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पाक चुनाव: मुश्किल में सेकुलर पार्टियां
मोहम्मद इलियास ख़ान
Updated Sun, 07 Apr 2013 06:58 PM IST
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पाकिस्तान में 11 मई को होने वाले आम चुनाव के लिए प्रचार अभियान की शुरुआत करने जा रही देश के एक सियासी दल को अपनी रैली रद्द करनी पड़ी है। कई लोग इस वाकए को आने वाले दिनों में पाकिस्तान की सेकुलर सियासी पार्टियों के बुरे दिनों की शुरुआत के तौर पर देख रहे हैं।
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पापीपी यानी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने लरकाना में बुधवार रात की पहले से तयशुदा रैली का कार्यक्रम स्थगित कर दिया।
लरकाना को पीपीपी का गढ़ माना जाता है और पार्टी नेताओं का कहना है कि चरमपंथियों से खतरे की वजह से रैली रद्द की गई।
इससे पहले पाकिस्तान तालिबान के एक प्रवक्ता ने कहा था कि चुनावों के दौरान देश की तीन सियासी जमातें उसके निशाने पर होंगी। पीपीपी देश की उन्हीं तीन सियासी जमातों में से एक है।
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पीपीपी के अलावा पाकिस्तानी तालिबान की हिट लिस्ट में एमक्यूएम यानी मुहाजिर क़ौमी मुवमेंट और पख्तूनों का प्रतिनिधित्व करने वाली अवामी नेशनल पार्टी भी है।
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एमक्यूएम कराची शहर में मजबूत पकड़ रखती है जबकि एएनपी पार्टी का जनाधार मुल्क के सूबे खैबर पख्तूनख्वां में है।
मुशर्रफ की रैली भी रद्द हुई
एएनपी का असर कराची शहर में भी देखा जाता है। ये तीनों सियासी पार्टियां खुद को सेकुलर जमातें बताती हैं और पिछले महीने अपना कार्यकाल पूरा करने वाली सरकार में साझीदार भी रही थीं।
ठीक इसी तरह से पूर्व फौजी तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ को भी 24 मार्च को अपनी रैली स्थगित करनी पड़ी थी। जनरल मुशर्रफ भी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिज्ञ कहे जाते हैं। यह रैली चार साल बाद आत्म निर्वासन से 24 मार्च को ही वतन वापस लौटे मुशर्रफ के स्वागत में होनी थी।
पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ, पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ की पीएमएल-एन और मौलाना फजलुर्रहमान के जेयूआई-एफ की बड़ी रैलियों के बाद पाकिस्तानी तालिबान ने यह धमकी दी थी।
जमात-ए-इस्लामी और मजहबी गुटों की सियासी पार्टियों के लिए चुनावी प्रचार अभियान का मैदान खुला हुआ है। ऐसी पार्टियां साफ तौर पर धार्मिक संगठनों की तरह नज़र आती हैं या मजहबी रुझान वाले दक्षिणपंथी उदारवादियों द्वारा चलाई जाती हैं।
सुरक्षा एजेंसियों की नाकामी
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या देश की सेकुलर जमातें चरमपंथियों का सामना कर सकती हैं और चुनाव के दौरान बराबरी के मुकाबले के लिए इन हालात का दृढ़तापूर्वक मुकाबला कर सकती हैं?
