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'वो मुझे मारते रहे और खुदा मुझे बचाता रहा'
टीम डिजिटल/अमर उजाला
Updated Wed, 18 May 2016 02:15 PM IST
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पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के दिवंगत गवर्नर सलमान तासीर के बेटे शहबाज तासीर
- फोटो : bbc
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पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के दिवंगत गवर्नर सलमान तासीर के बेटे शहबाज तासीर को 26 अगस्त 2011 को लाहौर से अगवा किया गया था। करीब साढ़े चार साल बाद अपहरणकर्ताओं के चंगुल से भागकर वो आठ मार्च 2016 अपने घर पहुंचे।
बीबीसी उर्दू की नौशीन अब्बासी को दिए एक खास इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि अपहरणकर्ताओं ने उन पर बहुत जुल्म किए। लेकिन इसके बावजूद खुदा को उनकी जिंदगी मंजूर थी और वो उन्हें बचाता रहा। उन्होंने ये भी बताया कि वो किस तरह बिना फिरौती अदा किए रिहा हुए और घर पहुंचे। साक्षात्कार के अंश
जब आप को अगवा कर के ले गए तो क्या उन्होंने आपको प्रताड़ित किया?
उन्होंने मुझे शुरू में कोड़े मारने शुरू किए। तीन-चार दिनों में उन्होंने मुझे पांच सौ से ज्यादा कोड़े मारे। इसके बाद मेरी कमर ब्लेडों से काटी। प्लास लेकर मेरी कमर से मांस निकाला। फिर मेरे हाथों और पैरों के नाखून निकाले। मुझे जमीन में दबा दिया। एक बार सात दिनों के लिए और एक बार तीन दिनों के लिए। फिर सिर्फ तीन दिन के लिए।
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वो मुझे भूखा रखते थे। मेरे पहरेदारों का रवैया बहुत बुरा था। उन्होंने मेरा मुंह सूई धागे से सी दिया। उन्होंने मुझे सात दिन या शायद दस दिन तक खाना ही नहीं दिया। मुझे सही से याद नहीं है कि कितने दिन। मेरी टांग पर गोली मारी गई। मैं बहुत खुश किस्मत हूं कि वो मेरी हड्डी को नहीं लगी और निकल गई।
मेरे मुंह पर शहद की मक्खियां बिठाईं गईं ताकि मेरे परिजनों को दिखा सकें कि मेरी शक्ल बिगड़ गई है। मुझे मलेरिया हो गया लेकिन मुझे दवाई नहीं दी गई। मुझे कहते थे कि हमें बैंक अकाउंट दो।
जब उन्होंने मेरा मांस बदन से काटा था तो, एक हफ्ते तक खून बहता रहा और जख़्म बंद नहीं हो रहा था। वो मुझसे बैंक अकाउंट मांगते रहते थे। उनमें रहम नहीं था। उनमें दिल नहीं था। मैं बस अल्लाह से सब्र की दुआ करता था। आखिर में मैं इतना सख़्त हो गया था कि मैं कहता कि जो करना है कर लो। अलहमदुलिल्लाह, मेरे अल्लाह ने खुद ही उत्पीड़न खत्म कर दिया।
वो फ़िल्म बनाने के लिए यातनाएं देते थे। मुझे एक दिन पहले ही कहते थे कि तैयारी करो कल ये होगा। मैं उनसे कहता था कौन सी तैयारी करूं, कैसे तैयारी करते हैं? मुझसे कहते थे कि कल तुम्हारे नाखून निकालेंगे। मैं पूरी रात नमाज पढ़ता था, नमाज के बाद निफ्ल और निफ्ल के बाद दुआ फज्र तक। मुझे लगता था कि वो मुझे चाहे जितना भी मारे, अल्लाह मेरी रक्षा कर रहा है, एक खोल में रखा हुआ है और वो उस खोल में दाखिल नहीं हो सकते हैं। न उनके शब्द और न ही उनके जिस्म।
आपकी रिहाई के लिए क्या कोई फिरौती दी गई?
