फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   World ›   Pakistan ›   pakistan: the story of karachi's bihari bahubali, altaf hussain

पाकिस्तान: कराची के ‘बिहारी बाहुबली’ की कहानी

Fri, 29 Jun 2018 02:21 AM IST
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Updated Fri, 29 Jun 2018 02:21 AM IST
विज्ञापन
pakistan: the story of karachi's bihari bahubali, altaf hussain

कराची की चुनावी राजनीति पर बीते तीन दशकों से राज करने वाले शख्स अल्ताफ हुसैन वैसे तो 1978 से उर्दू बोलने वालों को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन 15 अप्रैल 1985 को ट्रैफिक दुर्घटना में एक छात्रा बुशरा जैदी की मौत से उनका सियासी उदय हुआ। 

विज्ञापन


इस हादसे के बाद जो दंगे हुए उसने कराची को बदलकर रख दिया। शहर के लोग भाषाई आधार पर अपने-अपने मोहल्लों में दुबक कर रह गए। उर्दू बोलने वालों को अल्ताफ हुसैन एक मसीहा के तौर पर नजर आए और वह मशहूर होते चले गए।
विज्ञापन


उत्तर भारत में अधिकतर लोग जिस प्रकार से दक्षिण भारत के लोगों को आमतौर पर 'मद्रासी' कहकर संबोधित करते हैं। वैसे ही पाकिस्तान में, ख़ासतौर पर कराची शहर में भारत से पाकिस्तान गए सभी उर्दू भाषी लोगों को 'बिहारी' कहकर एक तरह से उन पर तंज़ किया जाता है। अल्ताफ हुसैन उत्तर भारत से पाकिस्तान गए ऐसे ही एक परिवार में 1953 को जन्मे थे। यहां तक कि बांग्लादेश बनने के बाद जो लोग वहां से पाकिस्तान गए उन्हें भी 'बिहारी' कह कर संबोधित किया जाता था।
विज्ञापन
विज्ञापन


अल्ताफ में भरोसा रखने वालों को क्रोटन के पत्तों पर अल्ताफ हुसैन की शक्ल नजर आने लगी। उन्हें पीर का दर्जा दिया जाने लगा। हमने ये भी देखा कि पीर साहब न कहने पर लोगों के गाल थप्पड़ों से लाल कर दिए जाते थे। लाखों की भीड़ एक इशारे पर खामोश हो जाती थी।

Trending Videos

pakistan: the story of karachi's bihari bahubali, altaf hussain

अपने जन्मदिन के मौके पर शहर के बीचों-बीच वह कई किलो का केक तलवार से काटा करते थे। 1985 के बाद से कराची अल्ताफ हुसैन की शख्सियत एक दायरे में कैद होकर रह गई। इस 'घेरेबंदी' ने शहर को राष्ट्रीय राजनीति और मुद्दों से दूर कर दिया। चुनावी राजनीति के हिसाब से देखा जाए तो 1988 के बाद से हर चुनाव में उनका पूरा कंट्रोल रहा। जब उनकी पार्टी चुनाव लड़ती थी तो भारी बहुमत हासिल करती थी और जब अज्ञात कारणों और दबावों की वजह से वह बायकॉट करती थी तो लगता था कि शहर में चुनाव हो ही नहीं रहे हैं।

2013 तक अल्ताफ हुसैन बहुत मजबूत फैक्टर थे। ये पहली बार है कि वह इस बार चुनाव की तस्वीर से गायब हैं और न सिर्फ वह बल्कि उनके खास लोग भी गायब हो चुके हैं जो चुनावों में बहुत अहम भूमिका अदा किया करते थे। 2002 के चुनावों की रिपोर्टिंग के दौरान हम जब मलेर के एक पोलिंग स्टेशन में गए तो मुझे मेरे दो पत्रकार साथियों समेत कॉलर से पकड़कर बाहर निकाल दिया गया।

एक कर्मचारी ने हमें बाहर छोड़ते हुए कहा, "भाई यहां पहले ही बहुत टेंशन है, आप और माहौल खराब कर रहे हैं।" गेट पर मौजूद रेंजर्स के जवान से जब शिकायत की तो उसने कहा कि उसकी जिम्मेदारी गेट तक है। उसने कहा, "अंदर क्या हो रहा है ये हमारी जिम्मेदारी नहीं है।"

