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'शायद कभी भी स्कूल न जा सकूंगी मैं'
malala, pak, taliban
Updated Thu, 11 Oct 2012 01:42 PM IST
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उस वक्त मलाला सातवीं कक्षा में पढ़ती थी और तब उन्होंने बीबीसी उर्दू के लिए 'गुल मकई' के नाम से डायरी लिखनी शुरु की। इसमें उन्होंने लिखा कि किस तरह से तालिबान के प्रतिबंधों ने उनकी क्लास में पढ़ने वाली लड़कियों की ज़िंदगी पर असर डाला।
ये हैं वर्ष 2009 में लिखे गए उनकी डायरी के कुछ अंश...
गुरुवार, जनवरी 15: रात भर गोलीबारी हुई
रात भर तोप की गोलीबारी का शोर होता रहा और मैं तीन बार उठी, लेकिन चूंकि स्कूल नहीं जाना था इसलिए सुबह मैं देर से दस बजे उठी। इसके बाद में मेरी सहेली आई और हमने गृहकार्य के बारे में बात की।
आज 15 जनवरी है। कल से तालिबान का फ़रमान जारी होना है और मैं और मेरी सहेली इस तरह से स्कूल के होमवर्क के बारे में बात कर रहे हैं जैसे कुछ भी असामान्य नहीं हुआ हो।
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आज मैंने अख़बार में बीबीसी उर्दू के लिए लिखी गई अपनी डायरी भी पढ़ी। मेरी मां को मेरा उपनाम 'गुल मकई' पसंद आया और उन्होंने मेरे पिता से कहा, "क्यों न हम इसका नाम बदल कर गुल मकई रख दें?" मुझे भी ये नाम अच्छा लगा क्योंकि मेरे असली नाम का मतलब है 'शोक में डूबा हुआ इंसान'।
मेरे पिता ने कहा कि कुछ दिन पहले कोई मेरी डायरी का प्रिंटआउट लेकर आया था और उसने कहा कि ये बहुत बढ़िया है। मेरे पिता बताया कि वो सिर्फ़ मुस्कुरा कर रह गए क्योंकि वो तो ये भी नहीं कह सकते थे कि ये सब कुछ मेरी बेटी ने लिखा है।
बुधवार, 14 जनवरी: मैं शायद कभी भी स्कूल न जा सकूं
स्कूल जाते समय मेरा मूड बिलकुल भी अच्छा नहीं था क्योंकि कल से सर्दी की छुट्टियां शुरु हो रही हैं।
प्रिंसिपल ने छुट्टियों की तो घोषणा कर दी लेकिन ये नहीं बताया कि स्कूल दोबारा कब खुलेगा। ये पहली बार है जब ऐसा हुआ है क्योंकि इससे पहले, हमेशा छुट्टी के बाद स्कूल खुलने की तारीख़ बताई जाती थी।
हालांकि प्रिंसिपल ने हमें स्कूल खुलने की तारीख़ न बताने की वजह नहीं बताई है लेकिन मुझे लगता है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि तालिबान ने 15 जनवरी से लड़कियों की पढ़ाई पर प्रतिबंध की घोषणा की है।
इस बार, लड़कियों में छुट्टी को लेकर कोई ज़्यादा उत्साह नहीं था क्योंकि वो जानती थीं कि अगर तालिबान अपना फ़रमान लागू करते हैं तो वो फिर से कभी स्कूल नहीं जा पाएंगी।
हांलाकि, कुछ लड़कियों को उम्मीद थी कि फ़रवरी में स्कूल खुल जाएगा लेकिन बहुत सी लड़कियों ने बताया कि उनकी पढ़ाई जारी रखने के लिए उनके माता-पिता ने स्वात छोड़कर दूसरे शहरों में रहने का फ़ैसला किया है।
चूंकि आज स्कूल का आखिरी दिन है इसलिए मैंने और मेरी सहेलियों ने कुछ और देर खेलने का फ़ैसला किया। मुझे यक़ीन है कि एक दिन स्कूल दोबारा खुलेगा लेकिन घर वापस जाते समय मैं स्कूल की इमारत को ऐसे निहार रही थी कि शायद अब मैं यहां फिर कभी न आ पाऊं।
