने के बाद युवा अफगान नागरिक कई तरह की भूमिका निभा रहे हैं, वे एक से ज्यादा नौकरी ये सोचसमझ कर रहे है कि कहीं उनकी ये कोशिश देश में बदलाव ही ले आए।
महिलाओं की भूमिका
इस बीच फरीदा अकबर से मेरी मुलाकात हुई। ये उन चंद महिलाओं में से एक है जो ड्राइविंग करती है। फरीदा ने अपनी टोयोटा कार में मुझे काबुल का दौरा करवाया।
फरीदा ने मुझे बताया कि वे और महिलाओं के समूह मिलकर हदिया नाम की एक चैरेटी संस्था चलाती है जो शहरों की गलियों को साफ करने का काम करती है।
उनका कहना था, ''हम पौधे उगाते हैं, लोगों को भोजन देते है महिला दिवस के मौके पर हमने औरतों को फूल भी दिए थे।''
ये उन पीढ़ियों का उदाहरण है जिन्होंने एक दशक में अप्रत्याशित विदेशी हस्तक्षेप और निवेश को देखा है।
इस बीच कई लोग देश छोड़कर जाने पर भी विचार कर रहे हैं।
अहमद वली बताते है कि उन्होंने एक व्यक्ति को 15,000 डॉलर दिए है ताकि वो उसे तस्करी के जरिए जर्मनी भेज सके।
राष्ट्रपति करजई ने देश में फैल रही इस निराशा की भावना को लेकर चिंता भी जताई थी। उन्होंने लोगों से संयम बनाए रखने की भी अपील की थी और समझाया था कि साल 2014 के बाद कुछ नहीं होगा।
पिछले साल उन्होंने मीडिया की इस बात का प्रचार करने की आलोचना भी की थी। करजई ने इसे ''हमें डराने का एक तरीका बताया था।''
अफगानिस्तान में कई विश्लेषक उनकी इस बात से सहमत दिखते हैं। उनका भी मानना है कि इस डर को बढ़ा-चढ़ा कर बताया जा रहा है।
अफगान इंस्टिट्यूट फॉर स्ट्रेटजिक स्टडिस के देवूड मोरेदिएन कहते हैं, ''अफगानिस्तान में स्थायी स्थिरता लोगों के हाथ में है।''
वे अफगानिस्तान में राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव को वहां स्थाई स्थिरता का रास्ता समझते हैं।