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पाक चुनावों पर मंडराता तालिबान का साया

Sat, 04 May 2013 06:14 PM IST
अहमद वली मुजीब
अहमद वली मुजीब Updated Sat, 04 May 2013 06:14 PM IST
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taliban shadow over pakistan election

पाकिस्तान में आम चुनावों को देखते हुए हिंसक घटनाएं बढ़ रही हैं। खासकर तीन प्रांतों में चुनावी अधिकारियों और उम्मीदवारों को निशाना बनाया जा रहा है।

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अफगानिस्तान से लगने वाले संघीय प्रशासित कबायली इलाके (फाटा), खैबर पख्तून ख्वाह और सिंध की राजधानी कराची में तालिबान ने उम्मीदवारों को निशाना बनाया है तो बलूचिस्तान में अलगाववादी चुनावी प्रक्रिया में बाधा पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।
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इनमें सबसे ताजा घटना शुक्रवार की है जब कराची में एएनपी के उम्मीदवार सादिक जमा खटक पर हमला हुआ जिसमें वो मारे गए।

तालिबान ने पाकिस्तान पीपल्स पार्टी, आवामी नेशनल पार्टी और मुत्तेहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) के खिलाफ जंग का एलान किया हुआ है, तो दूसरी तरफ बलूचिस्तान में पीएमएल (एन) जमात-ए-उलमा-इस्लाम (एफ) और बीएनपी (आवामी) के उम्मीदवारों पर बलोच चरमपंथी संगठन हमले कर रहे हैं।
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इन हमलों की वजह से न सिर्फ चुनाव प्रचार बुरी तरह प्रभावित हो रहा है, बल्कि डर और अविश्वास को बढ़ावा मिल रहा है।

तालिबान का खतरा
तालिबान के हमले चरमपंथ की सबसे ज्यादा मार झेल रहे प्रांत खैबर पख्तून ख्वाह तक ही सीमित नहीं है।कराची में भी उनके चरमपंथी सक्रिय हैं।

कराची को इसलिए भी संवेदनशील माना जा रहा है, क्योंकि यहां से वो तीन राजनीतिक पार्टियां चुनाव लड़ रही है जिन्हें तालिबान ने निशाना बनाने की धमकी दी है।

तहरीक-ए-तालिबान ने बीते दो महीनों के भीतर कराची में तीन बड़े हमले किए हैं। इन हमलों में आवामी नेशनल पार्टी और एमक्यूएम के चुनावी कार्यालयों को निशाना बनाया गया है। इन हमलों में 16 लोग मारे गए जबकि 40 घायल हो गए।

विश्लेषकों का कहना है कि इन घटनाओं का असर मतदान वाले दिन पर पड़ेगा। कराची में एक के बाद एक हमलों से जहां शहर में तालिबान के बढ़ते प्रभाव का अंदाजा होता है, वहीं सरकारी सुरक्षा एजेंसियों की विफलता भी खुल कर सामने आती है।

बलूचिस्तान के हालात
बलूचिस्तान में लंबे समय से अलगाववादी हमले होते रहे हैं। लेकिन चुनाव नजदीक आते देख इनमें इजाफा देखा जा रहा है।

क्वेटा में हाल में जिला चुनाव आयुक्त जियाउल्लाह कासमी के कत्ल के बाद पिछले महीने खारान और नोश्की में चुनाव आयोग के कार्यालयों को निशाना बनाया गया।

ताजा चुनावी हिंसा में सबसे बड़ी घटना 16 अप्रैल को हुई जब खज़दार में पीएमएल (एन) के प्रांतीय अध्यक्ष सनाउल्लाह ज़ेहरी के काफिले को निशाना बनाया गया, जिसमें उनके बड़े बेटे और भतीजे की मौत हो गई।

इस हमले की जिम्मेदारी प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन बलोच लिबरेशन फ्रंट ने ली।

इसके बाद 22 अप्रैल को जिला पंजगौर में बीएनपी (आवामी) की चुनावी रैली पर हमला किया गया जबकि 26 अप्रैल को बोलान के इलाके मझ में जेयूआई (एफ) के उम्मीदवार के काफिले पर गोलीबारी की गई जिसमें चार लोग मारे गए।


हमलों की वजह
तालिबान का कहना है कि वो पाकिस्तान पीपल्स पार्टी, एमक्यूएम और एनएनपी को इसलिए निशाना बना रहा है कि वो धर्मनिरपेक्ष हैं और पिछली सरकार में शामिल थीं।

तालिबान के प्रवक्ता एहसानुल्लाह एहसान का कहना है कि इन तीनों पार्टियों को छोड़ कर किसी और पार्टी से उनका कोई बैर नहीं है।

वहीं बलोच विद्रोहियों का कहना है कि वो बलूचिस्तान में किसी राजनीतिक प्रक्रिया को नहीं चलने देंगे। इसलिए वो चुनाव आयोग के दफ्तरों और उम्मीदवारों को निशाना बना रहे हैं। बलोच विद्रोहियों ने लोगों से चुनावों से दूर रहने को कहा है।

ऐसे में सवाल उठता है कि ऐसे हालता में होने वाले चुनाव कितने स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे और इनके बाद अस्तित्व में आने वाली राष्ट्रीय और प्रांतीय असेंबलियों का स्वरूप कैसा होगा।

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