बुधवार 7 जनवरी: न गोलीबारी, न डर
मैं मोहर्रम की छुट्टियों के लिए बुनैयर आई हूं. मुझे यहां के पहाड़ और हरे-भरे खेत बहुत पसंद हैं। मेरी स्वात घाटी भी बेहद ख़ूबसूरत है लेकिन वहां शांति नहीं है। लेकिन यहां बुनैयर में शांति और अमन है। और यहां गोली-बारी या किसी तरह का डर भी नहीं है। हम सब यहां बहुत ख़ुश हैं।
आज हम पीर बाबा की मज़ार पर गए। वहां बहुत सारे लोग थे। यहां लोग प्रार्थना करने आए हैं जबकि हम यहां घूमने आए हैं। दुकानों पर चूड़ियां, कान की बालियां, हार और तरह-तरह के नकली ज़ेवर बिक रहे हैं। मैंने सोचा कि मैं कुछ खरीदूं लेकिन कुछ भी ख़ास नहीं लगा। हां, मेरी अम्मी ने कान के बुंदे और चूड़ियां खरीदी।
सोमवार 5 जनवरी: रंगीन पोशाकें न पहने
मैं स्कूल के लिए तैयार हो रही थी और वर्दी पहनने ही वाली थी कि मुझे याद आया कि प्रिंसिपल ने हमसे स्कूल की वर्दी नहीं पहनने के लिए कहा है। उन्होंने कहा है कि हमें सादे कपड़ों में स्कूल आना होगा। इसलिए मैंने अपनी पंसदीदा गुलाबी रंग की पोशाक पहनी है। स्कूल की बाकी लड़कियां भी रंग-बिरंगी पोशाकों में थीं और स्कूल में घरेलू माहौल लग रहा था।
मेरी सहेली ने मुझसे पूछा, "ख़ुदा के लिए, सच-सच बताओ कि क्या हमारे स्कूल पर तालिबान हमला करेगा?" सुबह असेंबली में हमसे कहा गया था कि हम रंग-बिरंगे परिधान न पहने क्योंकि तालिबान को इस पर आपत्ति होगी।
स्कूल से आकर दोपहर के खाने के बाद मेरी ट्यूशन थी। शाम को मैंने टीवी खोला तो पता चला कि शाकारद्रा में 15 दिन बाद कर्फ्यू हटा लिया गया है। ये सुनकर मैं बहुत ख़ुश थी क्योंकि हमारी अंग्रेज़ी की टीचर उस इलाके में रहती हैं और अब शायद वो स्कूल आ पाएंगी।
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ये हैं वर्ष 2009 में लिखे गए उनकी डायरी के कुछ अंश...
गुरुवार, जनवरी 15: रात भर गोलीबारी हुई
रात भर तोप की गोलीबारी का शोर होता रहा और मैं तीन बार उठी, लेकिन चूंकि स्कूल नहीं जाना था इसलिए सुबह मैं देर से दस बजे उठी। इसके बाद में मेरी सहेली आई और हमने गृहकार्य के बारे में बात की।
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आज 15 जनवरी है। कल से तालिबान का फ़रमान जारी होना है और मैं और मेरी सहेली इस तरह से स्कूल के होमवर्क के बारे में बात कर रहे हैं जैसे कुछ भी असामान्य नहीं हुआ हो।
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आज मैंने अख़बार में बीबीसी उर्दू के लिए लिखी गई अपनी डायरी भी पढ़ी। मेरी मां को मेरा उपनाम 'गुल मकई' पसंद आया और उन्होंने मेरे पिता से कहा, "क्यों न हम इसका नाम बदल कर गुल मकई रख दें?" मुझे भी ये नाम अच्छा लगा क्योंकि मेरे असली नाम का मतलब है 'शोक में डूबा हुआ इंसान'।
मेरे पिता ने कहा कि कुछ दिन पहले कोई मेरी डायरी का प्रिंटआउट लेकर आया था और उसने कहा कि ये बहुत बढ़िया है। मेरे पिता बताया कि वो सिर्फ़ मुस्कुरा कर रह गए क्योंकि वो तो ये भी नहीं कह सकते थे कि ये सब कुछ मेरी बेटी ने लिखा है।
