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मलाला: एक बच्ची जो बन गई उम्मीद
बीबीसी हिंदी/रिफतुल्लाह औरकजई
Updated Mon, 12 Nov 2012 02:41 PM IST
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तालिबान के हमले का शिकार बनी मलाला युसुफजई अब अंतरराष्ट्रीय मीडिया की आंखों का तारा हैं। लेकिन जिस माहौल में मलाला ने अपने खुले विचारों को परवान चढ़ाया, वो बेहद चुनौतीपूर्ण थे।
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पाकिस्तान की बच्ची मलाला 2009 में उस वक्त सुर्खियों में आईं जब उन्होंने बीबीसी उर्दू के लिए उपनाम से डायरी लिखनी शुरू की थी।
ये ऐसा वक्त था जब स्वात घाटी पर चरमपंथियों का लगभग पूरी तरह कब्जा हो गया था। तालिबान ने लड़कियों के स्कूल जाने पर पाबंदी लगा दी थी और उनके डर के कारण कोई चरमपंथियों के खिलाफ जुबान नहीं खोलता था।
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स्वात घाटी के केंद्र मिंगोरा में हालात ऐसे हो गए थे कि रोजाना जब लोग सुबह को उठते तो उन्हें शहर के चौराहों या खंभों से लटकी हुई या गला रेंती हुई लाशें मिलती थीं। कई लोगों को इस वजह से मार दिया गया क्योंकि उन पर तालिबान का विरोध करने का आरोप भर लगा था।
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इन्हीं हालात में मलाला मिंगोरा में रह कर भी बाकायदी से बीबीसी ऊर्दू के लिए डायरी लिखती रहीं जिसमें वो वहां के हालात और चरमपंथियों के जुल्मो-सितम की कहानियां बयान करती थीं।
मलाला का सफर
स्वात में मई 2009 में जब सेना ने अपना अभियान शुरू किया तो वहां रहने वाले बहुत से लोगों को अपने घर छोड़ कर जाना पड़ा। मलाला और उनका परिवार भी मिंगोरा से अपने गृह नगर शांगला चले गए। लेकिन मलाला वहां से भी लिखती रहीं।
लेकिन मलाला का ब्लॉग विश्व स्तर पर उस वक्त चर्चा में आया जब 2010 के अंत तक स्वात में सरकार का नियंत्रण बहाल हो गया और देशी-विदेशी मीडिया ने वहां जाकर तालिबानी दौर के बारे में स्टोरी करनी शुरू कीं।
ये वो वक्त था जब अंतरराष्ट्रीय मीडिया में मलाला यूसुफजई पर काफी कुछ लिखा जाने लगा। 2011 में हॉलैंड के एक अंतरराष्ट्रीय संगठन ने मलाला को बच्चों के शांति पुरस्कार के लिए नामजद किया गया।
ये अवॉर्ड तो मलाला को नहीं मिला, लेकिन इसके लिए नामजदगी ने ही उन्हें शोहरत दिला दी। उस वक्त 13 साल की मलाला को पाकिस्तान में एक सिलेब्रिटी का दर्जा मिल गया।
उस वक्त ये राज भी खुल गया कि मलाला ही गुल मकई के नाम से बीबीसी ऊर्दू के लिए डायरी लिखती है और वो मिंगोरा रहती है और सामाजिक कार्यकर्ता जिया उद्दीन यूसुफजई उसके पिता हैं।
खुले विचारों की पैरोकार
दिसंबर 2001 में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने मलाला को राष्ट्रीय युवा शांति पुरस्कार से सम्मानित किया।
मलाला के पिता जियाउद्दीन यूसुफजई स्वात में एक खुले विचारों वाले सामाजिक कार्यकर्ता माने जाते हैं। वो ग्लोबल पीस नाम के संगठन के अध्यक्ष और स्वात अमन जिरगे के प्रवक्ता भी रह चुके हैं। ये दोनों ही संगठन स्वात में शांति कायम करने की कोशिशों में योगदान देते रहे हैं।
हालांकि हर बच्चे की परवरिश में उसके पिता का अहम योगदान होता है लेकिन मलाला के मामले में ये बेहद महत्पूर्ण रहा।
मलाला अपने सभी साक्षात्कारों में खुले विचारों की बहुत पैरवी करती रही हैं और मीडिया ने उनकी इस बात को इतना उभारा है कि एक मौके पर ऐसा लगने लगा कि जैसे वो पाकिस्तान में खुले विचारों का एक प्रतीक बनती जा रही है।
इसीलिए वो चरमंथियों का निशाना भी बनीं। फिलहाल ब्रिटेन में इलाज करा रहीं मलाला उन बहुत सी बच्चियों के लिए उम्मीद हैं जो स्कूल जाना चाहती हैं। शांति के पैरोकार भी उम्मीद भरी निगाह से उन्हें देखते हैं।
मलाला के रिश्तेदारों का कहना है कि उसकी उम्र इतनी नहीं कि वो वामपंथी या दक्षिणपंथी राजनीति के महत्व को समझे लेकिन ये उसके पिता ने मलाला की सोच को आकार दिया है। उनके पिता भी यही चाहते थे कि उनकी बच्ची स्वात में एक खुले विचारों वाली लड़की के तौर पर सामने आए।