फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   World ›   Pakistan ›   zihadi and anti india literature pakistan

पाकिस्तान: जिहादी और भारत विरोधी साहित्य की बिक्री जोरों पर

Sat, 10 Aug 2013 06:24 PM IST
Updated Sat, 10 Aug 2013 06:24 PM IST
विज्ञापन
zihadi and anti india literature pakistan

भारत विरोधी और जिहादी साहित्य पाकिस्तान में न सिर्फ़ प्रकाशित हो रहा है, बल्कि आसानी से उपलब्ध भी है। इसे कोई भी हासिल कर सकता है।

विज्ञापन


ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह प्रांत के शहर पेशावर में ज़्यादातर स्टॉलों पर पत्र-पत्रिकाओं के अलावा प्रतिबंधित जिहादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का मासिक अख़बार अल-क़लम और अफ़ग़ान जिहाद से जुड़ी 'शरियत' जैसी पत्रिकाएं खुलेआम बिकती हैं।

आप इन पत्र-पत्रिकाओं को न सिर्फ़ पेशावर में ख़रीद सकते हैं बल्कि ये देशभर में उपलब्ध हैं। साल 2003 में पूर्व सैन्य शासक परवेज़ मुशर्रफ़ के शासनकाल में सरकारी प्रतिबंध के बाद क़रीब छह प्रतिबंधित संगठनों ने सरकार की आंख में धूल झोंकने के लिए अपना नाम बदल लिया था।
विज्ञापन


वे अब भी देश भर में जिहादी साहित्य का प्रकाशन और वितरण बिना किसी रोक-टोक के जारी रखे हैं।

महिलाएं, युवा और बच्चों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए कम से कम तीन भाषाओं में कई पत्रिकाएं छप रही हैं, जिनके ज़रिए विशेष जिहादी विचारधारा फैलाई जा रही है।
विज्ञापन
विज्ञापन


हरकत' का अख़बार
एक मासिक जिहादी अख़बार और पत्रिका के संपादक ने अपनी पहचान न बताने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि ''पश्चिमी ताकतों और भारत के ख़िलाफ़ नफ़रत बढ़ाने और सांप्रदायिकता फैलाने वाला यह साहित्य' पाबंदी के बावजूद कैसे लोगों तक पहुंचाया जा रहा है।

उनका कहना है, ''इन पत्र-पत्रिकाओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए ज़िला स्तर, प्रांत स्तर और यहां तक कि क़स्बों में भी दफ़्तर खोले गए हैं। वहां ये पत्र पत्रिकाएं कार्यकर्ताओं को दी जाती हैं। फिर कार्यकर्ता इन्हें गांवों, क़स्बों और शहरों में लोगों में बांटते हैं।''

जिहादी अखबार जुमे यानी शुक्रवार के दिन देश भर की कई मस्जिदों में खुलेआम उपलब्ध होते हैं।

इस्लामाबाद में मौजूद लाल मस्जिद का जब चक्कर लगाया गया, तो वहां से अख़बार 'अल-निसार' हासिल हुआ, जो प्रतिबंधित जिहादी संगठन हरकत उल मुजाहिदीन से संबंधित है।

इसी संगठन ने सबसे पहले सोवियत संघ के ख़िलाफ़ अफ़ग़ानिस्तान की जंग में हिस्सा लिया था। प्रतिबंध के बाद अब इसका नाम अंसार उल उम्मा रख दिया गया है। संगठन के मुताबिक़ इस ग़ैरमान्यता प्राप्त अख़बार की हर महीने 30 से 35 हज़ार प्रतियां छपती हैं।

'अहम हथियार'
मस्जिद के बाहर 43 रुपए कीमत वाले इस अख़बार को बेचा नहीं जा रहा था बल्कि इसके बदले जिहाद के लिए खुलेआम चंदा मांगा जा रहा था।

इसके एक पाठक का कहना था, ''धार्मिक अख़बारों में उलेमा के बयान सही तरीके से छपते हैं। मीडिया उलेमा के बयान प्रकाशित नहीं करता। जितना भी मीडिया देश में मौजूद है, वह मानकर चलता है कि धार्मिक बयान नहीं छापने हैं।''

ग़ैरक़ानूनी जिहादी साहित्य न सिर्फ़ पाकिस्तान में बंट रहा है बल्कि इसका प्रकाशन भी पाकिस्तान में ही हो रहा है। ऐसी सामग्री छापने वाले कई संगठनों से बीबीसी ने बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने बातचीत से इनकार कर दिया।

इससे पहले कई प्रकाशनों पर कार्रवाई हो चुकी है, इसलिए प्रकाशक अब सतर्क हो गए हैं। ऐसे ही एक 'ग़ैरक़ानूनी अख़बार' के संपादक इस तरह के प्रकाशनों को अहम हथियार मानते हैं।

उन्होंने कहा, ''इन प्रकाशनों का असल मक़सद तो लोगों को जिहाद की तरफ खींचना होता है। ख़ासतौर पर मीडिया के इस दौर में हमारे अख़बार और पत्रिकाएं बहुत प्रभावशाली साबित हो रहे हैं और हमारे संगठन का 70 फ़ीसदी प्रचार इन्हीं अखबारों और पत्रिकाओं से होता है। इसलिए ये हमारे लिए बहुत अहम हथियार हैं।''

जिहादी साहित्य का असर
इन संपादक के मुताबिक इन्हें पढ़ने वाले बहुत से लोग जिहाद की तरफ़ आकर्षित हुए हैं।

वह कहते हैं, ''हज़ारों की तादाद में लोग हमारे पास इन्हें पढ़ने के बाद आए हैं। नए कार्यकर्ताओं को जुटाने के लिए ये अहम साधन हैं। बहुत से लोग इन्हें पढ़कर आकर्षित होते हैं। ये लोग हमें फ़ोन करते हैं, पत्र भेजते हैं और हमें पसंद करते हैं।''

सरकार से ग़ैरमान्यता प्राप्त अपने प्रकाशन के बारे में इन संपादक का कहना था, ''ये चरण काफी मुश्किल होता है और अतीत में संगठनों पर लगे प्रतिबंध भी राह की रुकावट बन सकते हैं। हमें कार्यकर्ताओं से संपर्क भी रखना होता है। इसलिए पंजीकरण कराए बिना ही संगठन प्रकाशन और वितरण का सिलसिला जारी रखते हैं।''


विशेषज्ञों के मुताबिक चरमपंथ के शिकार पाकिस्तान में नफ़रत और ख़ास जिहादी उद्देश्यों पर आधारित ऐसे अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं की वजह से और अशांति फैलने का खतरा है। इसलिए यह जानना बहुत ज़रूरी है कि सरकार की नाक के नीचे संगठन कैसे यह काम जारी रखे हैं। 

-इरम अब्बासी, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get latest World News headlines in Hindi related political news, sports news, Business news, Crime all breaking news and live updates. Stay updated with us for all latest Hindi news.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed