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पाकिस्तानी मौलाना ने ऐसे फैलाया जिहाद, जिसके चक्कर में बर्बाद हुईं लाखों जिंदगियां

Fri, 08 Apr 2016 02:00 PM IST
इनेस बोवेन/बीबीसी मैगजीन
इनेस बोवेन/बीबीसी मैगजीन Updated Fri, 08 Apr 2016 02:00 PM IST
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maulana masood azhar part 2
ब्रिटेन में जिहाद लाने वाला मौलाना - फोटो : Getty

बीबीसी की जांच में पता चला है कि ब्रिटेन में चरमपंथ के बीज 1993 में देवबंदी मस्जिदों के ज़रिए पाकिस्तानी चरमपंथी मसूद अजहर ने ही बोए थे। मसूद अज़हर के अल कायदा से जुड़ने के बाद देवबंदी मस्जिदों ने उन्हें समर्थन देना बंद किया या नहीं या ये सिर्फ दिखना बंद हो गया, ये बहुत साफ नहीं है।

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अल-कायदा के पूर्व सदस्य ऐमेन डीन एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें इस मामले की जानकारी भीतर तक थी और जो बात करने को भी तैयार थे। अल क़ायदा के पूर्व सदस्य को ब्रितानी गुप्तचर एजेंसी सेवा ने 1998 में अपने साथ कर लिया था। तब डीन ओसामा के एजेंडे को लेकर असहज हो रहे थे। डीन ब्रितानी गुप्तचर सेवा एमआई5 के लिए आठ साल तक 'अंडरकवर' काम करते रहे। इस बीच उन्होंने तालिबान के नियंत्रण वाले अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद अल-क़ायदा नेटवर्क से संबंध जारी रखा। वह कहते हैं, "9/11 से पहले इसमें कोई शक नहीं था कि देवबंदी अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का समर्थन करते थे।" अज़हर जैसे तालिबान ख़ुद को देवबंदी कहते थे। ऐमेन डीन ब्रिटेन की कई देवबंदी मस्जिदों में तक़रीर करते थे। वह कहते हैं, "ब्रिटेन के कई मस्जिद देवबंदी एकता के नाम पर 9/11 के बाद भी तालिबान के समर्थन पर अड़ी हुई थीं।"
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डीन मंच से जिहाद की खुली वकालत नहीं किया करते थे। इसके बजाय वह इस्लामिक इतिहास जैसे सीधे साधे विषयों पर बात किया करते थे। हालांकि अपने भाषणों के सिलसिले में डीन जिहादियों से सहानुभूति रखने वालों के संपर्क में आए जो उन्हें अपने घरों में निजी बैठकों के लिए आमंत्रित किया करते थे। ऐमेन डीन अल-क़ायदा के संस्थापक सदस्यों में से थे, जो 1998 में राह बदलकर ब्रिटेन की सुरक्षा और गुप्तचर सेवाओं एमआई5 और एमआई6 के जासूस बन गए। पीटर मार्शल से बातचीत में उन्होंने बताया कि वो अफ़ग़ानिस्तान और लंदन में चरमपंथी इस्लाम के ख़िलाफ़ जंग में पश्चिम के सबसे अहम एजेंट हुआ करते थे। ब्रिटेन के सबसे अहम देवबंदियों में से एक का नाम कई सारे चरमपंथी समूहों के प्रकाशनों में बार-बार नज़र आता है। पहले छपे जिहादी प्रकाशनों से पता चलता है कि मैनचेस्टर में रहने वाले विद्वान डॉक्टर ख़ालिद महमूद का संबंध मसूद अज़हर से 1993 से ब्रिटेन दौरे से पहले से था। पाकिस्तान में 1991 की हरकत-उल-मुजाहिदीन की सभा में महमूद वक्ताओं में शामिल थे। वह कहते हैं कि वह वहां आध्यात्मिक मुद्दों पर बात करने गए थे और चरमपंथ और हिंसा की किसी भी सूरत में अनदेखी नहीं कर सकते। जैसा कि दूसरे ब्रितानी देवबंदी विद्वानों के साथ देखने में आया, अज़हर की मैग़ज़ीन के पन्नों से महमूद का ज़िक्र 9/11 से ठीक पहले ग़ायब हो जाता है। हालांकि उनका नाम पाकिस्तान में शिया मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों की हत्याओं के लिए ज़िम्मेदार सिपह-ए-सहाबा की पत्रिका में नज़र आता है।

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ऐमेन डीन ने ब्रिटेन की कई देवबंदी मस्जिदों में तक़रीर की है। एक रिपोर्ट के अनुसार जब सिपह-ए-सहाबा के नेता आज़म तारिक़ ने 1995 में ब्रिटेन का दौरा किया था, तब महमूद और उन्होंने स्कॉटलैंड में एक ही कार्यक्रम में तक़रीर की थी। महमूद कहते हैं कि वह इन कार्यक्रमों में पूरे समय मौजूद नहीं थे इसलिए यह नहीं जानते कि आज़म तारिक़ समेत अन्य वक्ताओं ने क्या कहा। 2000 में छपी सिपह-ए-सहाबा के इतिहास के पहले खंड की भूमिका का श्रेय डॉक्टर महमूद को दिया गया है। वह कहते हैं कि उनके नाम का ग़लत इस्तेमाल किया गया है। हालांकि सिपह-ए-सहाबा पर 2001 में ब्रिटेन में प्रतिबंध लग गया था इसके बावजूद महमूद ने दिसंबर 2013 में दक्षिण अफ़्रीका में एक कॉंफ्रेंस को संबोधित किया जिसमें सिपह-ए-सहाबा के प्रमुख मोहम्मद अहमद लुधियानवी ने भी भाषण दिया था।

महमूद कहते हैं कि वह हमेशा से ही सार्वजनिक रूप से विचारों के आदान-प्रदान के हिमायती रहे हैं जिसका से मतलब यह भी होता है कि आप ऐसे लोगों के साथ मंच साझा करते हैं जिनके विचारों से आप सहमत नहीं होते। महमूद का नाम मुसलमानों के अल्पसंख्यक अहमदी समुदाय के ख़िलाफ़ अभियान चलाने वाले आलमी मजलिसे तहफ़्फ़ुजे ख़ातमे नुबुव्वत के कॉंफ़्रेंस के कार्यक्रमों और प्रकाशनों में भी मिलता है। एएमटीकेएन की पाकिस्तानी वेबसाइट में छपी सामग्री के अनुसार अहमदी सुन्नी इस्लामी विचारधारा को मानने से इंकार करते हैं जिसके लिए वो वाजिब अल-क़त्ल हैं, यानि उन्हें मारा जा सकता है। एएमटीकेएन ब्रिटेन में एक कानून सम्मत संगठन है और चैरिटी कमीशन में पंजीकृत है।

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मसूद अज़हर, सिपह-ए-सहाबा और एएमटीकेएन के बीच एक संबंध नज़र आता है। सिपह-ए-सहाबा के दिवंगत नेता आज़म तारिक़ अज़हर के नज़दीकी सहयोगी थी। इसके अलावा सिपह-ए-सहाबा के प्रकाशनों में जिनका लोगों का ज़िक्र है वह एएमटीकेएन से भी जुड़े हुए लगते हैं। सऊदी अरब के एक वरिष्ठ देवबंदी विद्वान अब्दुल हाफ़िज़ मक्की तीनों आंदोलनों के रिकॉर्ड्स में नज़र आते हैं। ग्रुप के प्रकाशन के अनुसार ब्रिटेन के सबसे महत्वपूर्ण इस्लामिक विद्वान शेख यूसुफ़ मोटाला एएमटीकेएन और सिपह-ए-सहाबा पर प्रतिबंध लगने से पहले इनके अगुआओं में शामिल थे।


शेख यूसुफ़ मोटाला अब इन समूहों और मसूद अज़हर के जिहादी संदेशों के बारे में क्या सोचते हैं? उर्दू में हाथ से लिखी एक टिप्पणी में उन्होंने कहा कि वह हमेशा ही ऐसी गतिविधियों से नफ़रत करते रहे हैं और उन्होंने अपने विचार एक किताब में प्रकाशित भी किए हैं। "पिछले कुछ दशकों से मैंने न तो मसूद अज़हर और उनके संगठन का नाम अपनी तक़रीरों में ग़लती से भी नहीं लिया है, न ही मैंने किसी क़िस्म के किसी विनाशवादी चरमपंथी गतिविधि के बारे में बात की है।" वस्तुतः बरी में उनके मदरसे का चरित्र भी मसूद अज़हर के जिहादी उपदेशों से कहीं दूर नज़र आता है।

जनवरी 2016 में ऑफ़्स्टेड (Ofsted) के आकस्मिक निरीक्षण में पाया गया कि विद्यार्थियों को 'मूलभूत ब्रितानी मूल्यों - जैसे कि लोकतंत्र, क़ानून का राज, वैयक्तिक स्वतंत्रता, अलग-अलग मज़हबों को मानने वालों के प्रति पारस्परिक आदरभाव और सहनशीलता' की गहरी समझ थी। यह एक उदारवादी सोच है जो अन्य जगहों में भी देवबंदी दायरे में नज़र आती है। लंदन में एक नए इस्लामिक मदरसे के लिए धन संग्रहण के लिए बरी में शिक्षित एक लोकप्रिय युवा उपदेशक ने सभी धर्मों के लिए सम्मानपूर्वक बात की।

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लंदन में युवा देवबंदी स्नातकों की चलाए जा रही एक अंशकालिक एकेडमी में सांप्रदायिक नज़रिया न अपनाने की बात कही जाती है और उसमें गैर-मुसलमान बच्चे भी आ रहे हैं। लेकिन पाकिस्तान के धुर दक्षिणपंथी धार्मिक-राजनीतिक आंदोलनों का प्रभाव अब भी ब्रिटेन के देवबंदी नेटवर्क में मौजूद है। हालांकि उनके बीच बहुत से लोग हैं जो नरमपंथी लेकिन उनके पास सांस्थानिक शक्ति बहुत कम है। लंदन के बाहर प्रभाव क़ायम करने का संघर्ष ख़ासतौर पर मुश्किल नज़र आता है। जब हाल ही में बीबीसी ने यह रहस्योद्घाटन किया कि ग्लासगो की केंद्रीय मस्जिद की प्रबंधन समिति के एक वरिष्ठ सदस्य सिपह-ए-सहाबा में पदाधिकारी थे तो मस्जिद प्रबंधन ने उन्हें इस्तीफ़ा देने को नहीं कहा। ग्लासगो केंद्रीय मस्जिद के एक सदस्य ने कहा कि वो हाल में सामने आई बातों से अचंभित हैं लेकिन वो कि इस बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं बोलना चाहते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनके और उनका परिवार ख़तरे में पड़ सकता है। उनका डर हाल में चुनी गई एक धार्मिक सभा को पद छोड़ने के लिए मजबूर किए जाने पर थी।

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मिडलैंड्स में इस्लाम को मानने वाले देवबंदी मुसलमान ने मुझे बताया कि उन्हें जातीय हिंसा के प्रचार के अलावा अन्य मुद्दों पर चिंता जताने के कारण धर्म से बाहर करने और हिंसा की चेतावनी दी गई। नक़ाब पहनने वाली एक देवबंदी महिला ने भी अन्य धर्मों के बारे में सकारात्मक विचारों को बढ़ावा देने की कोशिशों को लेकर कुछ इसी तरह की बात बताई। इस तरह के धार्मिक रूढ़िवाद की वजह से उन लोगों को, जो उस तरह के हुलिये में दिखने वाले लोग जो मुस्लिमों से संबंधित किए जाते हैं, चिंतित ग़ैर-मुसलमान आबादी के दुराग्रह का शिकार होना पड़ता है। लेकिन इन लोगों को अपने बीच के कुछ लोगों में मौजूद अतिवाद की क़ीमत चुकानी पड़ती है। तीनों मामलों में जिन्हें धमकाया गया 'माफ़िया' शब्द का इस्तेमाल किया गया था। एक व्यक्ति कहते हैं, "जो भी एक सही, उदार समाज के लिए काम करना चाहता है उसे किसी न किसी रूप में इन मुद्दों से निपटने में सहयोग करना चाहिए।" "हो सकता है कि इन मदरसों से टक्कर लेना समझदारी न हो लेकिन इन बातों को सामने लाया जाना चाहिए।"

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