'खामोशी बेहतर, बोलोगे तो गोली खाओगे'
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
ख़ामोशी बेहतर है, बोलने से क्या होगा। बोलोगे, गोली खाओगे, मरोगे या फिर हो सकता है बच जाओ।
मर गए तो फिर भी आसानी है एक कॉलम की ख़बर तो बनोगे। टीवी पर डेढ़ लाइन का टिकर चलेगा। फ़ेसबुक पर फातिया पढ़ा जाएगा। ट्विटर वाले हीरो कहेंगे।
कोई जवानी की तस्वीर ढूंढकर लगाएगा। कोई आपसे आख़िरी मुलाकात का हाल सुनाएगा। कहेगा बहादुर आदमी था। इस मुल्क के दबे हुए वर्गों की आख़िरी उम्मीद था।
फिर आख़िरी उम्मीद को नहला कर कफ़न पहनाएंगे, मिट्टी के नीचे दबाएंगे, फिर घर आ कर कहेंगे क्या ज़रूरत पड़ी थी बात करने की।
बाक़ी सब भी तो ख़ामोश हैं तो क्या उनके सीनों में दिल नहीं और बात करनी ही थी तो बात करने के और भी तरीक़े हो सकते हैं। अब किसी ने गुस्ताख़ी की है तो सज़ा तो मिलेगी। ख़ुदा जाने और गुस्ताख़ जाने।
आप किधर से मुक़दमा लड़ने चल पड़े और मान लें कि आप मुक़दमा जीत भी जाएं तो ये पैगंबर की शान में गुस्ताख़ी करने वाला कहा जाता? ऐसा इल्ज़ाम लगने के बाद किसी शख्स को देश की सड़कों पर चलते फिरते देखा है?
ख़ामोशी बेहतर है
तो इसीलिए सब जानते हैं कि ख़ामोशी बेहतर है। क्योंकि बोलोगे तो गोली खाओगे और अगर गोली खाकर न भी मरे तो सारी उम्र शर्मिंदा-शर्मिंदा फिरोगे।
इन सवालों के जवाब कैसे दोगे कि क्या हमारे मुजाहिदों का निशाना इतना ही कच्चा है कि तुम्हारे सिर पर गोली नहीं मार सके। क्या हमारी ख़ुफ़िया एजेंसियां इतनी नालायक हैं कि मिलकर एक बंदे को नहीं मार सकती हैं।
या तो देश छोड़ कर भागोगे या सारी उम्र पुलिस की हिरासत में गुजारोगे, ख़ामख्वाह उन बेचारों की ज़िंदगी भी ख़तरे में डालोगे।
अपने हक़ में ईमान वालों से फतवे ढूंढते फिरोगे, देशभक्ति के सर्टिफिकेट तलाशते फिरोगे, चीखोगे कि मैं लिबरल नहीं हूं, सेक्युलर का मतलब वो नहीं होता जो आप समझ रहे हैं।
मैंने सबके लिए इंसाफ़ की बात की थी सिर्फ शिया, बलोच, अहमदी और इस तरह के दूसरे गुस्ताखों के लिए नहीं, कहोगे मैं तो इंसानियत की बात कर रहा था, क्या हमारा धर्म इंसानियत की बात नहीं करता।
सारी उम्र सफ़ाइयां देते फिरोगे और फिर लोग नहीं कहेंगे कि देखो बोलने का बहुत शौक़ है, कितनी गोलियां लगी थीं चार या छह, फिर भी ख़ामोश नहीं हुआ।
किसी के कान में कह लो
पाकिस्तान में पहले भी पत्रकारों पर जानलेवा हमले हो चुके हैं इसीलिए, ख़ामोशी बेहतर है।
अगर बहुत ज्यादा बोलने को दिल करे तो कोई आसपास होगा उसके कान में चुपके से कह दिया करो। टेक्स्ट मैसेज पर आने वाले चुटकुले पढ़ कर हंस लिया करो, फिर आगे भेज दिया करो।
बैठकर आराम से आईपीएल देखा करो, फिर सिर हिला कर कहा करो कि क्या ये मुल्क इसलिए बना था, लेकिन बेहतर यही होगा कि ख़ामोश रहा करो।
कितनी ही हदीसों में ख़ामोशी को अच्छा बताया गया है और अंग्रेजी और उर्दू के कितने ही मुहावरों में ख़ामोशी की शान बयान की गई है। गौतम बुद्ध से लेकर न जाने कितने धुरंधरों ने ख़ामोशी को सराहा है।
हमारे शहरों में ध्वनि प्रदूषण बहुत बड़ी समस्या है। ऐसे में अपना मुंह खोल कर इसमें इज़ाफ़ा क्यों करें। बस साबित हुआ, ख़ामोश रहो इससे पहले कि तुम्हें हमेशा के लिए ख़ामोश कर दिया जाए।