नहीं, मैं वहां से भाग गया था। जेल में मुझे एक आदमी मिला, उसने मेरी मदद की, मुझे कचलाक पहुंचाने तक और कचलाक से मैंने अपने परिवार से संपर्क किया और उसके बाद सेना ने मुझे लिया और लाहौर पहुंचाया। मैंने पैसे तो नहीं दिए लेकिन जाते हुए मैंने उनके दस हज़ार रुपए ज़रूर लिए थे।
क्या आप ये बताएंगे कि आपको कितनी अलग अलग जगहों पर रखा गया और कितने समूहों के हवाले किया गया?
मैं सिर्फ़ एक समूह के साथ था और वो था इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज़्बेकिस्तान। मैं सिर्फ़ एक ही ग्रुप के पास रहा। उनके पास उस समय तक रहा जब तक अफ़ग़ान तालिबान और उज़्बेक ग्रुप की समर्थन को लेकर लड़ाई नहीं हुई थी। ये इसलिए हुआ था क्योंकि उज़्बेको ने इस्लामिक स्टेट के साथ जाने का फ़ैसला कर लिया था। क्योंकि उनकी नजर में वो सही खिलाफत थी न कि अफगान तालिबान की।
तब मैं अफगान तालिबान के हाथों में आ गया। मगर वो खुद भी नहीं जानते थे कि मैं कौन हूँ। मैंने उन्हें बहुत बार कहा कि मैं उज़्बेक नहीं हूँ। वो कहते थे कि मैं उज्बेक ही हूँ और मैंने उनके साथ लड़ाई लड़ी थी और इसलिए पकड़ा गया था इसलिए मुझे जेल में फेंको। तो ग्रुप तो इन उनके बीच लड़ाई से पहले एक ही था। दूसरा तो उस वक़्त तब्दील हुआ था। जिसकी वजह से ही मैं अलहमदुलिल्लाह रिहा हो सका।
मुझे लाहौर से वो मीर अली लेकर गए जो वज़ीरिस्तान में है। और मीर अली से मुझे हर महीने अलग-अलग स्थानों पर ले जाते रहते। मैं मीर अली में जून 2014 तक था। तब उज़्बेकों ने कराची एयरपोर्ट पर हमला किया था। उन्हें पहले से पता था कि सरकार और फौज बदले की क्या कार्रवाई करेगी। इसलिए उन्होंने मुझे स्वाल भेज दिया जिसका रास्ता शायद दत्ता खेल से जाता है। वहां मैं फरवरी 2015 तक रहा।
इसके बाद मुझे गोमल के रास्ते अफगानिस्तान के जाबिल ले जाया गया। वो जगहें बदलते रहते थे। कहीं एक महीने कहीं दो महीने। एक बार में ड्रोन हमले की वजह से डेढ़ साल तक एक परिवार के साथ रहा। किसी को पता ही नहीं था कि मैं कौन हूँ और शायद अफवाह भी उड़ी थी कि शहबाज़ तासीर ड्रोन हमले में मर चुके हैं। लेकिन अलहमदुलिल्लाह मैं बच गया।
सिर्फ ड्रोन हमले ही नहीं थे, जेट हमले भी थे। मैं अभी तालिबान के क़ब्ज़े से रिहा होने वाले हैदर गीलानी से मिलने गया था और मैं उन्हें कह रहा था कि आसमान से बहुत खौफनाक आवाजें आती थीं। उन्हें मेरी बातें समझ आ रही थीं मगर हमारे भाइयों के ये बातें समझ नहीं आ रही थीं। कभी कभार घंटों तक बमबारी होती है। आप कोई दिमागी तैयारी नहीं कर सकते, कुछ स्कूल में नहीं सीख सकते बस आपके बचने की हसरत आपको बचाती है।
मैं एक ड्रोन हमले की जद में था, ये उस वक़्त था जब अल क़ायदा के एक सीनियर कमांडर अबू याह्या अल लबी को ड्रोन हमले में मारे गए थे। मुझे तो बहुत बाद में पता चला। मैं उसके साथ ही एक दूसरे कमरे में था। जब ड्रोन हमला हुआ तो छत और दीवार मेरे ऊपर गिरी। लोग आए, उन्होंने मुझे देखा। मैं मलबे में दबा था। मिट्टी में अटा था लेकिन मेरा दम घुटा और मुझे खांसी आ गई।
एक उज़्बेक ने मुझे देखा और कहा कि इन लाशों को गाड़ी में डाल दो। इस तरह उसने मुझे दुनिया से भी छुपा दिया। मै इतना ज़्यादा घायल था कि दो महीने तक चल भी नहीं सकता था। उसने मुझे सब बताया कि तुम्हारे साथ अबु याह्या अल लबी था। वो जब मरा तो वो भूमिगत कमरे में था। आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई ड्रोन हमले में बच गया हो।
वो ख़ुद ये कहना नहीं चाह रहा था कि अल्लाह ने तुम्हें बचाया है। मैं बहुत खुश किस्मत था कि मैं दो ड्रोन हमलों में बचा। एक जेट हमले में मैं बम गिरने की जगह से सिर्फ सौ मीटर दूर ही था। मुझे नहीं मालूम कि मैं आपके सामने कैसे जिंदा सलामत बैठा हूँ।
तो फिर आप कैसे आजाद हुए, जरा विस्तार से बताएं?
