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पाकिस्तान में हजारा शिया चरमपंथियों के निशाने पर
अंबर शम्सी/बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
Updated Sat, 15 Feb 2014 02:02 PM IST
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पाकिस्तान में हजारा शिया समुदाय के लोग चरमपंथियों के निशाने पर हैं।
जनवरी में बलूचिस्तान में हजारा शिया ज़ायरीन से भरी बस पर हुए एक हमले के बाद देश के प्रमुख शहरों में शिया और हजारा समुदाय के लोगों ने कई शहरों में विरोध किया।
ठीक उसी तरह जिस तरह पिछले साल जनवरी और फ़रवरी में हमलों के बाद किया गया था। पिछले साल हुए इन दो हमलों में ही सौ से अधिक लोग मारे गए थे।
इस्लामाबाद में हुए एक ऐसे ही एक प्रदर्शन में हमारी मुलाकात फ़ातिमा आतिब से हुई। फ़ातिमा से इससे पहले भी हमारी एक मुलाकात साल भर पहले ऐसे ही एक प्रदर्शन के दौरान हुई थी। बीबीसी ने फातिमा से जानने की कोशिश की कि इस एक साल के दौरान क्या बदला है।
खौफ
इस बयान के एक साल बाद फ़ातिमा जब फिर एक दुख और गुस्से से भरे प्रदर्शन में मिलीं तो उन्होंने कहा कि कुछ नहीं बदला है सिर्फ कब्रों की संख्या बढ़ गई है।
उन्होंने कहा, "2013 हमारे लिए एक रक्तरंजित साल रहा है, जिसमें हमने सिर्फ लाशें समेटी हैं।" उन्होंने बताया, "पिछली ईद मैंने अपनी मां के घर क्वेटा में गुज़ारी है, उस ईद के नज़ारे मैं कभी नहीं भूल पाऊंगी।
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मैं तो क्या हमारे समुदाय का हर व्यक्ति उसी मानसिक यातना से गुज़र रहा है। उस दिन पूरे समुदाय का हर व्यक्ति अपने घर से निकलकर कब्रिस्तान पहुंचा हुआ था। घरों में सन्नाटा था और कब्रिस्तान आबाद थे।"
मानवाधिकार
वह कहती हैं, "ये मानवाधिकार वाले बड़ी-बड़ी परिभाषाएं देते घूमते हैं कि ज़िंदा रहने के लिए फलां-फलां चीज़ें चाहिएं।"
"लेकिन हमें तो सिर्फ़ ज़िंदा रहने का हक़ भी नहीं मिल रहा। बाकी सारी चीज़ें तो दूर की बात हैं।" हजारा बिरादरी के अनुसार करीब एक दशक में उनके समुदाय के 1,500 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं।
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जनवरी में बलूचिस्तान में हजारा शिया ज़ायरीन से भरी बस पर हुए एक हमले के बाद देश के प्रमुख शहरों में शिया और हजारा समुदाय के लोगों ने कई शहरों में विरोध किया।
ठीक उसी तरह जिस तरह पिछले साल जनवरी और फ़रवरी में हमलों के बाद किया गया था। पिछले साल हुए इन दो हमलों में ही सौ से अधिक लोग मारे गए थे।
इस्लामाबाद में हुए एक ऐसे ही एक प्रदर्शन में हमारी मुलाकात फ़ातिमा आतिब से हुई। फ़ातिमा से इससे पहले भी हमारी एक मुलाकात साल भर पहले ऐसे ही एक प्रदर्शन के दौरान हुई थी। बीबीसी ने फातिमा से जानने की कोशिश की कि इस एक साल के दौरान क्या बदला है।
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खौफ
इस बयान के एक साल बाद फ़ातिमा जब फिर एक दुख और गुस्से से भरे प्रदर्शन में मिलीं तो उन्होंने कहा कि कुछ नहीं बदला है सिर्फ कब्रों की संख्या बढ़ गई है।
उन्होंने कहा, "2013 हमारे लिए एक रक्तरंजित साल रहा है, जिसमें हमने सिर्फ लाशें समेटी हैं।" उन्होंने बताया, "पिछली ईद मैंने अपनी मां के घर क्वेटा में गुज़ारी है, उस ईद के नज़ारे मैं कभी नहीं भूल पाऊंगी।
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मैं तो क्या हमारे समुदाय का हर व्यक्ति उसी मानसिक यातना से गुज़र रहा है। उस दिन पूरे समुदाय का हर व्यक्ति अपने घर से निकलकर कब्रिस्तान पहुंचा हुआ था। घरों में सन्नाटा था और कब्रिस्तान आबाद थे।"
मानवाधिकार
वह कहती हैं, "ये मानवाधिकार वाले बड़ी-बड़ी परिभाषाएं देते घूमते हैं कि ज़िंदा रहने के लिए फलां-फलां चीज़ें चाहिएं।"
"लेकिन हमें तो सिर्फ़ ज़िंदा रहने का हक़ भी नहीं मिल रहा। बाकी सारी चीज़ें तो दूर की बात हैं।" हजारा बिरादरी के अनुसार करीब एक दशक में उनके समुदाय के 1,500 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं।