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पाकिस्तान के नौ मुख्य किरदार

Thu, 17 Jan 2013 01:09 PM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Thu, 17 Jan 2013 01:09 PM IST
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pakistan political crisis key players

पाकिस्तान की सरकार हाल के वर्षों में अक्सर न्यायपालिका और सेना रूपी दो पाटों के बीच फंसती नजर आई है। न्यायाधीशों ने जब बीते साल प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को अयोग्य करार दिया, तब उन पर राजनीति में दखल देने का आरोप लगा।

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'मेमोगेट' मामले में भी न्यायालय ने अहम भूमिका निभाई जिसमें सरकार ने अपनी ही सेना को कमज़ोर करने के लिए अमरीका से कथित सहयोग मांगा था। पाकिस्तान में इस साल मई में चुनाव होने हैं।
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जानिए सरकार, विपक्ष और सेना के उन नौ बड़े किरदारों के बारे में जो देश की भावी दिशा-दशा तय करने में अहम भूमिका अदा कर सकते हैं।

राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी
Asif Ali Zardariजरदारी पाकिस्तान की राजनीति में सबसे विवादित रहे चेहरों में से एक हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि वह संयोगवश राष्ट्रपति बन गए। अपनी पत्नी और पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या के बाद उठी सहानुभूति की लहर के बाद जरदारी सितंबर 2008 में सत्ता में आए।
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लेकिन उनके कार्यकाल में पाकिस्तान ने राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल देखी जहां अस्थिरता बढ़ने के साथ ही वित्तीय कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार के आरोपों की झड़ी लग गई। जरदारी के कार्यकाल के दौरान ही पाकिस्तान के अमेरिका से संबंध बिगड़ते गए और अमेरिका भी यह सवाल दागने लगा कि क्या पाकिस्तान चरमपंथ के खिलाफ वाकई पर्याप्त कदम उठा भी रहा है या नहीं।

भ्रष्टाचार के आरोपों के साथ जरदारी का नाम इस कदर जुड़ा हुआ हुआ है कि उन्हें 'मिस्टर टेन पर्सेंट' के नाम से भी पुकारा जाता है। सुप्रीम कोर्ट भी बार-बार इस बात पर जोर देता रहा है कि जरदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के उस मामले को दोबारा शुरु किया जाए जिसमें वह पहले ही आठ साल की कैद काट चुके हैं। जरदारी पाकिस्तान के लोगों में दिनोंदिन अलोकप्रिय होते जा रहे हैं। देश में जब उन्हें मौजूद होना चाहिए था, तब वह स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों की वजह से उपचार के लिए विदेश जाते रहे हैं।

साल 2011 के आखिरी दिनों में भी उनके नेतृत्व की परीक्षा तब हुई थी जब मेमो मामला सामना आया था, जिसमें अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद संभावित सैन्य तख्तापलट को रोकने के लिए अमेरिका से मदद मांगी गई थी। हालांकि जरदारी मेमोगेट कांड में अपनी किसी भूमिका से इनकार करते रहे हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि फिलहाल किसी संभावित महाभियोग से बचे हुए हैं।

राजा परवेज अशरफ
Raja Pervez Ashrafबीते साल जून में यूसुफ रजा गिलानी की विदाई के बाद राजा परवेज अशरफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने थे। गिलानी को सुप्रीम कोर्ट ने अपनी अवमानना का दोषी पाया था, क्योंकि गिलानी ने राष्ट्रपति जरदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों को दोबारा खोलने से मना कर दिया था।

राजा परवेज अशरफ जिस दिन से प्रधानमंत्री बने, उसी दिन से अटकलें लगाई जाने लगी थीं कि उन्हें भी पूर्व प्रधानमंत्री गिलानी की तरह न्यायपालिका की ओर से दबाव का सामना करना पड़ेगा। इसी बुनियाद पर तभी इस आशय की खबरें आने लगी थीं कि उनका कार्यकाल ज्यादा लंबा नहीं होगा और जितना भी होगा, मुश्किलों से भरा होगा।

