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पाकिस्तान के राष्ट्रपति ममनून हुसैन गायब?

Tue, 04 Mar 2014 04:17 PM IST
हारून राशिद/बीबीसी उर्दू, इस्लामाबाद
हारून राशिद/बीबीसी उर्दू, इस्लामाबाद Updated Tue, 04 Mar 2014 04:17 PM IST
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हालांकि राष्ट्रपति भवन में ममनून हुसैन के अभी छह महीने ही बीते हैं लेकिन पाकिस्तानी आवाम के बीच उनके गायब रहने को लेकर तरह तरह के चुटकुले चल पड़े हैं। यहां तक कि किसी ने एक काल्पनिक विज्ञापन ट्वीट कर उनके बारे में सूचना देने के लिए अपील की है। पाकिस्तान के लिए यह एक बदलाव की तरह है, क्योंकि हुसैन अपने पिछले दो पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों से ज्यादा अलग नहीं हो सकते थे। लेकिन पाकिस्तान के 73 वर्षीय राष्ट्रपति दृढ़निश्चय के साथ शांत बने हुए हैं, वैसे ही जैसे उन्होंने अब तक पूरी तरह से गैर विवादित कार्यकाल बिताया है।

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हालांकि अब राष्ट्रपति कार्यालय की महत्ता महज औपचारिक ही रह गई है और सभी कार्यकारी शक्तियां प्रधानमंत्री के पास चली गई हैं। हुसैन के पूर्ववर्ती आसिफ़ अली ज़रदारी अपने पूरे कार्यकाल के दौरान लगातार विवादों और मुश्किलों से घिर रहे। उन पर विदेशी बैंक खातों में धन रखने और पद का राजनीतिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल करने का आरोप लगा। अदालत और मीडिया ने उन्हें पूरे समय रक्षात्मक बनाए रखा।
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उनसे पहले पूर्व सैन्य तानाशाह जनरल परवेज़ मुशर्रफ, सभी शक्तियां राष्ट्रपति के हाथ में रखने के लिए सुर्खियों में रहे।

नाम के मुखिया

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लेकिन हुसैन केवल नाम के लिए ही राष्ट्र के मुखिया हैं। जब प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कराची के एक कम जाने पहचाने बिजनेसमैन को राष्ट्रपति पद के लिए नामित किया तो कई लोगों का मानना था कि उन्हें उनकी वफादारी का इनाम दिया गया। जब मैं ममनून हुसैन से मिला तब पता चला कि शरीफ के लिए उनके दिल में कितनी जगह है। लेकिन इस बात पर कि वे इन दिनों प्रधानमंत्री से अक्सर मिल पाते हैं, उन्होंने दुख जताते हुए इसका नकारात्मक जवाब दिया।

''महीने में एक बार ही उनसे मुलाकात हो पाती है। इन दिनों प्रधानमंत्री काफी व्यस्त चल रहे हैं इसलिए मुझसे मिलने नहीं आ सकते, जबकि प्रोटोकाल की वजह से मैं उनके यहां नहीं जा पाता हूं।'' और अब उन्हें, नकदी से जूझ रहे पाकिस्तान की सबसे आलीशान, यह जगह भी पिंजड़े के समान लगने लगी है। उन्होंने खाने की मेज पर मुझे बताया,''मैं पहले की तरह खरीदारी के लिए बाहर नहीं जा सकता। मैंने कबायली इलाकों के दौरे के लिए कहा था लेकिन मेरे सुरक्षाकर्मियों ने मुझसे कहा कि सुरक्षा कारणों से मैं इस समय नहीं जा सकता।''

संवैधानिक रूप से राष्ट्रपति पर, केंद्रीय प्रशासन के अधीन आने वाले अफ़गानिस्तान से सटे अशांत कबायली इलाकों की जिम्मेदारी होती है।

ममनून के लक्ष्य

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उनके पूर्ववर्ती राष्ट्रपति पांच सालों में एक बार भी कबायली इलाकों में कदम नहीं रखा और इसके लिए उनकी आलोचना हुई। लेकिन ममनून ने पहले से ही कुछ लक्ष्य बना रखे हैं। पहला, कबायली इलाकों को वो पोलियो मुक्त देखना चाहते हैं।

वो कहते हैं, ''मुझे डर है कि अगर हम पोलियो को नियंत्रित करने के लिए कोई उपचारात्मक उपाय नहीं करते हैं तो हमें अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को झेलना होगा।'' लेकिन इन इलाकों में चरमपंथियों से संघर्ष के मुद्दे पर कहने के लिए उनके पास खास कुछ नहीं है।

वो कहते हैं, ''हालांकि मैं इस तस्वीर में कहीं नहीं हूं और न ही मुझसे इस बारे में बात की जाती है लेकिन मुझे लगता है कि नवाज सरकार अब सुधार और संघर्ष की नीति अपनाएगी। उनके साथ बातचीत हो, जो इच्छुक हों और जो नुकसान पहुंचाएं, उन पर कार्रवाई हो।''

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'नवाज शरीफ अब नहीं मुस्कराते'

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कुछ साल पहले इसी तरह से मेरी मुलाकात आसिफ जरदारी से हुई थी। उनकी अपेक्षा, ममनून हुसैन राष्ट्रपति भवन के शांतिपूर्ण वातावरण में ज्यादा निश्चिंत लगे। इस भवन में जहां जरदारी की गतिविधि कुछ कमरों तक ही सीमित थी, वहीं वर्तमान राष्ट्रपति और उनके परिवार की पूरे भवन में दखल है। जरदारी ने हमें अपने कार्यालय में ही आमंत्रित किया जबकि हुसैन ने एक अलग डाइनिंग रूप में हमारे साथ भोजन किया।

राष्ट्रपति हुसैन बहुत सीमित राजनीतिक अतीत लिए हुए आए हैं। 1999 में वो महज पांच महीने तक सिंध प्रांत के गवर्नर रहे लेकिन वो पहले दिन से ही कट्टर मुस्लिम लीगी बने रहे। कम या ज्यादा ममनून हुसैन नवाज शरीफ के साथ खड़े रहे। वो स्वीकार करते हैं कि लगता है कि प्रधानमंत्री के चेहरे से मुस्कान गायब हो गई है, क्योंकि उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

''मुझे तब काफी हैरत हुई जब हाल ही में साढ़े पांच घंटे तक चली एक बैठक में वो एक सेकेंड के लिए भी नहीं मुस्कराए। जबकि इस तरह बैठकों में तनाव को कम करने के लिए वो अक्सर मजाक का सहारा लेते थे।''लेकिन हुसैन के लिए दैनिक जीवन में इस तरह का कोई तनाव नहीं है। वो 17 विश्वविद्यालयों के चांसलर हैं। अधिकारियों के साथ बैठकों और कार्यक्रमों का सिलसिला उन्हें व्यस्त बनाए रखता है और सीधी राजनीति से दूर भी रखता है।

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