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नवाज को उम्मीद की नजरों से देखता भारत

Wed, 05 Jun 2013 07:52 AM IST
Updated Wed, 05 Jun 2013 07:52 AM IST
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indian hope to nawaz sharif

हलचल और भीड़भाड़ वाले बाजार लाजपत नगर को 1947 में हुए बंटवारे के बाद पाकिस्तान से आए हिंदू और सिख शरणार्थियों के लिए दक्षिण दिल्ली बसाया गया था।

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पंजाबियत के अलावा दोनों देशों के बीच कई सांस्कृतिक और सामाजिक सामनताएं मौजूद हैं, साथ में कुछ कड़वे मतभेद भी।

लाजपत नगर में है इंदरदीप चावला के कपड़ों की दुकान, द कॉटन लॉन। ये दुकान वैसे तो बाज़ार की आम दुकानों की तरह ही लगती है लेकिन इसकी अपनी एक ख़ासियत है। यहां सिर्फ़ पाकिस्तानी कपड़े और डिज़ाइन ही मिलते हैं।
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तनाव का असर कारोबार पर
चावला कहते हैं, “पूरे भारत में पाकिस्तान कपड़ों को सिर्फ़ हम ही आयात करते हैं। ये भारत में हमेशा से लोकप्रिय रहे हैं क्योंकि इनके डिज़ाइन ख़ास होते हैं, रंग बिंदास होते हैं और सबसे बड़ी बात ये है कि उच्च कोटि की गुणवत्ता होती है।”
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लेकिन दोनों देशों के बीच कारोबार करना हमेशा आसान नहीं होता है। वीज़ा सहजता से नहीं मिलते। प्रावधानों में भी बदलाव होते रहते हैं। जब कभी दोनों मुल्कों के बीच तनाव पैदा होता है, उसका असर कारोबार पर ही पड़ता है।

चावला कहते हैं, “हम आपस में पड़ोसी है लिहाजा हमारे रिश्ते बेहतर होने चाहिए। इससे अर्थव्यवस्था को मदद मिलती है। जब अर्थव्यवस्था बेहतर होगी, तो हर चीज़ बेहतर होगी।”

दोनों देशों का आपसी कारोबार 2.6 अरब डॉलर तक पहुंच गया है और ये लगातार बढ़ रहा है। हालांकि इसके दूसरी ओर भारत और चीन ने 2015 तक द्विपक्षीय कारोबार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।

नवाज़ से उम्मीदें
इसमें कोई अचरज की बात नहीं है कि भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक संबंध सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इससे ही यह परिभाषित होता है कि भारत और पाकिस्तान एक दूसरे को किस तरह से देखते हैं।

2008 में मुंबई में हुए चरमपंथी हमले का आरोप जब पाकिस्तान स्थित चरमपंथी संगठनों पर लगा तभी से दोनों देशों के बीच आपसी रिश्तों ख़राब होने लगे।

हालांकि भारत के पास नवाज़ शरीफ़ के समय से जुड़ी अच्छी यादें हैं। उन्होंने 1999 में भारत के साथ एक बेहद अहम समझौता किया लेकिन उसके बाद ही दोनों देशों के बीच सीमा पर युद्ध छिड़ गया और उसके बाद सेना के तख्तापलट ने उन्हें सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

लेकिन विश्लेषक अब भी नवाज़ शरीफ़ को लेकर आश्वस्त नहीं हैं।

सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ कोमोडोर उदय भास्कर ने कहा, “गंभीर मसलों पर वैसे फ़ैसले जो भारत के लिए अहम हो सकते हैं, उन्हें कर पाना इस वक्त पूरी तरह से नवाज़ के हाथों में नहीं है।”

ज़्यादातर विश्लेषकों का मानना है कि यह सब काफी कुछ इस बात पर निर्भर होगा कि नवाज़ शरीफ़ और पाकिस्तान सेना के बीच आपसी रिश्ते कैसे रहते हैं।

चिंताएं भी कम नहीं
एक चिंता की बात ये भी है कि इस बार उन्होंने कट्टरपंथी इस्लामी समूहों से समझौते किए हैं।

उदय भास्कर कहते हैं, “प्रधानमंत्री बनने से पहले ही, दक्षिणपंथी राजनीतिक जमात से समझौता करके उन्होंने काफी कुछ गिरवी रख दिया है।”

भास्कर आगे कहते हैं, “अगर आपको ऐसा लगता है कि आतंक के मुद्दे पर वे पाकिस्तान की नीतियों में बदलाव लाएंगे तो फिर वे उन लोगों से कैसे निबटेंगे जिन लोगों की मदद से वे प्रधानमंत्री बनेंगे।”


इन सबके बावजूद कुछ लोग उन्हें मौका दिए जाने के पक्ष में हैं।

नवाज़ शरीफ़ की जीत पर भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी उन्हें बधाई दी है। इतना ही नहीं शरीफ़ के कार्यभार संभालने से पहले मनमोहन सिंह ने उनके पास विशेष प्रतिनिधि को भी भेजा है।

'अनुभव आएगा काम'
यहां तक कि मुख्य विपक्षी दल और हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी भी नवाज़ शरीफ़ को उम्मीद से देख रही है।

पार्टी की प्रवक्ता निर्मला सीतारमन ने कहा है, “नवाज़ शरीफ़ से हमें काफी उम्मीदें हैं। क्योंकि वे ऐसे नेता के तौर पर उभरे हैं जो समय के साथ काफी परिपक्व हुआ है और अहम मामलों को अच्छी तरह से समझता है।”

निर्मला सीतारमन ने ये भी कहा, “वे अपने अनुभव से भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों को बेहतर बना सकते हैं।”

यही वजह है कि भारत को शरीफ़ के काम काज संभालने का इंतज़ार है। अपने दुकान पर इंदरदीप चावला को भी बेसब्री से इसका इंतज़ार है।

वे कहते हैं, “मेरी तरह वे भी कारोबारी हैं और पंजाबी भी। इससे मदद मिलेगी।”

संजॉय मजूमदार/बीबीसी संवाददाता

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