जनवरी 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी का आदेश दिया, क्योंकि उन पर आरोप लगे कि साल 2010 में ऊर्जा और जल मंत्री रहते हुए उन्होंने बिजली परियोजनाओं के लिए रिश्वत ली थी। इन आरोपों की वजह से उन्होंने 'राजा रेंटल' नाम से ख्याति अर्जित की। हालांकि वे इन आरोपों से इनकार करते रहें लेकिन साल 2011 में उन्हें अपने पद से हटना ही पड़ा था।

पाकिस्तान पीपुल्ल पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार में वह दो बार मंत्री रहे और साल 2008 से ही ऊर्जा मंत्रालय उनके पास था। पार्टी में भी उनका कद ऊंचा है।

जनरल अशफाक कयानी, सेना प्रमुख
Ashfaq Parvez Kayaniसेना प्रमुख जनरल कयानी के कार्यकाल में पाकिस्तान की सेना ने अपने इतिहास के सबसे उथल-पुथल वाले दौर में से एक दौर देखा। इस दौर में अमेरिकी बलों ने ओसामा बिन लादेन को मार गिराया, चरमपंथी हमलों का खतरा बढ़ा।

पाकिस्तान में ड्रोन हमले भी बढ़े जिसका लोगों ने पुरजोर विरोध किया क्योंकि इन हमलों में चरमपंथियों के साथ आम लोग भी मारे गए। जनवरी 2013 में अल्पसंख्यक शिया समुदाय के एक नेता ने कयानी की सरेआम आलोचना की और कहा कि सेना उन्हें सुरक्षा मुहैया कराने में विफल रही।

शिया समुदाय को निशाना बनाकर किए गए हमलों में लगभग सौ लोग मारे गए हैं। 'मेमोगेट' मामला सामने आने पर जनरल कयानी ने यह कहते हुए जांच की मांग की थी कि यह सेना के खिलाफ एक साजिश है। बदले में गिलानी ने उन पर आरोप लगाया कि वह असंवैधानिक तरीके से काम कर रहे हैं।

पाकिस्तान के इतिहास में सेना तीन बार तख्तापलट कर चुकी है और इसी बुनियाद पर आशंकाएं बढ़ रही हैं कि सेना एक बार फिर ऐसी हरकत कर सकती है। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि सेना को इससे बहुत अधिक हासिल नहीं होगा। क्योंकि वह वैसे भी इस्लामी चरमपंथियों से जूझ रही है और तख्तापलट जैसी किसी कार्रवाई से उसे कड़ी अंतरराष्ट्रीय भर्त्सना भी झेलनी होनी।

परवेज मुशर्रफ, पूर्व नेता
Pervez Musharrafपाकिस्तान के अंतिम सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ साल 2008 में सत्ता से बाहर होने के बाद से ही आत्म-निर्वासन का जीवन बिता रहे हैं। लेकिन फिर भी पाकिस्तान की राजनीति में उनकी अहम भूमिका बरकरार है। साल 2012 में उन्होंने घोषणा की थी वे तीन हफ्ते के भीतर पाकिस्तान लौटेंगे।

तब उन्होंने अपने समर्थकों से चुनाव की तैयारियां करने के लिए भी कहा था। लेकिन पाकिस्तान में कदम रखते ही अपनी गिरफ्तारी की आशंका की वजह से उन्होंने वापसी का इरादा टाल दिया था। मुशर्रफ पर यह आरोप भी लगा कि वह पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो को पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराने में विफल रहे जिसकी वजह से साल 2008 में उनकी हत्या कर दी गई थी।

कहा जाता है कि खुद सेना भी मुशर्रफ की वापसी को पसंद नहीं करेगी, क्योंकि उनके कार्यकाल के दौरान सैन्य शासन की छवि बहुत खराब हो गई थी। संवाददाताओं का कहना है कि देश के आम लोग भी वापसी के बाद मुशर्रफ़ का समर्थन शायद ही करें।

नवाज शरीफ, विपक्षी नेता
nawaz sharifपाकिस्तान के दो बार प्रधानमंत्री रहे नवाज शरीफ पंजाब में अभी भी अपनी राजनीतिक पकड़ रखते हैं और वह यहां के सबसे लोकप्रिय नेता हैं। वह पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज, पार्टी के अध्यक्ष हैं जो देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है।