जैसा कि मैंने बताया कि उज़्बेक का समर्थन अफगान तालिबान को था। जब ये ऐलान हुआ कि मुल्ला मोहम्मद उमर की मौत हो चुकी है तो उन लोगों ने कहा कि अफगान तालिबान की कोई वैधता नहीं रही। इराक और सीरिया में खिलाफत का ऐलान हो चुका है, अबु बकर अल बगदादी खलीफा हैं, अमीर हैं और हम उनका समर्थन करते हैं।
इससे उनमें आपस में तनाव हो गया। अफगान तालिबान ये समझते हैं कि मुसलमानों का अमीर सिर्फ अफगान तालिबान में से ही हो सकता है और उसे पठान होना चाहिए, पश्तून। इसके अलावा कोई भी उन्हें स्वीकार्य नहीं है।
जब उज़्बेक ने उनकी कानूनी हैसियत का विरोध किया तो उन्होंने उन्हें ही ख़त्म कर दिया। पूरे समूह को खत्म किया। पूरे नेतृत्व को ख़त्म किया। तीन दिन वहां सिर्फ़ मौत थी। मुझे वहां से भागने का मौक़ा मिला और मैं भाग गया। मुझे पहाड़ पर चढ़ते हुए अफगान तालिबान ने पकड़ लिया। वो समझे की मैं उज़्बेक हूँ।
वो मुझे मारते हुए नीचे ले आए। मुझे दूसरे उज़्बेकों के साथ कैदी बनाकर साथ बिठाया। फिर एक गांव में भेजा गया, जहां काजी आए और उन्होंने सजाएं सुनाईं। हमें छह महीने से दो साल तक की सजाएं सुनाई गईं और एक अफगान जेल में भेजा गया।
उधर, मुझे एक अफगान तालिबान मिला, उसने मेरी मदद की। उसमें थोड़ा वक्त लगा। दो-तीन महीने। लेकिन उसने मेरे लिए एक रास्ता खोला जिसकी वजह से मैं जेल से निकला और अफगानिस्तान से कचलाक मोटरसाइकिल से आया। उसमें मुझ आठ दिन लगे।
मैं 29 फरवरी को निकला और मैंने आठ मार्च को घर फोन करके कहा था कि मैं आ गया हूं। मुझे ये पता नहीं चल रहा था कि ये कोई चाल है या उन्हें ये पता नहीं है कि मैं कौन हूँ और अपनी आजादी की तरफ जा रहा हूं। बहुत कशमकश थी।
पांच साल की कैद कौन भूल सकता है, लेकिन कोई ऐसा वाकया है जो आप कभी नहीं भूल पाएंगे?
