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कैसे समझाएं इमरान खान को?

Mon, 07 Oct 2013 08:01 AM IST
Updated Mon, 07 Oct 2013 08:01 AM IST
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what happen with imraan khan?

पाकिस्तानी तालिबान अब और किसी ज़ुबान में इमरान ख़ान को समझाए कि उन्हें किसी क़िस्म की वार्ता में कोई दिलचस्पी नहीं है? अब तो वो भी सोचने लगे होंगे कि ये कैसा शख़्स है जिसके पल्ले कुछ पड़ता ही नहीं।

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पिछले दिनों पाकिस्तान से शायद ही किसी मामले पर इतनी राय आईं हों जितनी इमरान के इस प्रस्ताव पर कि तालिबान को पेशावर में दफ़्तर खोलने की इजाज़त दी जानी चाहिए। ये कोई ग़ैरमामूली बात नहीं क्योंकि हर मुल्क के नेताओं के बयानों पर लोग अक्सर ज़ोर-शोर से राय देते हैं।
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लेकिन इस बार एक चीज़ ज़रा अलग थी। उनकी इस राय पर हैरत, परेशानी, मायूसी, दुख और ग़ुस्से का इज़हार करने वाले किसी एक तबक़े या राजनीतिक सोच रखने वाले नहीं बल्कि हर तबक़े, हर क़िस्म की राजनीतिक सोच रखने वाले पाकिस्तानी थे।
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सिवाए उनके समर्थकों के उस समूह के जिसने सोशल मीडिया पर उनकी राय से मतभेद रखने वालों को अपशब्द कहना अपना सबसे बड़ा मक़सद बना लिया है।

कम ही ऐसे थे जिनको उनके इस बयान से मायूसी न हुई हो। राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने इसे या तो ग़ैरज़िम्मेदाराना बयान समझकर नज़रअंदाज़ कर दिया या इसका मज़ाक उड़ाया।

मौलाना फ़ज़लुर्रहमान ने कहा कि इमरान ख़ान का ये बयान बचकाना है जबकि आईएनपी के पूर्व मंत्री मियाँ इफ़्तेख़ार का कहा था कि इमरान ख़ान के होते हुए तालिबान को अपने दफ़्तर की क्या ज़रूरत है?

लेकिन तमाम वर्गों की ओर से इस प्रस्ताव का विरोध इतना गंभीर था कि तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी को भी इससे अलग होना पड़ा और पार्टी के वरिष्ठ नेता असद उमर ने इसे ख़ान की निजी राय बता दिया।

'अमन यानी मौत'

कई साल से जारी पाकिस्तानी तालिबान की खूनख़राबे की कार्रवाइयों ने पूरी दुनिया को समझा दिया है कि वो युद्ध अर्थव्यवस्था पर पलने वाली एक मिलिशिया है, जिसके लिए अमन का मतलब मौत है।

'तालिबान से बातचीत के मामले में इमरान ख़ान के सामने दो रास्ते हैं'
उनका बड़ा हिस्सा ऐसे छोटे-छोटे अपराधी गिरोहों से बना है, जिन्होंने हत्याओं और अपराध के अपने कारोबार को कारोबार बना लिया है।

उनकी धार्मिक कट्टरता और दक्षिणपंथी चरमपंथ सार्वजनिक रूप से अलोकप्रिय और अस्वीकार्य है। पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों से कहीं ज़्यादा पाकिस्तान के मुसलमान इनसे डरे-सहमे हुए हैं।

उनका अस्तित्व केवल इसमें है कि वो अराजकता के सहारे खूनख़राबे का खेल जारी रखें क्योंकि इसके अलावा न तो दुनिया को देने के लिए उनके पास कुछ है और न उनकी हिंसक सोच के लिए दुनिया में कोई नरम कोना। उनके लिए अमन की बात करना ख़ुद अपनी मौत को दावत देना है।

इमरान ख़ान या कोई और उनसे क्या बात करेगा? फ़र्ज़ कर लें कि दुनिया की यह राय बिलकुल ग़लत है और पाकिस्तानी तालिबान दरअसल बेहद धार्मिक लोग हैं, जो वास्तव में एक विशेष धार्मिक देश की स्थापना करना चाहते हैं। उनकी राय में यह उनका धार्मिक कर्तव्य है और इसके लिए वे जान देने और लेने को तैयार हैं।

ऐसे में इमरान ख़ान के पास दो रास्ते हैं। या तो तालिबान को मनाएं कि पाकिस्तान को ऐसे राष्ट्र में तब्दील करना नामुमकिन है, लिहाज़ा वो अपने रब से माफ़ी माँग लें कि वो अपना ये मूल धार्मिक कर्तव्य पूरा नहीं कर पाए और कयामत के दिन वो जन्नत जिसकी ख़ातिर उन्होंने हज़ारों बेगुनाहों को नर्क भेज दिया, अब उनकी पहुँच से बाहर है।

अगर यह मुमकिन नहीं तो फिर इमरान ख़ान को पाकिस्तानी जनता को राज़ी करना होगा कि तालिबानियत को इस्लाम समझते हुए क़ानून और संविधान की बात छोड़ें और खुद को ये समझते हुए मुल्ला उमर के हवाले कर दें कि यही अल्लाह की मर्ज़ी है और इसमें ही अमन और शांति है।


शायद सबके लिए बेहतर हो कि पाकिस्तानी तालिबान से वार्ता की बात करने से पहले इमरान ख़ान जनता को ये भी बता दें कि वार्ता के ज़रिए वो इनमें से कौन से रास्ते पर जाना चाहते हैं। कम से कम यह तो साफ़ हो जाएगा कि जब तक नेतृत्व इमरान खान के हाथ में है, इन दो रास्तों के अलावा कोई तीसरा रास्ता नहीं।

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