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क्या सोचकर वतन लौटे थे मुशर्रफ?

Fri, 19 Apr 2013 06:55 PM IST
Updated Fri, 19 Apr 2013 06:55 PM IST
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pakistan musharraf arrest

परवेज़ मुशर्रफ़ की जब से वतन वापसी हुई है तभी से उनकी राह में एक के बाद एक रोड़े खडे़ हो रहे है। उनकी समस्याएं बद से बदतर होती जा रही हैं।

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अपना स्व निर्वासन समाप्त कर जब वो पाकिस्तान पहुँचे तो कराची के एक कोर्ट में उन पर जूता फेंका गया। हालांकि वो बाल-बाल बच गए। जिस समय उन पर जूता फेंका गया कोर्ट का कॉरिडोर खचाखच भरा हुआ था।
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इस घटना को बीते बमुश्किल एक सप्ताह हुए होंगे कि सुप्रीम कोर्ट ने उन पर देशद्रोह के आरोप में मुकदमा चलाने की शुरुआत कर दी।

पिछले मंगलवार को पाकिस्तान के एक इलेक्शन ट्राइब्यूनल ने उनके संसद पहुंचने की दौड़ पर ही ब्रेक लगा दिया। ट्राइब्यूनल ने कहा कि वो चुनाव नहीं लड़ सकते।

अभी उनके चुनाव न लड़ पाने का शोर-गुल थम ही रहा था कि इसलामाबाद की एक अदालत ने उनकी गिरफ्तारी का रास्ता साफ करते हुए उनकी जमानत याचिका ही खारिज कर दी।

ग़लत नतीजा

सवाल उठता है कि जब मुशर्रफ़ वतन वापसी कर रहे थे तो क्या उन्हें इन सब बातों का अंदाज़ा रहा होगा?

ये ऐसा सवाल है जिसका जवाब केवल और केवल परवेज़ मुशर्रफ़ ही दे सकते हैं।

पाकिस्तान की सेना के बारे में जानकारी रखने वाले एक विशेषज्ञ ने एक समाचार चैनल को बताया कि मुशर्रफ़ ने इन बातों पर यकीनन विचार किया होगा। उन्हें अपनी गिरफ्तारी का भी अंदेशा रहा होगा।
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जमानत याचिका खारिज होने के बाद भी वो काफी शांत लग रहे थे। उनके एक वकील के अनुसार वो अपने सहयोगियों के साथ “कॉफी और सिगार पी रहे थे।”

हां, ये बात अलग है कि पाकिस्तान सरकार के उच्च अधिकारी ठीक वैसा ही नहीं महसूस कर रहे हैं जैसा कि मुशर्रफ़।

फिलहाल पाकिस्तान की कामचलाऊ सरकार की पहली प्राथमिकता वहां चुनाव कराना है। सेक्युलर पार्टियों पर चरमपंथी हमलों ने सरकार की चुनाव करवा पाने की योग्यता पर पहले ही सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। पाकिस्तान में चुनाव मई महीने की 11 तारीख को होने हैं।

मुशर्रफ़ जैसे पूर्व सेना प्रमुख को गिरफ्तार करना ही अपने आप में अनूठी बात है। इसके नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं। कई लोग तो कहने लगे हैं कि मुशर्रफ़ की गिरफ्तारी के मसले को हल करना केवल स्थायी सरकार के बस की बात होगी जिसके पीछे जनता का भी समर्थन होगा।

इससे थोड़ा हटकर देखें तो न्यायपालिका का मुशर्रफ़ के खिलाफ देशद्रोह के मुकदमे की पहल करना ही एक बड़ी बात है।

आमतौर पर सरकार को इसके लिए पहल करनी होती है। अब अगर सरकार इस मसले को आगे ले जाती है तो उसे सेना की नाराजगी झेलनी होगी क्योंकि मामला केवल मुशर्रफ़ तक सीमित नहीं है।

पिछले दो सालों में पाकिस्तान में न्यायपालिका की सक्रियता ने न केवल सरकार के अधिकार क्षेत्र में दखल किया है बल्कि इसकी वजह से सेना भी खतरा महसूस करने लगी है।

नाजुक वक्त

जानकार बताते हैं कि भले ही मुशर्रफ़ अपने फॉर्म हाउस में बैठकर कॉफी की चुस्कियां ले रहे हैं लेकिन वतन वापस लौटकर उन्होंने सबके लिए समस्या खड़ी कर दी है।

सेना से जुड़े कुछ सूत्र बताते हैं कि कुछ सैन्य अधिकारी उनके वापस लौटने की योजना पर सहमत नहीं थे। आखिरी चेतावनी उनके घर लौटने से पहले एक महीने दी गई थी।


सवाल उठता है कि क्या उनकी घर वापसी सऊदी अरब की गारंटी के बाद हुई? वैसे, सऊदी अरब पहले भी पाकिस्तान के शासकों के लिए इस तरह के समझौते करता आया है।

मुशर्रफ़ के खिलाफ मुकदमा चलाने के सबसे बड़े समर्थक नवाज शरीफ हैं जिनको मुशर्रफ़ ने 1999 में तख्ता पलट कर सउदी अरब में शरण लेने के लिए मजबूर कर दिया था।

लेकिन इस बार मुशर्रफ़ के मसले पर नवाज शरीफ ने चुप्पी साध रखी है। कुछ लोग इसके पीछे भी सऊदी अरब का हाथ देख रहे हैं। पाकिस्तान में लोकतंत्र के भविष्य के लिए ये बेहद नाजुक वक्त है। जानकार कहते हैं कि पहले से ही अस्थिर पाकिस्तान अब और अस्थिरता नहीं झेल सकता।

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