एक रात रमज़ान के महीने में शवाल के इलाके में बहुत तेज बमबारी हो रही थी। दो बजे शुरू हुई थी। वहां रात को बहुत ठंड थी। रात को मुझे कहा गया यहां से निकलना है। एक शख्श को औरतों और बच्चों को सुरक्षित ठिकाने पर पहुँचाना था। वो औरतें सभी बच्चों को नहीं उठा सकीं। मुझे भी कहा गया था कि खुद ही बचना है।
अगर भागे तो खुद ही जिम्मेदार होगे। तीन बच्चे घर में ही रह गए। मैं उन्हें लेने वापस भागा। मैंने दो बच्चों को उठाया एक बच्ची मेरे साथ भागते हुए आई। वो बहुत डरी हुई थी। पहले वो चारपाई के नीचे से नहीं निकल रही थी। मैं वहां से निकल कर दो पहाड़ों के बीच सुरक्षित स्थान पर पहुंचा ही था कि औरतें आईं और मुझसे बच्चे लिए और मेरा शुक्रिया अदा किया।
उनको पता था कि मैं उस वक़्त भाग सकता था।लेकिन मेरी मानवता उस समय मुझे इजाज़त ही नहीं दे रही थी कि अपनी जान बचा लूं और तीन बच्चों को छोड़ दूं।
ख़ुदा का शुक्र है कि कुछ नहीं हुआ लेकिन ये नहीं हो सकता कि मैं किसी तरह जिम्मेदारी महसूस करूं कि वो मर गए और मैंने कुछ नहीं किया। इसलिए मैं वापस गया और उन्हें लाकर उनके परिजनों के हवाले कर दिया। जो कि मुझे अगवा करने वाले का परिवार था।
बरामद होने के बाद आपने सबसे पहले क्या किया?
नहारी खाई जो सच है। कचलाक रेस्त्रां में कुछ नहीं खाया। आर्मी कंपाउड में आया तो उन्होंने कहा कि कुछ चाहिए, कॉफी-पानी तो मैंने कहा नहारी। मुमकिन हो तो लाहौर से मंगवा दें नहीं तो मैं आपकी बलोच नहारी भी खाने को तैयार हूँ।
अपने भविष्य को कैसे देखते हैं?
मैं बहुत सालों बाद ऐसे मुकाम पर पहुंचा हूं जहां अपने भविष्य का फैसला खुद कर सकता हूं। इसलिए मैं बस दोस्तों से मिल रहा हूं। परिवार के साथ वक्त बिता रहा हूं। मैं एक-एक कदम करके जिंदगी जी रहा हूं।
जब मैं यहां आ रहा था तो हम बर्फानी तूफान में फंसे थे और लग रहा था कि मर जाएंगे लेकिन उस वक्त मैं खुद को कहता रहा कि एक कदम और सही। इस वक्त मेरी जिंदगी भी ऐसी ही है मैं एक-एक कदम उठा रहा हूं।
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बीबीसी उर्दू की नौशीन अब्बासी को दिए एक खास इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि अपहरणकर्ताओं ने उन पर बहुत जुल्म किए। लेकिन इसके बावजूद खुदा को उनकी जिंदगी मंजूर थी और वो उन्हें बचाता रहा। उन्होंने ये भी बताया कि वो किस तरह बिना फिरौती अदा किए रिहा हुए और घर पहुंचे। साक्षात्कार के अंश
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उन्होंने मुझे शुरू में कोड़े मारने शुरू किए। तीन-चार दिनों में उन्होंने मुझे पांच सौ से ज्यादा कोड़े मारे। इसके बाद मेरी कमर ब्लेडों से काटी। प्लास लेकर मेरी कमर से मांस निकाला। फिर मेरे हाथों और पैरों के नाखून निकाले। मुझे जमीन में दबा दिया। एक बार सात दिनों के लिए और एक बार तीन दिनों के लिए। फिर सिर्फ तीन दिन के लिए।
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मेरे मुंह पर शहद की मक्खियां बिठाईं गईं ताकि मेरे परिजनों को दिखा सकें कि मेरी शक्ल बिगड़ गई है। मुझे मलेरिया हो गया लेकिन मुझे दवाई नहीं दी गई। मुझे कहते थे कि हमें बैंक अकाउंट दो।
