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पाकिस्तान, पोलियो और यूट्यूब
वुसतुल्लाह ख़ान (बीबीसी पाकिस्तान संवाददाता)
Updated Mon, 07 Jan 2013 06:11 PM IST
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गत गरमी के मौसम में जब यू टयूब पर एक विवादास्पद फिल्म दिखाए जाने पर दुनिया भर में मुसलमान भड़क उठे तो उन्हें ठंडा करने के लिए कुछ सरकारों ने यूटयूब पर स्थाई रूप से प्रतिबंध लगा दिया था। कुछ समय बाद अधिकतर देशों ने उस फिल्म तक पहुंच को रोक कर बाक़ी यूट्यूब पर से प्रतिबंध हटा दिया।
आज पाकिस्तान को छोड़ कर बाक़ी सभी देशों में यू ट्यूब देखा जा सकता है। लेकिन पाकिस्तान की सरकार का रुख ये है कि केवल उस विवादास्पद फिल्म का पन्ना ब्लाक करना काफी नहीं है, जब तक वो फिल्म हटाई नहीं जाती यू ट्यूब गन्दी ही रहेगी।
बात सिर्फ यू ट्यूब की नहीं है बल्कि किसी भी मामले में सरकार की सोच स्पष्ट और दो टूक नहीं है। इसलिए सरकार का एजेंडा राजनीति और आर्थिक माफिया और उग्रवाद से घिरे सरकारी तत्व ही तय कर रहे हैं।
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उदाहरण के तौर पर अगर पोलियो का टीका अगर सचमुच मुसलमानों के विरुद्ध कोई अंतरराष्ट्रीय साज़िश है तो फिर सऊदी अरब और ईरान जैसे देशों को पोलियो के रोग से मुक्त नहीं होना चाहिए था लेकिन यह साज़िश तो अब तक सिर्फ उन तीन देशों में ही सफल हो सकी है जहाँ गैर सरकारी तत्व अपना एजेंडा कमज़ोर सरकारों पर थोपने के काबिल हैं।
एक नाइजीरिया जहाँ बोको हराम (यानी पश्चिमी शिक्षा हराम है) उन लोगों का गले काट रही जो उस के धार्मिक आस्था से सहमत नहीं हैं दूसरे पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान जहाँ पहले ही से कई इलाकों में सरकार की मर्ज़ी नहीं चल रही है।
हाल ही में पाकिस्तान में पोलियो के खिलाफ अभियान चलाने वाले नौ कार्यकर्ताओं की मौत के बाद अब पाकिस्तानी सरकार के पास खुश होने और खुश करने के लिए बस यही एक घोषणा रह गई है कि आखिरी पाक-भारत एक दिवसीय मैच पोलियो के विरुद्ध अभियान के नाम कर दिया गया है। पोलियो के टीके को तो छोडिए, भय के मारे खसरे के टीके भी अब शक और हिचकिचाहट के दाएरे में आ गए हैं।
ऊपरी सिंध के चार जिलों में गत दो महीने में खसरे के रोग से लगभग तीन सौ बच्चे मर चुके हैं जबकि गत वर्ष इन जिलों में यह संख्या केवल 75 थी।
पाकिस्तान के बहुत से इलाकों में लड़कियों की शिक्षा भी उतनी ही खतरनाक है जितना कि पोलियो के टीके।जिन इलाक़ों में सरकार का राज चलता है वहां तो लड़कियां पढ़ नहीं सकतीं लेकिन स्वात के इलाके में जहाँ सरकारी राज अब बहाल हो गया है गड़बड़ के दौरान स्कूल नष्ट हुए सो हुए, जो स्कूल बचे उन पर अब भी सैनिक और अर्ध सैनिक बालों का कब्ज़ा है।
तो क्या यह संभव है कि जिन गैर सरकारी तत्वों को पोलियो के टीके धरम और संस्कृति के दुश्मनों की साज़िश दिखाई देते हैं वो अपने बच्चों को न सही लेकिन दूसरे लाखों बच्चों को अपंग होने से बचाने का फैसला उन के माता पिता की मर्ज़ी पर छोड़ दें।
अगर अधिकतर लोग अपने बच्चों को पोलियो के कतरे पिला कर शारीरिक रूप से नामर्द बनाने की साज़िश का शिकार बनाना चाहते हैं और अपनी बच्चियों को स्कूल भेज कर उनकी और आने वाली पीढ़ियों के धर्म और दुनिया को नष्ट करने पर अड़े हुए हैं तो फिर आपका क्या जाता है।
आप इन गुमराह लोगों को सीधे रास्ते पर लाने या फिर मिटा देने का जो काम बमों और राइफलों से करना चाहते हैं तो फिर आप के लिए वही काम पोलियो के टीके और शिक्षा कर दें तो आप का क्या जाता है। क्या यह कदम आम के आम के आम गुठलियों के दाम नहीं होंगे?
