{"_id":"11280c763a0dc97da9b839417d6c4479","slug":"pak-army-chief-raheel-shareef","type":"story","status":"publish","title_hn":"राहील शरीफ का भारत के लिए क्या मतलब है? ","category":{"title":"Pakistan","title_hn":"पाकिस्तान","slug":"pakistan"}}
राहील शरीफ का भारत के लिए क्या मतलब है?
प्रवीण स्वामी
Updated Thu, 28 Nov 2013 03:31 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लेफ़्टिनेंट जनरल राहील शरीफ़ के पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष बनने और उसके बाद के घटनाक्रम पर भारत की नज़रें टिकी हुई हैं। दरअसल ऐसा होता रहा है कि भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों की प्रक्रिया पर पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष प्रभाव डालते रहे हैं।
विज्ञापन
1999 में परवेज़ मुशर्ऱफ पाकिस्तान के आर्मी चीफ़ और राष्ट्रपति बने। 2002 के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ कश्मीर और अन्य मुद्दों को सुलझाने के लिए एक प्रक्रिया शुरु की, जिसने काफ़ी रफ़्तार भी पकड़ी।
विज्ञापन
पाकिस्तान
एक डील पर भारत और पाकिस्तान काफ़ी क़रीब भी आ गए थे। परवेज़ मुशर्रफ़ और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच तारिक़ अज़ीज़ और सतिन्दर लांबा ने गुपचुप समझौता कराया था। लेकिन वो डील हो नहीं सकी। कई वजहों से मसलन, यहाँ उत्तर प्रदेश में चुनाव और पाकिस्तान में परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ माहौल बन गया था।
विज्ञापन
लेकिन उस समय काफ़ी ठोस क़दम उठाए गए थे और इसकी एक वजह पाकिस्तान की राजनीतिक स्थिरता और वहाँ की सेना का केंद्रबिंदु का एक होना था। इस कारण जो वादे राजनीतिक स्तर पर किए जाते थे उन्हें सैन्य स्तर पर भी समर्थन मिलता था।
इसके बाद हमने देखा कि मंदी आई और बनी रही लेकिन कश्मीर के अंदर लगातार दस साल 2002 से 2012 तक हालात सुधरे, बॉर्डर पर तनाव कम हुआ। इसका यही कारण था कि पाकिस्तानी सेना भारत के साथ रिश्ते सुधारने के लिए तत्पर थी।
कुछ लोगों का कहना है कि यह अमरीका के दबाब के कारण था तो कुछ लोगों का कहना है कि पाकिस्तान सेना के अंदर ही रियलाइज़ेशन आ गया था। वजह जो भी हो लेकिन पाकिस्तान के सेना प्रमुख जो फ़ैसले ले पाए वो शायद एक राजनेता न ले पाते।
बिगड़ते हालात
2008 के बाद पाकिस्तान में एक नए आर्मी चीफ़ जनरल परवेज़ अशरफ़ कियानी के आने से ये प्रगति रुक गई। लाइन ऑफ़ कंट्रोल पर हालात धीरे-धीरे लगातार बिगड़ते गए। अब लगभग रोज़ कोई न कोई वारदात, फ़ायरिंग हो जाती है।
जिहादी समूहों पर परवेज़ मुशर्रफ़ ने जो रोक लगाई थी वो हटा ली गई। उसके बाद मुंबई में 26/11 जैसी घटनाएं हुईं और हालात बिगड़ गए।
कश्मीर पर जो खुफ़िया डायलॉग चल रहा था वो लगभग बंद कर दिया गया।
विशेषज्ञों और विश्लेषकों का कहना है कि जनरल कियानी ये चाहते थे कि पाकिस्तान के अंदर परवेज़ मुशर्रफ़ ने जो जिहादियों के साथ जंग शुरु कर दी थी वो किसी तरह रोक दिया जाए और वहीं पाकिस्तान के अंदर दिखाना चाहते थे कि वो भारत विरोधी थे और भारत के साथ कोई दोस्ती नहीं करना चाहते थे।
इन दोनों बातों से स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान की सेना का नेतृत्व वहाँ की नीतियों की दिशाओं पर बहुत असर रखता है।
सेना सर्वोच्च ताक़त