अल्ताफ हुसैन के लिए लड़ने-मरने को तैयार लोगों के अलावा जो उनकी विचारधारा को आम जनता तक पहुंचाते थे, उन्हें भी इजाजत नहीं थी कि वह जनता से बात कर सकें। अब अल्ताफ हुसैन के पास एक ही जरिया है और वह है सोशल मीडिया और इस जरिए से वह जनता तक अपना संदेश पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।

pakistan: the story of karachi's bihari bahubali, altaf hussain

वो संदेश ये है कि जनता चुनाव वाले दिन घरों से न निकले, लेकिन क्या इसके बावजूद भी वो 25 जुलाई को चुनाव पर कोई असर डाल पाएंगे। यही वो सवाल है जो कराची में लोगों की जबान पर है। उनके समर्थक, पूर्व समर्थक और विरोधी सब यही सवाल पूछ रहे हैं। कराची के मेयर वसीम अख्तर कहते हैं कि अल्ताफ हुसैन बड़ी हद तक अपना असर खो चुके हैं। उन्होंने बीते साल जुलाई में पीएस 114 महमूदाबाद में होने वाले उप-चुनाव का उदाहरण देते हुए कहा कि अल्ताफ हुसैन के बायकॉट की घोषणा के बावजूद एमक्यूएम को 18 हजार से अधिक वोट मिले।

"ये परंपरागत तौर पर हमारी सीट नहीं थी और लंदन से बायकॉट की अपील भी थी, लेकिन फिर भी हमें इतने वोट पड़े। ये जाहिर करता है कि अल्ताफ हुसैन का असर कम हुआ है। समस्या ये है कि हम आपस की लड़ाई में व्यस्त हो गए हैं जो हमारे लिए ज्यादा बड़ा खतरा है।" एमक्यूएम के वरिष्ठ नेता डॉक्टर फारुक सत्तार के मुताबिक, ''हाल ही में जब अल्ताफ हुसैन ने अपने कार्यकर्ताओं से अपील की कि वह पश्तून संरक्षण आंदोलन की कराची में होने वाले सम्मेलन में भाग लें तो चार-पांच लोग ही वहां जा सके।

लेकिन फारुक सत्तार कहते हैं कि अल्ताफ हुसैन मतदान पर अब भी पांच से छह फीसद असर डाल सकते हैं।'' कराची को अगर थोड़ी बारीक नजर से देखें तो शहर के कई इलाकों की पतली-पतली गलियों में आज भी अल्ताफ हुसैन के लिए न सिर्फ हमदर्दी बल्कि उनके कार्यकर्ताओं का कमजोर ही सही, लेकिन एक नेटवर्क मौजूद है।

सुरक्षा एजेंसियां आज भी इस नेटवर्क की तलाश में रहती हैं। रोजाना छापे, गिरफ्तारियों और हथियार बरामद किए जाने की खबरें भी आती रहती हैं। शहर में यह भी खबरें हैं कि जब एमक्यूएम के उम्मीदवार अपनी चुनावी मुहिम के लिए इन गलियों का रुख करेंगे तो उनका इस नेटवर्क से सामना हो सकता है।

फेडरल बी एरिया में मुझे एक ऐसे ही कार्यकर्ता से मिलने का मौका मिला। उन्होंने कहा, "अगर हमें आजादी से चुनाव लड़ने दिया जाए तो सब को पता चल जाएगा कि ये शहर आज भी किसका है।" उन्होंने कहा कि एमक्यूएम वालों की इस शहर में कोई हैसियत नहीं है और उनमें इतनी हिम्मत नहीं है कि ये हमारे मोहल्लों में आएं।

pakistan: the story of karachi's bihari bahubali, altaf hussain

यह तो वक्त ही बताएगा कि ऐसे और कितने कार्यकर्ता हैं और वे क्या कर सकते हैं। कराची की राजनीति पर गहरी नजर रखने वाले विश्लेषक प्रोफेसर तौसीफ अहमद के मुताबिक, ''अल्ताफ हुसैन चाहेंगे कि लोग चुनाव का हिस्सा न बनें, लेकिन जब चुनाव प्रचार शुरू होता है तो विभिन्न राजनीतिक पार्टियां अपने वोटरों के पास जाती हैं और माहौल बदल जाता है। इस गहमागहमी में हो सकता है कि यह संदेश ज़्यादा प्रभावी न हो।

1993 में भी तो अल्ताफ़ हुसैन ने नेशनल असेंबली के चुनाव का बायकॉट किया था और मतदान प्रतिशत बहुत कम रहा था। लेकिन अगले ही रोज जब पार्टी ने राज्य की असेंबली के चुनाव लड़े तो जैसे पूरा शहर ही उमड़ आया। क्या ऐसी तस्वीर दोबारा नहीं उभर सकती? प्रोफेसर तौसीफ कहते हैं कि उस वक्त हालात अलग थे, एमक्यूएम अपनी पूरी ताकत के साथ मौजूद थी।

