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पाकिस्तान की रुचि मोदी में नहीं, मुन्ना भाई में

Fri, 18 Apr 2014 01:06 PM IST
वुसतुल्लाह ख़ान/बीबीसी संवाददाता, पाकिस्तान
वुसतुल्लाह ख़ान/बीबीसी संवाददाता, पाकिस्तान Updated Fri, 18 Apr 2014 01:06 PM IST
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अगर आप खुली आंखों से देखेंगे तो जान लेंगे कि पाकिस्तान से दुश्मनी की फ़िल्म उत्तरी भारत के अलावा कहीं हिट न हो सकी और भारत से दुश्मनी की फ़िल्म पाकिस्तानी पंजाब, पाक प्रशासित कश्मीर और कराची के अलावा कहीं कामयाब नहीं हुई।

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कारण बड़ा सीधा-सादा है कि बंटवारे के बाद पंजाबी और उर्दू बोलने वाले शरणार्थी भारत के उत्तरी इलाक़ों से पाकिस्तान पहुंचे, जबकि पाकिस्तान से जिन शरणार्थियों ने भारत का रुख़ किया उनमें से बहुत से उत्तरी राज्यों में जा बसे।
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अब दोनों देशों में बंटवारे के बाद पैदा होने वाली तीसरी पीढ़ी भी जवानी का जोश गुज़ार चुकी है इसलिए आपसी दुश्मनी का विषय बड़े पैमाने पर सिकुड़ता हुआ चंद संस्थाओं तक रह गया है।

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विकास की चाहत हावी

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पाकिस्तान में कुछ भारत-विरोधी जेहादी संगठनों के सिवा राष्ट्रीय या क्षेत्रीय स्तर पर जमाते-इस्लामी के अलावा शायद ही कोई बड़ी पार्टी हो जो भारत-विरोधी नीति को आज के ज़माने में गंभीरता से लेती हो।

इसी तरह भारत में आरएसएस या उसकी राजनीतिक शाखा भारतीय जनता पार्टी और उससे नत्थी कुछ संगठनों के पाकिस्तान से दुश्मनी कांग्रेस सहित किसी और बड़ी पार्टी का चुनावी मुद्दा नहीं रहा।

अगर आप दोनों देशों में ऐसी पार्टियों के राजनीतिक जन्मपत्री जांचें तो अंदाज़ा होगा कि इन गुटों को ऐसे लोगों का समर्थन ज़्यादा मिला जो भारत से उखड़कर पाकिस्तान और पाकिस्तान से उखड़कर भारत में बसने पर मजबूर हुए।

एक और परिवर्तन यह आया है कि मुंबई, दिल्ली, कराची और फ़ैसलाबाद का पूंजीवादी तबक़ा जो कुछ साल पहले तक अपने-अपने देशों की सरकारों की नीतियों से अलग सोचने के बारे में कल्पना भी नहीं कर सकता था आज धड़ल्ले से दोनों देशों के आर्थिक संबंधों के फ़ायदे पर लेक्चर पिलाता है।

'ग़ैर कांग्रेसी सरकारें बेहतर'

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क्या नब्बे के दशक तक कोई सोच सकता था कि 14 और 15 अगस्त को सिविल सोसायटी भारत-पाकिस्तान सीमा पर एक साथ दिए रोशन कर पाएगी या कश्मीर के दोनों हिस्सों के बीच लूला-लंगड़ा ही सही व्यापार शुरू हो जाएगा।

या फिर कोई दिग्गज भारतीय नेता, वह भी हिंदुत्ववादी प्रचारक एलके आडवाणी या जसवंत सिंह जैसा राष्ट्रवादी मोहम्मद अली ज़िन्ना को एक नई दृष्टि से परखने का ख़तरा मोल लेकर अपनी पार्टी की सदस्यता को ख़तरे में डाल लेगा।

इसी संदर्भ में जब नरेंद्र मोदी चुनावी दौड़ में आगे-आगे चल रहे हैं, भारतीय मुसलमानों और भारतीय धर्मनिरपेक्ष लोगों को इस बारे में जितनी चिंता है, तो शायद पाकिस्तान सरकार, सियासत और मीडिया में इतनी परेशानी नहीं पाई जाती। क्योंकि कुछ लोगों की नज़र में चाहे भारत में भले कांग्रेस रहे या बीजेपी पाकिस्तान के बारे में दिल्ली की नीति के बुनियादी उसूल वही रहेंगे- यानी कि कुछ दोस्ती और कुछ दुश्मनी।

वहीं बहुत से पाकिस्तानियों का ख़्याल है कि जब-जब दिल्ली में ग़ैर-कांग्रेसी सरकारें आईं उनके संबंध पाकिस्तान से कुछ बेहतर ही रहे।

युवाओं में दिख रहा वैचारिक बदलाव

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एक ज़माना था कि पाकिस्तान के शहरी इलाक़ों में भारतीय मुसलमानों के लिए दर्द उठता था और यही हालत दिल्ली, लखनऊ और हैदराबाद के मुसलमान मोहल्लों में भी पाकिस्तान के लिए हुआ करती थी। लेकिन 1971 के बाद से यह जज़्बाती बंधन वैसा नहीं रहा।

बदले ज़माने में भारतीय और पाकिस्तानी मुसलमानों का वैचारिक और भावनात्मक पहचान का तरीक़ा भी बदलता चला गया। आज के पाकिस्तानी मुसलमानों के लिए ताजमहल और लाल क़िले की यादों से ज़्यादा यूएई और सऊदी अरब महत्वपूर्ण है। और भारतीय मुसलमान भी मुस्लिम भाईचारे के रोमांस से ऊपर उठकर दिल की बजाय शायद दिमाग़ से वोट देना सीख गया है।

'टेंशन लेने का नहीं, देने का'

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भारतीय चुनाव का नतीजा क्या निकलता है, इसमें एक आम पाकिस्तानी की रुचि इसलिए भी कम है क्योंकि आजकल ख़ुद उसकी जान-माल और इज़्ज़त-आबरू के लाले पड़े हुए हैं। वह भारत में हिंदुत्व की लहर आने से ज़्यादा यह जानना चाहता है कि अफ़गानिस्तान से अमेरिका के जाने के बाद पाकिस्तान का अपना वैचारिक और राजनीतिक ऊंट किस करवट बैठने वाला है।

वैसे भी जो देश ख़ुद धर्म के नाम पर आतंकवाद के लपेट में हो वह पड़ोसियों के घर पर आख़िर कितनी देर तक आंखें टिका सकता है? शायद इसीलिए मोदी कुछ अंग्रेज़ी बुद्धिमान और उर्दू लिक्खाड़ों के लिए ज़रूर पाकिस्तान में एक मुद्दा है लेकिन आम आदमी के लिए मोदी कोई मुद्दा नहीं।

फिर भी मोदी अगर अपने चुनाव भाषणों में किसी को पाकिस्तानी एजेंट कहकर ख़ुश होते हैं तो होते रहें। सच तो यह है कि पाकिस्तानियों की रुचि इस वक्त नरेंद्र मोदी के बजाय मुन्ना भाई एमबीबीएस जैसे किरदारों में ज़्यादा है- ऐ भाई टेंशन लेने का नहीं, देने का।

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