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अफगानिस्तानः पाक की चिंताएं क्या हैं?
Updated Sun, 14 Jul 2013 11:11 AM IST
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सालों तक लड़ने झगड़े के बाद अमेरिका और तालिबान तो बातचीत की मेज तक पहुंच गए लेकिन यह सवाल महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तान इस सिलसिले में कहां खड़ा है?
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अफगान राष्ट्रपति हामिद करज़ई के हालिया बयान और उस पर पाकिस्तानी चिंताएं बताती हैं कि दोनों पड़ोसी देशों के संबंधों में अभी 'सब कुछ ठीक नहीं’ है।
इस्लामाबाद में अफगान राजनयिक सूत्रों का कहना है कि उनकी दोस्ती को अब 'प्रोटोकॉल' यानी मुल्कों के बीच जो रिश्ते होते हैं, उस तक सीमित दोस्ती से आगे बढ़ना होगा।
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उनका कहना है कि अब समय है दोनों देशों के रिश्ते 'सार्थक' बनाए जाएं।
अफगानिस्तान की बढ़ती हुई बेचैनी का सबसे बड़ा कारण दबे शब्दों में कहा जाए तो वे उम्मीदें हैं जो उन्हें पाकिस्तान से हैं।
ये उम्मीदें पूरी नहीं हो पा रही हैं। यह कैसे हो सकता है?
तीन मांगें
इस बारे में अफगान सूत्रों का कहना है कि उन्होंने पाकिस्तान से तीन मुख्य मांगें की थी।
हालांकि इन तीनों मांगों पर कोई प्रगति नहीं हो पाई है।
पहली मांग यह थी कि पाकिस्तान की जेल में तालिबान सहित इस्लामी आंदोलन के संस्थापक सदस्य मुल्ला अब्दुल गनी भाईयों को रिहा किया जाए।
दूसरी मांग यह थी कि दोनों देशों के विद्वानों का संयुक्त सम्मेलन आयोजित कर जिहाद के अंत और आत्मघाती हमलों को इस्लाम विरोधी करार दिया जाए।
तीसरी मांग यह थी कि अफ़ग़ान सरकार का संदेश तालिबान तक पहुंचा दें। यानी अप्रत्यक्ष संपर्क करवा दें।
हालांकि पाकिस्तान का कहना है कि पहले भी दर्जनों तालिबान कैदी रिहा किए लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ है।
अक्सर रिहाई पाने वाले कैदी फिर युद्ध के मैदान में तालिबान से जाकर मिल गए और फिर दोबारा कार्रवाई शुरू कर दी।
उत्तरी गठबंधन
इस्लामाबाद में सरकारी सूत्र बताते हैं कि अब और कैदियों को रिहा नहीं किया जा सकता क्योंकि उनमें से हर कोई दोबारा जाकर लड़ने की बात करता है। वे लोग शांति वार्ता में भाग लेने की बात नहीं करते। ऐसे में कैदियों की और अधिक रहाई से शायद कोई फायदा नहीं होगा। उनका कहना है कि अफगान राष्ट्रपति दरअसल वहां विपक्ष की बोली बोल रहे हैं।
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जैसा कि अफगान राष्ट्रपति के ताजा बयान से स्पष्ट था कि वे अब भी पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों को शक की निगाह से देखते हैं।
जवाब में पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय का कहना था कि सभी विदेशी संस्थान राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति पर एक बोली बोलते हैं।
नवाज शरीफ सरकार से इस सिलसिले में वे कोई बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं करते।
एक अफगान अधिकारी ने कहा कि समस्या नवाज़ शरीफ नहीं बल्कि पाकिस्तानी संस्थाएं हैं।
हालांकि अफगान अधिकारियों के लिए सबसे बड़ी चिंता पाकिस्तान के उत्तरी गठबंधन से बढ़ते रिश्ते हैं।
अतीत के घाव
उन्हें इसमें भी किसी नई साजिश की बू आ रही है।
वह कहते हैं, "हमें बताया जाता है कि पाकिस्तान अतीत के घावों पर मरहम रख रहा है लेकिन बात कुछ अधिक गंभीर है।"
इसकी वजह उत्तरी गठबंधन (नॉर्दर्न एलायंस) के कुछ नेताओं का बगैर सूचना दिए पाकिस्तान आना जाना बताया जाता है।
उत्तरी गठबंधन के एक नेता से जब बगैर सूचना दिए पाकिस्तान जाने के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था, "इलाज के लिए आया हूं।"
लेकिन यह मालूम नहीं हो सका कि आखिर विदेश मंत्रालय की गाड़ी में उनके हवाई अड्डे से रवाना होने का क्या मतलब निकलता है।
यह चिंता को ही जन्म दे सकता है।
'गुपचुप खेलो'
अफगान मानते हैं कि पाकिस्तान लक्ष्मण रेखा पार कर रहा है।
अफगान अधिकारियों का कहना है कि वह जानना चाहते हैं कि आखिर पाकिस्तान की चिंताएं क्या हैं? वह ऐसा क्यों कर रहा है?
आखिर 'वह क्यों अनपढ़ तालिबान को पढ़े लिखे अफ़ग़ान लोगों की जगह ज्यादा तवज्जो दे रहा है।'
कुछ जानकारों का मानना है कि अविश्वास की समस्या केवल पाकिस्तान और अफ़ग़ान लोगों में ही नहीं है बल्कि बाकी दो पक्षों तालिबान और अमेरिका भी एक दूसरे के बारे में ऐसी ही राय रखते हैं।
चारों पक्ष प्रयासों के बावजूद एक दूसरे की 'गुपचुप खेलों' के बारे में अभी तक चिंता दूर नहीं कर सके हैं।
इसी का नतीजा है कि अफगानिस्तान ने कतर दफ्तर के मुद्दे पर नाराज होकर अमेरिका से सुरक्षा वार्ता स्थगित कर दी है।