वह कहते हैं, "एमक्यूएम को जनता का समर्थन हासिल था, लेकिन सत्ता में आने के बाद जिस तरह का उन्होंने काम किया उसके कारण हमदर्दों में मायूसी फैली।" प्रोफेसर तौसीफ के मुताबिक हुसैन ने विभिन्न उद्देश्यों के लिए अपने खास लोगों को लगातार अपने साथ रखा। उन्होंने कहा, "कहा जाता है कि पहले वह स्थानीय एजेंसियों के लिए ठेके पर काम करते थे तो बाद में अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के लिए काम करने लगे। इससे शहर को और खुद उनकी पार्टी को बहुत नुकसान पहुंचा।"

pakistan: the story of karachi's bihari bahubali, altaf hussain

कई सारी घटनाओं में शायद उनके लोग शामिल न हों, लेकिन धारणा यही बन गई कि कई घटनाओं में एमक्यूएम के 'लड़ाकों' का हाथ था। इस धारणा के बनने की वजहें भी थीं। बाद में जब उन 'लड़ाकों' के ख़िलाफ सुरक्षाबलों ने अभियान शुरू किया तो वह गायब हो गए, उसके बाद अल्ताफ हुसैन के शहर को नियंत्रित करने की क्षमता भी प्रभावित हुई। प्रोफेसर तौसीफ कहते हैं कि 2013 के आम चुनाव वाले दिन शहर में इमरान खान का दिन था।

"उस दिन फौज और पुलिस वोटों की गिनती के वक्त मतदान केंद्रों से अगर चली गई होती और एमक्यूएम वाले उन केंद्रों पर कब्जा कर लेते तो तहरीक-ए-इंसाफ शहर की एक बड़ी फौज के तौर पर उभर सकती थी।" विश्लेषकों के मुताबिक, राजनीतिक तस्वीर को अपने हक में बदलने वाली वो फोर्स अब नहीं रही जिसकी वजह से अल्ताफ हुसैन शहर को कंट्रोल करते थे। ये नेटवर्क अब टूट-फूट चुका है। इसके अलावा आम लोगों के समर्थन में भी कमी आई है।

एमक्यूएम के विकास को करीब से देखने और परखने वाले जानते हैं कि अल्ताफ हुसैन की शख्सियत ने पार्टी के शिखर पर जाने और जमीन पर आने में अहम किरदार निभाया है। एक वक़्त था जब एमक्यूएम में लोग इस बात पर काम कर रहे थे कि इसे एक लोकतांत्रिक पार्टी बनाया जाए। इसे एक धर्मनिरपेक्ष और उदार पार्टी के तौर पर उभारा जाए।
प्रोफेसर तौसीफ कहते हैं कि वह एक बहुत अच्छी योजना थी जिसमें अल्ताफ हुसैन भी किसी हद तक आगे रहते और शहर की बहुत सारी समस्या भी हल हो जाती। लेकिन ये सोच अल्ताफ हुसैन की सोच से मेल नहीं खाती थी इसलिए पार्टी के अंदर ये बात आगे नहीं बढ़ सकी।

अब यह कोशिश दोबारा की जा सकती है। लेकिन एमक्यूएम (पाकिस्तान) दो धड़ों में बंटी हुई है। अल्ताफ हुसैन से अलग होने के बाद यह एक बड़ी लोकतांत्रिक और उदार पार्टी के तौर पर उभर सकती है।
यह पार्टी अपनी पूरी ताकत और मजबूती से चुनाव लड़े तो संभावना है कि लोग अल्ताफ हुसैन को पुरानी बात समझकर आगे बढ़ जाएं। एक ऐसी शख्सियत जिसने बीते 30 सालों तक बिना किसी भागीदारी के राज किया हो, उसके हट जाने के बाद खुशी या गम को संभालने में कराची शहर को कुछ वक्त लगेगा।

'हमें मंजिल नहीं नेता चाहिए'- यह कभी एमक्यूएम का नारा हुआ करता था। कराची को मंजिल तो नहीं मिल सकी और अब यह शहर एक नेता की भी तलाश में है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get latest World News headlines in Hindi related political news, sports news, Business news, Crime all breaking news and live updates. Stay updated with us for all latest Hindi news.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed