{"_id":"a539b4785498da7033cbe1cbb7bf6f34","slug":"toy-gun-in-pakistan","type":"story","status":"publish","title_hn":"खिलौना बंदूके: पाक की नई परेशानी","category":{"title":"Pakistan","title_hn":"पाकिस्तान","slug":"pakistan"}}
खिलौना बंदूके: पाक की नई परेशानी
Updated Tue, 06 Aug 2013 08:55 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पाकिस्तान में ईद-उल-फितर को देखते हुए खिलौनों की बिक्री बढ़ गई है, लेकिन एक्सप्रेस ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के अनुसार कुछ खिलौने ऐसे भी हैं जो घातक हथियारों से मेल खाते हैं और उन्हें लेकर लोग बेहद चिंतित हैं।
विज्ञापन
कलाशनिकोव राइफल की तरह दिखने वाले ये खिलौने बच्चों में तो बेहद लोकप्रिय हो रहे हैं लेकिन समाज का एक वर्ग इन्हें बच्चों के भविष्य के लिए एक खतरे के रूप में देख रहा है।
विज्ञापन
पवित्र रमजान के मौके पर बच्चों को उपहार के रूप में ये खिलौना देना बहुत ही आम बात है, लेकिन लोगों की चिंता भी इसी बात को लेकर है कि ये खिलौना हथियार लोकप्रियता की लिस्ट में धीरे-धीरे सबसे ऊपर होता जा रहा है।
विज्ञापन
पाकिस्तान के दैनिक अखबार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून में इस खबर छपने और इसे खतरनाक खेल के रूप में पेश करने के बाद कराची स्थित पख्तूम स्वयंसेवी संगठन रानरा डेवेलपमेंट ट्रस्ट ने सोशल मीडिया पर एक अभियान शुरू किया और अभिभावकों से अपने बच्चों के लिए खिलौना बंदूकें न खरीदने की अपील की।
इस अभियान की शुरुआत पश्तूम बहुल इलाकों लांधी, बनारस, पुरानी सब्ज़ी मंडी और कीमारी में की गई है जहां ये गैर-सरकारी संगठन लोगों को इन खिलौना बंदूकों से खतोरं के प्रति जागरूक कर रहा है।
इसके लिए इस संगठन ने पोस्टरों और बैनरों का सहारा लिया है।
'अपराध का प्रशिक्षण'
संगठन के सदस्य मुहम्मद अरशद खान का कहना है, “अभिभावकों को लगता है कि ये सिर्फ खिलौने हैं, लेकिन उनका ये सोचना ग़लत है। वास्तव में इन खिलौनों के माध्यम से उनके बच्चे आगे चलकर अपराध के लिए प्रशिक्षित किए जा रहे हैं।”
वो कहते हैं, “ये बंदूकें बिल्कुल असली लगती हैं। यदि आप बंदूक खरीद रहे हैं, तो आप पांच साल के बच्चे को गोली भरने और बंदूक चलाने का ही प्रशिक्षण दे रहे हैं।”
एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने 24 जुलाई को अपनी रिपोर्ट में एक व्यक्ति को ये कहते हुए उद्धृत किया था, “खिलौना बंदूक का इस्तेमाल करने के बाद बच्चे असली बंदूक को भी आसानी से चलाना सीख जाते हैं।”
गैर सरकारी संगठन ने इस तरह की बंदूकों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। उत्तर पश्चिम इलाके में अभियान के संयोजक और मशहूर पश्तो कवि अमज़द शहज़ाद का मानना है कि बच्चों को बंदूक संस्कृति से बचाना चाहिए क्योंकि इससे आगे चलकर अराजकता की स्थिति पैदा होती है।
उनका कहना है कि बजाय बंदूकों के बच्चों को किताबें, कलम और ऐसी ही दूसरी चीजें देनी चाहिएं ताकि आगे चलकर वो बेहतर इंसान बन सकें।
उनका ये संदेश संयुक्त राष्ट्र में मलाला यूसुफजई के उस भाषण से मेल खाता है जिसमें उन्होंने कहा था, “एक कलम और एक किताब दुनिया को बदल सकते हैं।”
अमृता शर्मा/बीबीसी मॉनीटरिंग