जब उन्होंने मेरा मांस बदन से काटा था तो, एक हफ्ते तक खून बहता रहा और जख़्म बंद नहीं हो रहा था। वो मुझसे बैंक अकाउंट मांगते रहते थे। उनमें रहम नहीं था। उनमें दिल नहीं था। मैं बस अल्लाह से सब्र की दुआ करता था। आखिर में मैं इतना सख़्त हो गया था कि मैं कहता कि जो करना है कर लो। अलहमदुलिल्लाह, मेरे अल्लाह ने खुद ही उत्पीड़न खत्म कर दिया।
वो फ़िल्म बनाने के लिए यातनाएं देते थे। मुझे एक दिन पहले ही कहते थे कि तैयारी करो कल ये होगा। मैं उनसे कहता था कौन सी तैयारी करूं, कैसे तैयारी करते हैं? मुझसे कहते थे कि कल तुम्हारे नाखून निकालेंगे। मैं पूरी रात नमाज पढ़ता था, नमाज के बाद निफ्ल और निफ्ल के बाद दुआ फज्र तक। मुझे लगता था कि वो मुझे चाहे जितना भी मारे, अल्लाह मेरी रक्षा कर रहा है, एक खोल में रखा हुआ है और वो उस खोल में दाखिल नहीं हो सकते हैं। न उनके शब्द और न ही उनके जिस्म।
आपकी रिहाई के लिए क्या कोई फिरौती दी गई?
नहीं, मैं वहां से भाग गया था। जेल में मुझे एक आदमी मिला, उसने मेरी मदद की, मुझे कचलाक पहुंचाने तक और कचलाक से मैंने अपने परिवार से संपर्क किया और उसके बाद सेना ने मुझे लिया और लाहौर पहुंचाया। मैंने पैसे तो नहीं दिए लेकिन जाते हुए मैंने उनके दस हज़ार रुपए ज़रूर लिए थे।
क्या आप ये बताएंगे कि आपको कितनी अलग अलग जगहों पर रखा गया और कितने समूहों के हवाले किया गया?
मैं सिर्फ़ एक समूह के साथ था और वो था इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज़्बेकिस्तान। मैं सिर्फ़ एक ही ग्रुप के पास रहा। उनके पास उस समय तक रहा जब तक अफ़ग़ान तालिबान और उज़्बेक ग्रुप की समर्थन को लेकर लड़ाई नहीं हुई थी। ये इसलिए हुआ था क्योंकि उज़्बेको ने इस्लामिक स्टेट के साथ जाने का फ़ैसला कर लिया था। क्योंकि उनकी नजर में वो सही खिलाफत थी न कि अफगान तालिबान की।
तब मैं अफगान तालिबान के हाथों में आ गया। मगर वो खुद भी नहीं जानते थे कि मैं कौन हूँ। मैंने उन्हें बहुत बार कहा कि मैं उज़्बेक नहीं हूँ। वो कहते थे कि मैं उज्बेक ही हूँ और मैंने उनके साथ लड़ाई लड़ी थी और इसलिए पकड़ा गया था इसलिए मुझे जेल में फेंको। तो ग्रुप तो इन उनके बीच लड़ाई से पहले एक ही था। दूसरा तो उस वक़्त तब्दील हुआ था। जिसकी वजह से ही मैं अलहमदुलिल्लाह रिहा हो सका।
मुझे लाहौर से वो मीर अली लेकर गए जो वज़ीरिस्तान में है। और मीर अली से मुझे हर महीने अलग-अलग स्थानों पर ले जाते रहते। मैं मीर अली में जून 2014 तक था। तब उज़्बेकों ने कराची एयरपोर्ट पर हमला किया था। उन्हें पहले से पता था कि सरकार और फौज बदले की क्या कार्रवाई करेगी। इसलिए उन्होंने मुझे स्वाल भेज दिया जिसका रास्ता शायद दत्ता खेल से जाता है। वहां मैं फरवरी 2015 तक रहा।
इसके बाद मुझे गोमल के रास्ते अफगानिस्तान के जाबिल ले जाया गया। वो जगहें बदलते रहते थे। कहीं एक महीने कहीं दो महीने। एक बार में ड्रोन हमले की वजह से डेढ़ साल तक एक परिवार के साथ रहा। किसी को पता ही नहीं था कि मैं कौन हूँ और शायद अफवाह भी उड़ी थी कि शहबाज़ तासीर ड्रोन हमले में मर चुके हैं। लेकिन अलहमदुलिल्लाह मैं बच गया।