राष्ट्रपति ज़रदारी ने भी कहा था कि वो भारत के साथ अमन चैन चाहते हैं लेकिन जनरल कियानी इसके विरोधी थे तो राष्ट्रपति ज़रदारी इस दिशा में ज्यादा कुछ नहीं कर पाए।
जबकि परवेज़ मुशर्रफ़ के समय कई राजनेता कई बार ग़ैरज़िम्मेदाराना बयान देते थे लेकिन वो आर्मी चीफ़ थे तो उस समय इन बयानों का कोई असर नहीं पड़ा।
अब इस वक्त जब पाकिस्तान में अंदरूनी और लाइन ऑफ़ कंट्रोल पर हालात बहुत बिगड़े हैं, कई सारे नए ख़तरे भारत को दिख रहे हैं। भारत नए आर्मी चीफ़ के इरादे को जानना चाहेगा, वो पाकिस्तान को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं।
क्योंकि दोनों देशों के रिश्तों के लिए पाकिस्तान के राष्ट्रपति से भी ज्यादा महत्वपूर्ण पद सेना प्रमुख का है।
भारत पाकिस्तान में एक ऐसा सेना प्रमुख चाहेगा जो बहुत ज्यादा विचारधारा उन्मुख न हो यानी कि बहुत कट्टर व्यक्तिगत राजनीतिक सोच से ज्यादा तथ्यात्मक और व्यवहारिक हो। ऐसा होने पर वह दोनों मुल्कों के हित में रहेगा।
पाकिस्तान का इतिहास रहा है कि जनरल ज़िया उल हक़ के बाद वहां के जनरल पाकिस्तान को जिहाद पसंद विचारधारा की तरफ़ ले गए जिससे भारत को बहुत नुक़सान हुआ।
परवेज़ मुशर्रफ़ जैसे व्यवहारिक नेता भी रहे हैं जो संकटों को दूर कर व्यापार को बढ़ावा देना और रिश्ते बेहतर करना चाहते थे। अब नवाज़ शरीफ़ भी इसकी बातें कर रहे हैं, तो ये ज़रूरी है कि कोई ऐसा ही आर्मी चीफ़ आए जो अमन चाहता हो।
पाकिस्तान में आर्मी चीफ़ की अहमियत कोई नई बात नहीं है। एक तरह से 1950 से ही, जब पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना और लियाक़त अली ख़ान गुज़र गए, उसके बाद से सेना की नीति निर्धारण में अहम भूमिका रही है।
राहील शरीफ़ की मुश्किल
पाकिस्तान का कोर कमांडर कांफ्रेंस, जहाँ पाकिस्तान के अलग-अलग आर्मी के कोर कमांडर मिलते हैं, ही राजनीतिक मुद्दों पर ज़रूरी कदम उठाते हैं।
कई लोगों का मानना है कि ये कोर कमांडर कांफ्रेंस वहाँ की कैबिनेट से ज्यादा महत्वपूर्ण है। यह हक़ीक़त है कि पाकिस्तान में आर्मी सबसे बड़ी और ताक़तवर संस्था है। विदेशी नीतियों और मुद्दों पर सेना का एक तरह से वीटो है।
भारत के साथ पाकिस्तान के रिश्ते वहाँ के सेना प्रमुख के हाथ में ही होते हैं। जनरल राहील शरीफ़ के लिए यह बहुत मुश्किल चुनाव होगा।
एक तरफ़ तो वो पाकिस्तानी के अंदरूनी ख़तरे ख़त्म करना चाहेंगे लेकिन कोशिश करेंगे कि जिहादी समूहों के समर्थक सेना के ख़िलाफ़ न हों और उनको ख़ुश करने के लिए वो भारत के साथ दोस्ती का रिश्ता नहीं चाहेंगे।
जबकि दूसरी तरफ़ पाकिस्तान के आर्थिक हालात बहुत ख़राब हैं। पाकिस्तान इस मुश्किल हालात में भारत के साथ रिश्ते नहीं बिगाड़ना चाहेगा क्योंकि वो उसके हित में नहीं है।
वो चाहेंगे कि ऐसी कोई परिस्थिति न पैदा हो जिससे भारत के साथ कोई जंग हो या कोई हालात बिगड़े। इसलिए जनरल राहील के लिए परिस्थितियों को संभालना चुनौती भरा होगा।
जनरल कियानी ने इस दिशा में जो क़दम उठाया था उसे देखते हुए क्या भारत उम्मीद करेगा कि जनरल राहील शरीफ़ एक अलग दिशा में जाएंगे।
ये बहुत पहले से कहा जाता है कि उनके नवाज़ शरीफ़ के साथ पारिवारिक रिश्ते रहे हैं। उन्होंने जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के साथ भी काम किया था। मुशर्रफ़ उनके गुरु की तरह रहे हैं तो हो सकता है कि वे भारत के साथ बेहतर रिश्तों के लिए सकारात्मक क़दम उठाएं।