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'क्या लाख रुपए की बात कही है साध्वी ने'

Mon, 08 Dec 2014 04:04 PM IST
Updated Mon, 08 Dec 2014 04:04 PM IST
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Sadhvi niranjan Jyoti said Well

जब अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट से पूछा गया कि वो निकारागुआ के तानाशाह अनास्तासियो समोजा की इतनी खुलकर हिमायत क्यों करते हैं तो उन्होंने कहा, "हां, वे हरामजादे हैं पर वो हमारे हरामजादे हैं।" अब अगर साध्वी निरंजन ज्योति रूजवेल्ट नहीं हैं तो इसमें उनका क्या कसूर। रूजवेल्ट ने तो माफी भी नहीं मांगी थी। साध्वी जी ने तो यह कहने पर माफी भी मांग ली कि "अब आपको यह तय करना है कि रामजादों को चुनेंगे कि......को।"

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मगर क्षमा चाहने के बाद भी पढ़े-लिखे लोग बेचारी साध्वी के पीछे लठ लिए घूम रहे हैं, ये कैसा अन्याय है? अगर फूड प्रोसेसिंग का मंत्री भी फूड फॉर थॉट नहीं उगल सकता तो फिर कद्दू का मंत्री।
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बयान का इनाम

वैसे सलाम है आप सबकी बुद्धि को। अगर गुजरात का कोई शहरवासी 2002 के दंगों पर अफसोस करते हुए ये कहे कि अगर कार के पहिए के नीचे कोई पिल्ला भी आ जाए तो दुख तो होता है तो आप उसे प्रधानमंत्री चुन लेते हो। अगर मुजफ्फरनगर के दंगों के संदर्भ में अमित शाह जैसा पढ़ा-लिखा शहरी बाबू ये कहे कि ये सम्मान और बदले की भावना का मामला है तो नफरत फैलाने के जुर्म में चुनाव आयोग की तरफ से चुनावी भाषणों पर पाबंदी के बाद भी सत्ता चलाने वाली पार्टी अमित जी को अपना प्रधान बना लेती है।
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अगर कोई आदरणीय गिरिराज सिंह ये कहे कि जो मोदी का विरोधी है वो गद्दार है उसे भारत छोड़ के पाकिस्तान में बस जाना चाहिए तो इनाम में उसे कोई केंद्रीय मंत्रालय थमा दिया जाता है।

साध्वी पर ही गुस्सा क्यों?

Sadhvi niranjan Jyoti said Well

आप शहरवासियों का गुस्सा बस गांव की एक बेचारी साध्वी निरंजन ज्योति पर ही क्यों निकलता है? जिन लोगों में वो दिन-रात उठती-बैठती हैं, उन्हें जो कुछ जितना भी सिखाया-पढ़ाया गया है और जो नजरिया बताया गया है उसी का तो वो पालन कर रही हैं।

अगर आप लोगों का कुम्हार पर वश नहीं चल रहा है तो गदहे के कान क्यों मरोड़ते हैं?

पाकिस्तानियों का दिल
आपसे ज्यादा खुले दिल के लोग तो यहां पाकिस्तान में हैं। इमरान खान भरे जलसे में नवाज शरीफ को चोर और जरदारी को लुटेरा कहते हैं। मौलाना फजलुर्रहमान इमरान खान को यहूदी एजेंट और जरदारी इमरान खान को एजेंसियों का आदमी कहते हैं। यहां कोई भी खुलकर किसी को गद्दार और देशद्रोही कह सकता है, उसे मुसलमान मानने से इनकार कर सकता है। पर मजाल है किसी के माथे पर शिकन आ जाए।

और आप हैं कि खुद को विश्व की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी कहते हैं, लेकिन लोकतंत्र के इस बुनियादी नियम को भी नहीं समझते कि जो आदमी के मन में है वही जबान पर भी होना चाहिए। अगर इतनी भी आजादी न हो तो कैसा लोकतंत्र।

प्रार्थना
भाइयों मेरी इतनी सी प्रार्थना है कि निरंजन ज्योति के मामले में ऐसे उतावले न बनिए। अगले चुनाव तक वो भी शहरी नियमों से परिचित हो जाएंगी और जब वो ये कहेंगी कि आपको बिना ह के रामजादों और ह वाले रामजादों में से किसी एक का चुनाव करना है तो फिर आप समेत हर कोई ताली बजाकर कहेगा कि वाह! क्या लाख रुपए की बात कही है साध्वी जी ने।

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