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मलाला की किस्मत बदली, स्वात रहा अछूता
बीबीसी हिंदी
Updated Thu, 28 Mar 2013 03:19 PM IST
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लड़कियों की शिक्षा के लिए आवाज़ बुलंद करने वाली पाकिस्तान की मानवाधिकार कार्यकर्ता मलाला युसुफज़ई की अपनी ज़िंदगी में पिछले एक साल में बड़ा बदलाव आया है।
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स्वात में तालिबान की तरफ से मौत की धमकी झेल रही मलाला अब इंग्लैंड में एक अच्छे स्कूल में तालीम पा रही हैं। साथ ही उनकी जीवनी लिखने के लिए मलाला के साथ तीन मिलियन डॉलर यानी करीब 15 करोड़ रुपए का करार किया गया है।
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लेकिन मलाला के घर स्वात और आसपास के इलाकों में शिक्षा और सुरक्षा के हालात अब भी नहीं बदले हैं।
मंगलवार को ही पाकिस्तान के खैबर प्रांत में एक महिला शिक्षक शाहनाज़ नाज़ली की हत्या कर दी गई।
सुरक्षा के सवाल
पिछले साल 15 साल की मलाला को अक्तूबर महीने में तालिबान ने उस समय निशाना बनाया था जब वो बस में अपने स्कूल से वापस लौट रही थीं।
मलाला को सिर में गोलियां लगी थीं और उन्हें इलाज के लिए ब्रिटेन लाया गया था।
बीबीसी के मैथ्यू बैनिस्टर से बातचीत में पाकिस्तान की राजनीति में सक्रिय नादिया शेर खान ने कहा कि स्वात में कुछ भी नहीं बदला है।
मलाला पर हमला होने के बाद स्थानीय सरकार ने स्वात के इकलौते महिला कॉलेज को मलाला का नाम दे दिया।
लेकिन वहां के लोगों का कहना है कि ये सिर्फ सतही कदम है और असलियत में महिलाओं की शिक्षा के लिए कुछ नहीं हो रहा है।
उसी कॉलेज में पढ़ने वाली एक छात्रा शहनाज़ कहती हैं, "जब नाम बदला गया तो पहले कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई लेकिन जब मलाला की बड़ी तस्वीर कॉलेज में लगाई गई तब लोगों ने विरोध किया। उन्हें डर है कि कहीं तालिबान हमला न कर दे।"
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विरोधों के बीच घरेलू प्रशासन ने निर्धारित समय से एक हफ्ते पहले कॉलेज में सर्दी की छुट्टी कर दी।
शिक्षा में मुश्किल
इलाके में लड़कियों को पढ़ाई में परेशानी पर एक दूसरी छात्रा शादाब कहती हैं, "स्कूल में बहुत भीड़ है। मैं बीएससी में पढ़ती हूं और मेरी क्लास में सौ छात्राएं हैं। चालीस मिनट की क्लास में 15 मिनट तो सिर्फ रजिस्टर में उपस्थिति दर्ज कराने में निकल जाता है।"
शादाब के पिता कहते हैं, "बच्चियां घर से स्कूल कैसे जाएं ये भी बड़ी समस्या है क्योंकि कॉलेज कोई यातायात उपलब्ध नहीं कराता और हमें निजी वाहनों पर उन्हें भेजना पड़ता है। मां-बाप के दिलों में हमेशा यही बात चलती रहती है कि उनके बच्चे सुरक्षित घर लौट आएं।"
नादिया शेर खान कहती हैं कि अगर लड़कियां पढ़ भी लें तो उसके बाद उन्हें कुछ काम नहीं मिलता है जिससे बड़ी मुश्किल से ली गई तालीम भी ज़ाया हो जाती है।