कई लोग यह मानते हैं कि बेनजीर की हत्या के बाद सहानुभूति की लहर ना उठी होती तो नवाज शरीफ साल 2008 में फिर प्रधानमंत्री बन जाते। नवाज शरीफ पर आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के प्रति कुछ ज्यादा ही दोस्ताना दिखाया और इस वजह से वह उन्हें चुनौती देने के कई अवसर खो बैठे।

लेकिन संवाददाताओं की माने तो बहुत मुमकिन है कि नवाज शरीफ राजनीति का खेल बहुत सतर्क होकर खेल रहे हैं और सही समय का इंतजार कर रहे हैं। वैसे वह नवाज शरीफ ही थे जिन्होंने मेमोगेट कांड की ओर सुप्रीम कोर्ट का ध्यान खींचा था और इसके पीछे राष्ट्रपति जरदारी का हाथ होने का आरोप लगाया था।

उन्होंने इस मामले में अमेरिका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक्क़ानी पर भी निशाना साधा था जिन्हें इस्तीफा देना पड़ा था।

इमरान खान, तहरीक ए इंसाफ पार्टी के नेता
imran khanपाकिस्तान के पूर्व अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खिलाड़ी इमरान खान बीते कई वर्षों से देश के राजनीतिक परिदृश्य पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे हैं। वह तहरीक ए इंसाफ पार्टी की अगुआई करते हैं लेकिन राजनीति में अभी बहुत ज्यादा पकड़ नहीं बना पाए हैं।

इमरान ख़ान ने देश में भ्रम की स्थिति का फायदा उठाना चाहा, वह खासतौर पर शहरी मध्यवर्ग को अपनी ओर खींचना चाहते हैं। वैसे उन्हें कुछ ऐसे नेताओं का सहयोग भी मिला है जो अपनी पार्टियों में संतुष्ट नहीं थे। इमरान ख़ान को राजनीति के मैदान में ऐसे नेताओं के अनुभव से लाभ मिल सकता है।

पाकिस्तान में अमेरिकी ड्रोन हमलों के विरोध में बीते साल अक्तूबर में उन्होंने हजारों लोगों के साथ एक विशाल रैली निकाली थी, लेकिन उन्हें कबाइली इलाकों में दाखिल होने से रोक दिया गया था और इस तरह उनकी रैली भी लगभग बेअसर साबित हुई थी। वह बीते दो वर्षों में सिलसिलेवार तरीके से रैलियां निकालते रहे हैं।

इमरान खान का वादा है कि वह पाकिस्तान की राजनीति से भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म कर देंगे। उन्होंने इसके तहत विदेशों से मिलने वाली वित्तीय मदद पर भी रोक लगाने की बात कही है। माना जाता है कि इमरान ख़ान सेना में भी लोकप्रिय हैं।

मोहम्मद इफ्तिखार चौधरी, मुख्य न्यायाधीश
Iftikhar Muhammad Chaudhryमोहम्मद इफ्तिखार चौधरी उन कई न्यायाधीशों में से एक थे जिन्हें जनरल परवेज मुशर्रफ ने वर्ष 2007 में हटा दिया था क्योंकि उन्होंने मुशर्रफ़ के पद पर बने रहने पर सवाल उठाए थे। इसके बाद लंबी मुहिम चली और मार्च 2009 में उन्हें अपने पद पर बहाल कर दिया गया था।

आम लोगों में उनकी छवि एक ऐसे व्यक्ति की है जो कानून के शासन की खातिर लड़ता है। उनकी लोकप्रियता का एक आधार यह भी है कि वह एकमात्र ऐसे न्यायाधीश हुए हैं जिन्होंने पाकिस्तान में सैन्य शासक के विरोध में आवाज बुलंद की और जीते भी। लेकिन उन पर भी यह आरोप लगा कि उन्होंने मामले चुन-चुनकर उठाए।

बीते साल जून में उन्हें तब शर्मसार होना पड़ा था जब एक बड़े कारोबारी ने उनके बेटे अरसालन के खिलाफ भ्रष्टाचार का आरोप लगाया और जब मामला सुनवाई के लिए उन्हीं की पीठ के समक्ष आया तो उन्हें खुद को पीठ से अलग करना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट ने सैन्य तख्तापलट को वैध बताया। इस पृष्ठभूमि में कुछ लोगों का कहना है कि उन्होंने सेना की खुफिया सेवा के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों से खुद को दूर रखा जबकि गिलानी को अयोग्य करार देने जैसे फैसले में जरा भी देरी नहीं की।