सिर्फ ड्रोन हमले ही नहीं थे, जेट हमले भी थे। मैं अभी तालिबान के क़ब्ज़े से रिहा होने वाले हैदर गीलानी से मिलने गया था और मैं उन्हें कह रहा था कि आसमान से बहुत खौफनाक आवाजें आती थीं। उन्हें मेरी बातें समझ आ रही थीं मगर हमारे भाइयों के ये बातें समझ नहीं आ रही थीं। कभी कभार घंटों तक बमबारी होती है। आप कोई दिमागी तैयारी नहीं कर सकते, कुछ स्कूल में नहीं सीख सकते बस आपके बचने की हसरत आपको बचाती है।
मैं एक ड्रोन हमले की जद में था, ये उस वक़्त था जब अल क़ायदा के एक सीनियर कमांडर अबू याह्या अल लबी को ड्रोन हमले में मारे गए थे। मुझे तो बहुत बाद में पता चला। मैं उसके साथ ही एक दूसरे कमरे में था। जब ड्रोन हमला हुआ तो छत और दीवार मेरे ऊपर गिरी। लोग आए, उन्होंने मुझे देखा। मैं मलबे में दबा था। मिट्टी में अटा था लेकिन मेरा दम घुटा और मुझे खांसी आ गई।
एक उज़्बेक ने मुझे देखा और कहा कि इन लाशों को गाड़ी में डाल दो। इस तरह उसने मुझे दुनिया से भी छुपा दिया। मै इतना ज़्यादा घायल था कि दो महीने तक चल भी नहीं सकता था। उसने मुझे सब बताया कि तुम्हारे साथ अबु याह्या अल लबी था। वो जब मरा तो वो भूमिगत कमरे में था। आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई ड्रोन हमले में बच गया हो।
वो ख़ुद ये कहना नहीं चाह रहा था कि अल्लाह ने तुम्हें बचाया है। मैं बहुत खुश किस्मत था कि मैं दो ड्रोन हमलों में बचा। एक जेट हमले में मैं बम गिरने की जगह से सिर्फ सौ मीटर दूर ही था। मुझे नहीं मालूम कि मैं आपके सामने कैसे जिंदा सलामत बैठा हूँ।
तो फिर आप कैसे आजाद हुए, जरा विस्तार से बताएं?
जैसा कि मैंने बताया कि उज़्बेक का समर्थन अफगान तालिबान को था। जब ये ऐलान हुआ कि मुल्ला मोहम्मद उमर की मौत हो चुकी है तो उन लोगों ने कहा कि अफगान तालिबान की कोई वैधता नहीं रही। इराक और सीरिया में खिलाफत का ऐलान हो चुका है, अबु बकर अल बगदादी खलीफा हैं, अमीर हैं और हम उनका समर्थन करते हैं।
इससे उनमें आपस में तनाव हो गया। अफगान तालिबान ये समझते हैं कि मुसलमानों का अमीर सिर्फ अफगान तालिबान में से ही हो सकता है और उसे पठान होना चाहिए, पश्तून। इसके अलावा कोई भी उन्हें स्वीकार्य नहीं है।
जब उज़्बेक ने उनकी कानूनी हैसियत का विरोध किया तो उन्होंने उन्हें ही ख़त्म कर दिया। पूरे समूह को खत्म किया। पूरे नेतृत्व को ख़त्म किया। तीन दिन वहां सिर्फ़ मौत थी। मुझे वहां से भागने का मौक़ा मिला और मैं भाग गया। मुझे पहाड़ पर चढ़ते हुए अफगान तालिबान ने पकड़ लिया। वो समझे की मैं उज़्बेक हूँ।
वो मुझे मारते हुए नीचे ले आए। मुझे दूसरे उज़्बेकों के साथ कैदी बनाकर साथ बिठाया। फिर एक गांव में भेजा गया, जहां काजी आए और उन्होंने सजाएं सुनाईं। हमें छह महीने से दो साल तक की सजाएं सुनाई गईं और एक अफगान जेल में भेजा गया।
उधर, मुझे एक अफगान तालिबान मिला, उसने मेरी मदद की। उसमें थोड़ा वक्त लगा। दो-तीन महीने। लेकिन उसने मेरे लिए एक रास्ता खोला जिसकी वजह से मैं जेल से निकला और अफगानिस्तान से कचलाक मोटरसाइकिल से आया। उसमें मुझ आठ दिन लगे।
मैं 29 फरवरी को निकला और मैंने आठ मार्च को घर फोन करके कहा था कि मैं आ गया हूं। मुझे ये पता नहीं चल रहा था कि ये कोई चाल है या उन्हें ये पता नहीं है कि मैं कौन हूँ और अपनी आजादी की तरफ जा रहा हूं। बहुत कशमकश थी।
पांच साल की कैद कौन भूल सकता है, लेकिन कोई ऐसा वाकया है जो आप कभी नहीं भूल पाएंगे?