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आज पाकिस्तान को छोड़ कर बाक़ी सभी देशों में यू ट्यूब देखा जा सकता है। लेकिन पाकिस्तान की सरकार का रुख ये है कि केवल उस विवादास्पद फिल्म का पन्ना ब्लाक करना काफी नहीं है, जब तक वो फिल्म हटाई नहीं जाती यू ट्यूब गन्दी ही रहेगी।
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बात सिर्फ यू ट्यूब की नहीं है बल्कि किसी भी मामले में सरकार की सोच स्पष्ट और दो टूक नहीं है। इसलिए सरकार का एजेंडा राजनीति और आर्थिक माफिया और उग्रवाद से घिरे सरकारी तत्व ही तय कर रहे हैं।
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उदाहरण के तौर पर अगर पोलियो का टीका अगर सचमुच मुसलमानों के विरुद्ध कोई अंतरराष्ट्रीय साज़िश है तो फिर सऊदी अरब और ईरान जैसे देशों को पोलियो के रोग से मुक्त नहीं होना चाहिए था लेकिन यह साज़िश तो अब तक सिर्फ उन तीन देशों में ही सफल हो सकी है जहाँ गैर सरकारी तत्व अपना एजेंडा कमज़ोर सरकारों पर थोपने के काबिल हैं।
एक नाइजीरिया जहाँ बोको हराम (यानी पश्चिमी शिक्षा हराम है) उन लोगों का गले काट रही जो उस के धार्मिक आस्था से सहमत नहीं हैं दूसरे पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान जहाँ पहले ही से कई इलाकों में सरकार की मर्ज़ी नहीं चल रही है।
हाल ही में पाकिस्तान में पोलियो के खिलाफ अभियान चलाने वाले नौ कार्यकर्ताओं की मौत के बाद अब पाकिस्तानी सरकार के पास खुश होने और खुश करने के लिए बस यही एक घोषणा रह गई है कि आखिरी पाक-भारत एक दिवसीय मैच पोलियो के विरुद्ध अभियान के नाम कर दिया गया है। पोलियो के टीके को तो छोडिए, भय के मारे खसरे के टीके भी अब शक और हिचकिचाहट के दाएरे में आ गए हैं।
ऊपरी सिंध के चार जिलों में गत दो महीने में खसरे के रोग से लगभग तीन सौ बच्चे मर चुके हैं जबकि गत वर्ष इन जिलों में यह संख्या केवल 75 थी।
पाकिस्तान के बहुत से इलाकों में लड़कियों की शिक्षा भी उतनी ही खतरनाक है जितना कि पोलियो के टीके।जिन इलाक़ों में सरकार का राज चलता है वहां तो लड़कियां पढ़ नहीं सकतीं लेकिन स्वात के इलाके में जहाँ सरकारी राज अब बहाल हो गया है गड़बड़ के दौरान स्कूल नष्ट हुए सो हुए, जो स्कूल बचे उन पर अब भी सैनिक और अर्ध सैनिक बालों का कब्ज़ा है।
तो क्या यह संभव है कि जिन गैर सरकारी तत्वों को पोलियो के टीके धरम और संस्कृति के दुश्मनों की साज़िश दिखाई देते हैं वो अपने बच्चों को न सही लेकिन दूसरे लाखों बच्चों को अपंग होने से बचाने का फैसला उन के माता पिता की मर्ज़ी पर छोड़ दें।
अगर अधिकतर लोग अपने बच्चों को पोलियो के कतरे पिला कर शारीरिक रूप से नामर्द बनाने की साज़िश का शिकार बनाना चाहते हैं और अपनी बच्चियों को स्कूल भेज कर उनकी और आने वाली पीढ़ियों के धर्म और दुनिया को नष्ट करने पर अड़े हुए हैं तो फिर आपका क्या जाता है।
आप इन गुमराह लोगों को सीधे रास्ते पर लाने या फिर मिटा देने का जो काम बमों और राइफलों से करना चाहते हैं तो फिर आप के लिए वही काम पोलियो के टीके और शिक्षा कर दें तो आप का क्या जाता है। क्या यह कदम आम के आम के आम गुठलियों के दाम नहीं होंगे?