जहीरुल इस्लाम, इंटेलीजेंस चीफ
jahirul islamलेफ्टिनेंट जनरल जहीरुल इस्लाम, साल 2012 में अहमद शुजा पाशा की जगह इंटर-सर्विसेज इंटेलीजेंस यानी आईएसआई के मुखिया बने थे। वह इस पद पर ऐसे समय आसीन हुए थे जब अमेरिका आरोप लगा रहा था कि आईएसआई अफगानिस्तान की सीमा पर चरमपंथियों की मदद कर रहा है।

हालांकि पाकिस्तान इन आरोपों को लगातार खारिज करता रहा है लेकिन दोनों देशों के संबंधों में तनाव बना रहा। उन्हीं के कार्यकाल के दौरान अमेरिकी बलों ने अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में दाखिल होकर मारा।

तब आईएसआई की भूमिका पर सवाल उठे कि ओसामा कई वर्षों से पाकिस्तान में थे और खुफिया एजेंसी को इसकी भनक तक नहीं लगी। लेफ्टिनेंट जनरल जहीरुल इस्लाम का जन्म एक सैन्य परिवार में ही हुआ था। वह कराची में सैन्य कमांडर भी रहे हैं। आईएसआई प्रमुख होने से पहले वह खुफिया एजेंसी में उप प्रमुख रह चुके थे।

संवाददाताओं का कहना है कि आईएसआई का मुखिया होने के नाते कई लोगों को लगता है कि अफगान तालिबान के साथ पाकिस्तान की किसी भी शांति वार्ता में उनकी अहम भूमिका होगी।

ताहिरुल कादरी
Tahir ul qadriडॉक्टर ताहिरुल कादरी कनाडा में सात साल गुजारकर अचानक पाकिस्तान लौटे हैं। उन्होंने मौजूदा सरकार को भ्रष्ट बताकर चुनाव सुधारों की मांग के साथ सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। वह अपने समर्थकों के साथ दो मांगे प्रमुखता से उठा रहे हैं।

पहली, 'भ्रष्ट' सरकार से छुटकारा और दूसरी 'ईमानदार' लोगों की अंतरिम सरकार के तहत चुनाव सुधारों का मार्ग प्रशस्त करना। कनाडा में वह मिनहाजुल कुरान इंटरनेशनल के बैनर तले एक शैक्षणिक और जन-कल्याणकारी संस्था चलाते हैं जो उनके मुताबिक 80 से ज्यादा देशों में सक्रिय है।

राजनीति की बजाए देश को बचाने का आह्वान कर रहे कादरी की मंशा पर लोगों को शक हो रहा है क्योंकि वह ऐसे समय सक्रिय हुए हैं जब देश में चार महीने बाद चुनाव होने हैं। बीते साल 23 दिसंबर को उन्होंने लाहौर स्थित मीनार-ए-पाकिस्तान में लोगों को संबोधित किया था। पाकिस्तान की राजनीति को समझने वाले कई विश्लेषकों ने इसे एक विशाल सियासी रैली करार दिया।

इस रैली से संकेत निकाला गया कि कादरी आम लोगों के बूते पाकिस्तान की सत्ता को हिला सकते हैं। कादरी के सियासी मायने तब और बढ़ गए जब कराची की मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट पार्टी ने उन्हें अपना समर्थन दे दिया।


पंजाब यूनिवर्सिटी से विधि-स्नातक कादरी ने इस्लामी विद्वान और आम लोगों के लिए काम करने वाले नेता की छवि बनाई है। वैसे पाकिस्तान के सभी राजनीतिक दल उन्हें 'पाकिस्तान विरोधी एजेंट' और 'लोकतंत्र विरोधी ताकतों का एजेंट' बताकर खारिज कर रहे हैं। सवाल यह है कि डॉक्टर कादरी जिस तरह से पाकिस्तान की राजनीति में प्रकट हुए हैं, क्या वह अपनी रफ्तार कायम रख पाएंगे।

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