एक रात रमज़ान के महीने में शवाल के इलाके में बहुत तेज बमबारी हो रही थी। दो बजे शुरू हुई थी। वहां रात को बहुत ठंड थी। रात को मुझे कहा गया यहां से निकलना है। एक शख्श को औरतों और बच्चों को सुरक्षित ठिकाने पर पहुँचाना था। वो औरतें सभी बच्चों को नहीं उठा सकीं। मुझे भी कहा गया था कि खुद ही बचना है।
अगर भागे तो खुद ही जिम्मेदार होगे। तीन बच्चे घर में ही रह गए। मैं उन्हें लेने वापस भागा। मैंने दो बच्चों को उठाया एक बच्ची मेरे साथ भागते हुए आई। वो बहुत डरी हुई थी। पहले वो चारपाई के नीचे से नहीं निकल रही थी। मैं वहां से निकल कर दो पहाड़ों के बीच सुरक्षित स्थान पर पहुंचा ही था कि औरतें आईं और मुझसे बच्चे लिए और मेरा शुक्रिया अदा किया।
उनको पता था कि मैं उस वक़्त भाग सकता था।लेकिन मेरी मानवता उस समय मुझे इजाज़त ही नहीं दे रही थी कि अपनी जान बचा लूं और तीन बच्चों को छोड़ दूं।
ख़ुदा का शुक्र है कि कुछ नहीं हुआ लेकिन ये नहीं हो सकता कि मैं किसी तरह जिम्मेदारी महसूस करूं कि वो मर गए और मैंने कुछ नहीं किया। इसलिए मैं वापस गया और उन्हें लाकर उनके परिजनों के हवाले कर दिया। जो कि मुझे अगवा करने वाले का परिवार था।
बरामद होने के बाद आपने सबसे पहले क्या किया?
नहारी खाई जो सच है। कचलाक रेस्त्रां में कुछ नहीं खाया। आर्मी कंपाउड में आया तो उन्होंने कहा कि कुछ चाहिए, कॉफी-पानी तो मैंने कहा नहारी। मुमकिन हो तो लाहौर से मंगवा दें नहीं तो मैं आपकी बलोच नहारी भी खाने को तैयार हूँ।
अपने भविष्य को कैसे देखते हैं?
मैं बहुत सालों बाद ऐसे मुकाम पर पहुंचा हूं जहां अपने भविष्य का फैसला खुद कर सकता हूं। इसलिए मैं बस दोस्तों से मिल रहा हूं। परिवार के साथ वक्त बिता रहा हूं। मैं एक-एक कदम करके जिंदगी जी रहा हूं।
जब मैं यहां आ रहा था तो हम बर्फानी तूफान में फंसे थे और लग रहा था कि मर जाएंगे लेकिन उस वक्त मैं खुद को कहता रहा कि एक कदम और सही। इस वक्त मेरी जिंदगी भी ऐसी ही है मैं एक-एक कदम उठा रहा हूं।