पाकिस्तान क्यों चाहता है यहां भी हो कोई केजरीवाल?
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दिल तो यहां भी बहुतों का चाहता है कि पाकिस्तान में भी कोई अरविंद केजरीवाल हो मगर फिर फौरन कोई न कोई इस ख्याल पर पर झाड़ू फेर देता है।
आप किसी भी गरीब या मिडिल क्लास पाकिस्तानी से पूछ लें कि भाई क्या तू चाहता है कि यहां भी कोई केजरीवाल पैदा हो जाए, वो तुरंत कहेगा, क्यों नहीं,बिल्कुल होना चाहिए, कोई तो ऐसा होना चाहिए जो चीख-चीखकर करप्शन का विरोध करे, आम आदमी को राहत हक समझकर पहुंचाए, अहसान जताकर नहीं और यहां के सियासी गरूर पर झाड़ू लगा दे।
ऐसी बातों से हौसला पाकर अगर मैं इन्हीं केजरीवाल-पसंदों से कहूं कि चलो यार इस बार मैं तुम्हारे लिए चुनाव में खड़ा हो जाता हूं। तुम तो जानते ही हो कि हमेशा तनख्वाह में गुजारा किया है, कभी घूस नहीं ली, किसी को नाजायज तंग नहीं किया, मोहल्ले और इलाके को जब भी जरूरत पड़ी तो तुम गवाह हो, सबसे आगे-आगे मैं ही रहा, दोगे न अबकी बार मुझे अपना वोट, तुम्हीं तो मेरी पार्टी।
क्या है लोगों की राय
आपने चुनाव लड़ने के बारे में कहा नहीं और केजरीवाल की इच्छा करने वालों की आंखें और जबान बदली नहीं। अबे क्या घास चर गया है, इतने बड़े-बड़े मगरमच्छों के सामने खड़ा होगा, कच्चा नहीं चबा जाएंगे तुझे, शक्ल देखी है अपनी, चल हम तो तुझसे मोहब्बत में वोट दे देंगे और कौन वोट देगा, आया बड़ा चुनाव लड़ने वाला, इसे कहते हैं रहना झोपड़ी में और सपने महलों के।।
कुछ मालूम भी है चुनाव में कितना खर्च होता है, तूने तो कभी एक लाख रुपए एक साथ नहीं देखे, ढाई करोड़ कहां से लाएगा और दिमाग खराब है किसी पूंजीवादी का जो तुझपे खर्चा करेगा, वो इतने पैसे नवाज शरीफ, जरदारी या इमरान खान पर क्यों नहीं लगाएगा कि जिनसे दो पैसे के फायदे की उम्मीद भी हो।
तुझ कंगले को कौन पूछने वाला है, तेरी बात तो हमारे थाने का एसएचओ भी पूरे से नहीं सुनता। चल तू भी क्या याद करेगा, एक दो छोटे मोटे जलसों का ख़र्चा तो हम जैसे-तैसे उठा लेंगे लेकिन बाकी जलसों का क्या होगा।
लोग वोट देते वक्त यह नहीं सोचेंगे कि जो खुद मोटरसाइकिल पर अपने परिवार के चार सदस्यों को लाद कर चलता है वो हमें क्या देगा। न भाई न, भले तू कितना ही ईमानदार हो तेरे आदर्श कितने ही ऊंचे हों, पर जीतना तो रहा एक तरफ़, तेरी तो जमानत जब्त होने से बच जाए तो बड़ी बात होगी।
सियासत का तजुर्बा
कुछ और लोग कहेंगे, अच्छा यह बता कि तुझे सियासत का कितना तजुर्बा है। अगर जीत भी गया तो असेंबली में जाकर अकेला क्या भाड़ फोड़ लेगा। देख भाई हम तेरे को बता रहे हैं रिटायरमेंट के बाद जो पैसा मिला है, उसे किसी बैंक में जमा करा दे, वरना बिटिया की शादी कैसे होगी।
पार्टी बनाने से तो अच्छा है जुआ खेल ले। कम से कम पैसा मिलने का इमकान रहता ही है। सियासत में लाख दो लाख-पांच लाख, ज़िंदगी भर की कमाई झोंकना कहां की अक्लमंदी है। हम तेरे दुश्मन तो नहीं, तेरे भले की ही कह रहे हैं। आगे तेरी मर्ज़ी। अब पता चला आपको कि पाकिस्तान में आम आदमी पार्टी बनना क्यूं मुश्किल है।
हमें तो बस ख़ून चुसवाने और आसमां के तारे तोड़ने के ख्वाब दिखाने वालों को गालियां देने में मजा आता है और फिर उसके बाद यह कहने में क्या जाता है कि काश यहां भी कोई केजरीवाल पैदा हो जाए।