बुधवार, 14 जनवरी: मैं शायद कभी भी स्कूल न जा सकूं
स्कूल जाते समय मेरा मूड बिलकुल भी अच्छा नहीं था क्योंकि कल से सर्दी की छुट्टियां शुरु हो रही हैं।
प्रिंसिपल ने छुट्टियों की तो घोषणा कर दी लेकिन ये नहीं बताया कि स्कूल दोबारा कब खुलेगा। ये पहली बार है जब ऐसा हुआ है क्योंकि इससे पहले, हमेशा छुट्टी के बाद स्कूल खुलने की तारीख़ बताई जाती थी।
हालांकि प्रिंसिपल ने हमें स्कूल खुलने की तारीख़ न बताने की वजह नहीं बताई है लेकिन मुझे लगता है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि तालिबान ने 15 जनवरी से लड़कियों की पढ़ाई पर प्रतिबंध की घोषणा की है।
इस बार, लड़कियों में छुट्टी को लेकर कोई ज़्यादा उत्साह नहीं था क्योंकि वो जानती थीं कि अगर तालिबान अपना फ़रमान लागू करते हैं तो वो फिर से कभी स्कूल नहीं जा पाएंगी।
हांलाकि, कुछ लड़कियों को उम्मीद थी कि फ़रवरी में स्कूल खुल जाएगा लेकिन बहुत सी लड़कियों ने बताया कि उनकी पढ़ाई जारी रखने के लिए उनके माता-पिता ने स्वात छोड़कर दूसरे शहरों में रहने का फ़ैसला किया है।
चूंकि आज स्कूल का आखिरी दिन है इसलिए मैंने और मेरी सहेलियों ने कुछ और देर खेलने का फ़ैसला किया। मुझे यक़ीन है कि एक दिन स्कूल दोबारा खुलेगा लेकिन घर वापस जाते समय मैं स्कूल की इमारत को ऐसे निहार रही थी कि शायद अब मैं यहां फिर कभी न आ पाऊं।
बुधवार 7 जनवरी: न गोलीबारी, न डर
मैं मोहर्रम की छुट्टियों के लिए बुनैयर आई हूं. मुझे यहां के पहाड़ और हरे-भरे खेत बहुत पसंद हैं। मेरी स्वात घाटी भी बेहद ख़ूबसूरत है लेकिन वहां शांति नहीं है। लेकिन यहां बुनैयर में शांति और अमन है। और यहां गोली-बारी या किसी तरह का डर भी नहीं है। हम सब यहां बहुत ख़ुश हैं।
आज हम पीर बाबा की मज़ार पर गए। वहां बहुत सारे लोग थे। यहां लोग प्रार्थना करने आए हैं जबकि हम यहां घूमने आए हैं। दुकानों पर चूड़ियां, कान की बालियां, हार और तरह-तरह के नकली ज़ेवर बिक रहे हैं। मैंने सोचा कि मैं कुछ खरीदूं लेकिन कुछ भी ख़ास नहीं लगा। हां, मेरी अम्मी ने कान के बुंदे और चूड़ियां खरीदी।
सोमवार 5 जनवरी: रंगीन पोशाकें न पहने
मैं स्कूल के लिए तैयार हो रही थी और वर्दी पहनने ही वाली थी कि मुझे याद आया कि प्रिंसिपल ने हमसे स्कूल की वर्दी नहीं पहनने के लिए कहा है। उन्होंने कहा है कि हमें सादे कपड़ों में स्कूल आना होगा। इसलिए मैंने अपनी पंसदीदा गुलाबी रंग की पोशाक पहनी है। स्कूल की बाकी लड़कियां भी रंग-बिरंगी पोशाकों में थीं और स्कूल में घरेलू माहौल लग रहा था।
मेरी सहेली ने मुझसे पूछा, "ख़ुदा के लिए, सच-सच बताओ कि क्या हमारे स्कूल पर तालिबान हमला करेगा?" सुबह असेंबली में हमसे कहा गया था कि हम रंग-बिरंगे परिधान न पहने क्योंकि तालिबान को इस पर आपत्ति होगी।
स्कूल से आकर दोपहर के खाने के बाद मेरी ट्यूशन थी। शाम को मैंने टीवी खोला तो पता चला कि शाकारद्रा में 15 दिन बाद कर्फ्यू हटा लिया गया है। ये सुनकर मैं बहुत ख़ुश थी क्योंकि हमारी अंग्रेज़ी की टीचर उस इलाके में रहती हैं और अब शायद वो स्कूल आ पाएंगी।