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'मुशर्रफ को राजनीति की समझ नहीं'

Tue, 23 Apr 2013 03:59 PM IST
Updated Tue, 23 Apr 2013 03:59 PM IST
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pervez musharraf pak media

पाकिस्तानी मीडिया पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ की क़ानूनी लड़ाई को ख़ूब सुर्खियां बना रही है।

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जानकारों का कहना है कि इस पूरे मामले से कहीं न कहीं एक तरह से लोगो को इस बात की संतुष्टि हो रही है कि एक पूर्व सेना प्रमुख को अदालत का सामना करना पड़ रहा है।

जब से पाकिस्तान की एक अदालत ने मुशर्रफ़ की गिरफ़्तारी के आदेश दिए हैं तभी से मीडिया में उनसे जुड़ी ख़बरों की कवरेज में ज़ोरदार बढ़ोत्तरी देखी जा रही है।
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पाकिस्तानी की ज़्यादातर मीडिया उनकी क़ानूनी दिक़्क़तों को बढ़ा चढ़ा कर पेश कर रही है और लगभग सभी ने इसका स्वागत किया है।

एक अख़बार ने तो उनकी गिरफ़्तारी के आदेश को पाकिस्तान के लिए 'ऐतिहासिक पहली घटना' क़रार दिया है। पाकिस्तान की एक अदालत ने पहली बार 18 अप्रैल को मुशर्रफ़ की गिरफ़्तारी के आदेश दिए थे।
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पाकिस्तान के प्रमुख चैनलों में से एक 'जियो टीवी' पर उस दिन दिखाए जाने वाली 10 बड़ी ख़बरों में सारी की सारी ख़बरें मुशर्रफ़ के ही बारे में थीं।

एक दूसरे चैनल 'आज न्यूज़' ने तो पूरा बूलेटिन ही मुशर्रफ़ के नाम कर दिया।

'डॉन न्यूज़' और 'दुनिया न्यूज़' ने भी उस दिन अपने समाचार में मुशर्रफ़ पर आधारित कम से कम चार-पांच कहानियां प्रसारित कीं।

उसके बाद भी मुशर्रफ़ से जुडी़ ख़बरें अख़बारों और चैनलों में सुर्खियां बटोरती रहीं। अप्रैल 19, 20 और 21 को भी सभी चैनलों की चार-पांच पहली ख़बरें मुशर्रफ़ से ही जुड़ी थीं।

उन सभी में मुशर्रफ़ की क़ानूनी लड़ाई से जु़ड़े अलग-अलग पहलू पर तफ्सील से चर्चा की गई थी।

'अप्रासंगिक साइड शो'

लेकिन शायद सबसे रोचक बात ये है कि मुशर्रफ़ को मीडिया में जितनी जगह मिल रही है उसकी तुलना में उनकी पार्टी की हालत बहुत ख़राब है।

चुनाव आयोग ने उनके नामांकन को ख़ारिज कर दिया है और वो चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। अदालत ने उनके देश छोड़ने पर पाबंदी लगा दी है। और फ़िलहाल वो न्यायिक हिरासत में हैं।

उनके ख़िलाफ़ बहुत सारे मामले दर्ज हैं जिनमें सबसे प्रमुख शायद देश द्रोह का मुक़दमा है।

पाकिस्तान से छपने वाले अंग्रेज़ी दैनिक 'द एक्स्प्रेस ट्रिब्यून' ने मुशर्रफ़ के पाकिस्तान लौटने पर लिखा था कि मुशर्रफ़ को पाकिस्तानी राजनीति की समझ नहीं है।

अख़बार में 25 मार्च को छपे एक लेख में मुशर्रफ़ को 'पाकिस्तानी राजनीति में अप्रासंगिक साइड शो' कहा गया था।

अख़बार ने आगे लिखा था कि मुशर्रफ़ के राजनीति में बेमतलब होने का ये अर्थ नहीं कि उन्हें भुला दिया जाना चाहिए।

अख़बार के अनुसार एक पूर्व सैन्य प्रमख पर मुक़दमा चलाए जाने के बाद पाकिस्तान में ऐसी मिसाल क़ायम होगी कि भविष्य में कोई सत्ता पलटने का सपना भी नहीं देखेगा।

राजधानी इस्लामाबाद से छपने वाले अंग्रेज़ी दैनिक 'द नेशन' ने 19 अप्रैल को लिखा था कि पाकिस्तान में समाज के हर हिस्से के लोग बड़े ध्यान से ये देख रहे हैं कि पहली बार पाकिस्तान अपने एक पूर्व सेना प्रमुख की क़ानूनी जंग से कैसे निपटता है।

'समय बदल गया है'

इसलिए पाकिस्तानी मीडिया में मुशर्रफ़ को मिल रही प्रमुखता उनकी राजनीतिक हैसियत के कारण नहीं, जो सचमुच में बहुत कमज़ोर है, बल्कि इसलिए है कि उनकी क़ानूनी लड़ाई और उनके ख़िलाफ़ दायर किए गए मुक़दमों की एक सांकेतिक अहमियत है।

पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार एक चुनी हुई असैनिक सरकार ने पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा किया है। इससे पहले वहां हमेशा से ही सैन्य तख़्तापलट के ज़रिए सत्ता परिवर्तन होता था।

मुशर्रफ़ की गिरफ़्तारी ऐसे समय में हुई है जब देश में आम चुनाव होने वाले हैं। ज़ाहिर हैं जब देश में प्रजातांत्रिक तरीक़े से नई सरकार बनाने की क़वायद चल रही हो उस समय एक पूर्व सेना प्रमुख का गिरफ़्तार होना मीडिया के लिए बहुत बड़ी ख़बर है और मीडिया इस मौक़े का पूरा लाभ भी ले रही है।


लाहौर से छपने वाले अख़बार 'डेली टाइम्स' ने इस सारे प्रकरण में लोगों की भावना को कुछ इस तरह से व्यक्त करने की कोशिश की।

अख़बार ने 20 अप्रैल को लिखा, ''समय बदल गया है। एक पूर्व सेना प्रमुख गिरफ़्तार हो रहें हैं, अपने आप में ये पाकिस्तान की ऐतिहासिक घटना है और पाकिस्तान में सेना के रोल को देखते हुए इसकी अहमियत को कम नहीं किया जा सकता है।''

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