दोषी पाए जाने पर मुशर्रफ को मौत की सजा!
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पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ देशद्रोह के एक मामले में इस्लामाबाद में मंगलवार को पहली बार अदालत में पेश हुए। लेकिन मुशर्रफ़ के वक़ीलों के एक असैनिक अदालत के अधिकार पर सवाल उठाने के बाद अदालत ने उन पर अभियोग नहीं लगाया।
मुशर्रफ़ के वक़ील अहमद रज़ा क़सूरी ने बीबीसी को बताया कि पूर्व राष्ट्रपति अदालत में सिर्फ़ 20 मिनट ही रहे। मुशर्रफ़ के वकीलों का कहना था कि पूर्व सेनाध्यक्ष पर सिर्फ़ एक सैन्य न्यायाधिकरण या ट्राइब्यूनल में ही मुक़दमा चलना चाहिए।
देशद्रोह का यह मामला परवेज़ मुशर्रफ़ द्वारा साल 2007 में संविधान निलंबित कर आपातकाल लगाने के फ़ैसले से जुड़ा है। इन आरोपों से इनकार करते हुए जनरल मुशर्रफ़ ने कहा है कि ये आरोप राजनीति से प्रेरित हैं।
सैन्य शासक पर पहला मुकदमा
पाकिस्तान में किसी पूर्व सैन्य शासक पर मुक़दमा चलने का ये पहला मौका है। अगर मुशर्रफ़ दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें मौत की सज़ा हो सकती है।
मुशर्रफ़ को ट्राइब्यूनल के सामने पेश होने के लिए सबसे पहले दिसंबर 2013 में कहा गया था लेकिन तब से वे स्वास्थ्य और सुरक्षा कारणों से कई बार सुनवाई के लिए नहीं गए।
जनवरी में देशद्रोह के मुक़दमे की सुनवाई विशेष अदालत ने अगली सुनवाई के दौरान उन्हें अदालत में उपस्थित रहने का आदेश दिया था। यह आदेश अदालत ने मुशर्रफ़ के वकील की उस दलील की सुनवाई करते हुए दिया था जिसमें कहा गया था कि वह ख़राब सेहत की वजह से कोर्ट में पेश नहीं हो सकते हैं।
कड़े सुरक्षा इंतज़ाम
70 साल के मुशर्रफ़ इस्लामाबाद की नेशनल लाइब्रेरी में गाड़ियों के अति सुरक्षित काफ़िले में पहुंचे। इसके अलावा जनरल मुशर्रफ़ पर हत्या और न्यायपालिका पर रोक लगाने के भी आरोप हैं।
बीबीसी संवाददाता शाहज़ेब जिलानी का कहना है कि अदालत ने मुशर्रफ़ पर आरोप नहीं तय किए हैं और किसी पूर्व सेनाध्यक्ष पर मुक़दमा चलाने के बारे में अपने अधिकार क्षेत्र के मुद्दे पर अदालत शुक्रवार को फ़ैसला देगी।
जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ 2001 से 2008 तक पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे और वे पाकिस्तान के सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले शासकों में से एक हैं। साल 2008 से वे स्वनिर्वासन में ज़्यादातर ब्रिटेन में रहे और मार्च 2013 में पाकिस्तान वापस लौटे।