जवाब इस बात पर निर्भर करेगा कि चरमपंथियों का खतरा किस हद तक गंभीर है।
एक सवाल यह भी है कि क्या देश की खुफिया और सुरक्षा एजेंसियां इन चरपंथियों से निपटने की काबिलियत या इरादा रखती हैं। अभी तक सेकुलर सियासी जमातों पर हमले को लेकर चरमपंथियों ने कई बार अपनी ताकत दिखाई है जबकि सुरक्षा एजेंसियां उनके सफाए में पूरी तरह से नाकाम रही हैं।
देश के पश्चिमोत्तर इलाकों में इन चरमपंथियों का ठिकाना होने की बात जगजाहिर है। खैबर पख्तूनिस्तान में मौजूदा सरकार की अगुवाई कर रही एएनपी पार्टी को चरमपंथियों के हमले का सबसे अधिक निशाना बनना पड़ा है।
अक्टूबर 2008 में एएनपी के प्रमुख असफंदयार वाली के घर के नजदीक आत्मघाती हमला हुआ था जिसमें वह बाल-बाल बच गए थे। तभी से एएनपी के वरिष्ठ नेताओं ने अपनी गतिविधियां और सार्वजनिक तौर पर दिखाई देना कम कर दिया है।
फीका चुनाव प्रचार अभियान
बीबीसी उर्दू की एक रिपोर्ट में हाल ही में कहा गया था कि पिछले चार सालों में एएनपी के 700 से ज्यादा कार्यकर्ता गोलियों का शिकार हुआ या आत्मघाती हमलों में मारे गए। इन हमलों में मारे जाने वालों में पार्टी के वरिष्ठ नेता बशीर बिलौर भी थे।
हाल के हफ्तों में एएनपी की चुनाव सभाओं में कम तीव्रता वाले बम धमाके हुए हैं और इसका असर उसके फीके प्रचार अभियान पर देखा जा सकता है। हालांकि पीपीपी की जमीनी ताकत पर इन हमलों का बहुत ज्यादा असर नहीं हुआ है।
लेकिन पार्टी को उस वक्त बहुत बड़ा झटका लगा था जब साल 2007 में पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की एक बम हमले में हत्या कर दी गई थी।
जनरल मुशर्रफ की अगुवाई वाली तत्कालीन सरकार ने खुफिया जानकारी के आधार पर पाकिस्तानी तालिबान को बेनजीर हत्याकांड के लिए जिम्मेदार बताया था।
इसके बाद कोई आधा दर्जन गिरफ्तारियां भी की गई थीं। जून 2011 में बेनजीर भुट्टो के पति और पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को इस्लामाबाद के एक अस्पताल में इलाज कर रहे अपने बीमार पिता को देखने जाने से रोक दिया गया था।
उस वक्त खुफिया एजेंसियों ने पाया था कि तालिबान के आत्मघाती बम हमलावरों ने जरदारी की हत्या की योजना बन रखी थी। जहां तक एमक्यूएम की बात है, करांची में यह पार्टी खासा असर रखती है और कहा जाता है कि इसके पास खुद का चरमपंथी संगठन है।
सेकुलर जमातों के पर कई बार कतरे
हालांकि एमक्यूएम इन आरोपों से इनकार करती है। लेकिन हाल के महीनों में एमक्यूएम के जनप्रतिनिधि मंजर इमाम सहित पार्टी के अन्य कार्यकर्ताओं को तालिबान ने निशाना बनाया है।
आने वाले दिनों और हफ्तों में ही यह साफ हो पाएगा कि क्या ये सेकुलर जमातें अपने दूसरे दक्षिणपंथी विरोधियों के मुकाबले में चुनाव अभियान टीक से चला पाएंगी या नहीं। वे ऐसा करने के लिए बेचैन दिखाई देते हैं।
पीपीपी और एएनपी तकरीबन चार सालों से मतदाताओं से संपर्क करने के मामले में लोगों से दूर रहे हैं। मतदाताओं से खुलेआम संपर्क करने की मुश्किल की वजह से इन पार्टियों और इनके नेताओं को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
बहुत से लोग यह मानते हैं कि मौजूदा हालात 2002 के चुनाव के दौर की याद दिलाते हैं जब जनरल मुशर्रफ की फौजी हुकूमत ने प्रमुख राजनीतिक नेताओं को देश छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया था।
और ऐसे हालात पैदा कर दिए थे कि मजहबी पार्टियां और कट्टरपंथी गुटों के लिए चुनाव जीतना आसान हो जाए। पाकिस्तान में अक्सर यह देखा गया है कि फौज ने सेकुलर जमातों के पर कई बार कतरे हैं।
माना जाता है कि मुल्क की इस्लामी छवि उनकी सुरक्षा जरूरतों को बेहतर तरीके से पूरा करती है। इन दिनों यही काम तालिबान कर रही है।