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जान बचाने के लिए भटकते परिवार

Sat, 09 Mar 2013 05:42 PM IST
Updated Sat, 09 Mar 2013 05:42 PM IST
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fleeing pakistan's militant infighting

पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर खैबर कबायली इलाके के मोहम्मद सईद और मुमताज गुल भी वहां से बेघर होने वाली लोगों की फेहरिस्त में शामिल हो गए हैं और ये सूची लगातार बढ़ती जा ही है।

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इन दोनों लोगों की कहानी भी दर्दनाक और दिल को छू लेने वाली है।

ये दोनों खैबर इलाकों के उन तीन हजार लोगों में शामिल हैं जो हालिया लड़ाई से जान बचाने की खातिर अपना घर-बार छोड़ कर वहां से भागे हैं।

अब वे सरकार से खाना और आसरा पाने के लिए जूझ रहे हैं। अभी ये लोग पेशावर से 30 किलोमीटर दूर पूर्व में जलोजाई शिविर में मौजूद हैं।

36 वर्षीय मोहम्मद सईद बताते हैं कि अधिकारियों का कहना है कि उनके पास हम लोगों के बेघर होने की सूचना नहीं है और इसलिए हमें मदद नही मिल सकती है।

वो आगे कहते हैं, “उनका कहना है कि पहले खैबर के कबायली प्रशासन में हमारा नाम आतंरिक रूप से विस्थापित होने वाले लोगों की सूची में शामिल किया जाएगा और उसके बाद जलोजी शिविर के अधिकारी हमारा रजिस्ट्रेशन करेंगे।”
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दोहरी मार
लाल फीताशाही में फंसे सईद फिलहाल परिवार के साथ एक किराए के मकान में रह रहे हैं जिसके लिए उन्हें हर महीने लगभग दो हजार पाकिस्तानी रुपए चुकाने पड़ते हैं।
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लेकिन सईद और उनके परिवार को दोहरी मार झेलनी पड़ी है। पहले उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए भागना पड़ा और अब मदद के लिए सरकारी विभागों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।

खैबर के तिराह क्षेत्र में तख्ताकाई घाटी में सईद का घर था। वहां फरवरी के पहले सप्ताह में न सिर्फ भारी बर्फबारी हुई बल्कि इलाके पर नियंत्रण के लिए विभिन्न गुटों के बीच भीषण लड़ाई भी शुरू हो गई।

ये क्षेत्र रणनीतिक रूप से खासा अहम माना जाता है। बेहद ऊंचाई वाले इस इलाके से उत्तर में अफगानिस्तान से लगने वाली सीमा पर पाकिस्तान सेना की आपूर्ति और दक्षिण में तालिबान के दबदबे वाले औरकजई इलाके पर बखूबी नजर रखी जा सकती है।

बेबस स्थानीय कबीले
स्थानीय कबीलों ने चार साल तक अपने इलाकों में चरमपंथियों को पांव नहीं जमाने दिए थे। लेकिन जब तहरीके तालिबान पाकिस्तान के लड़ाके अपने प्रतिद्वंद्वी लश्कर-ए-इस्लाम गुट से मिल गए तो स्थानीय कबायली लोग उनके सामने बेबस हो गए।

सईद कहते हैं कि घाटी में दिन भर बम गिरते रहे और शाम तक खबरें आने लगीं कि बाहरी चौकियां ध्वस्त कर दी गई हैं और ज्यादातर स्थानीय लड़ाके मारे जा चुके हैं।

ऐसे में तालिबान से गुस्से से बचने के लिए बहुत से लोग अपने घरों को छोड़ कर भागने लगे। उन्होंने अपने जानवर और सर्दियों के लिए जमा खाने के भंडार भी पीछे ही छोड़ दिए।

सईद कहते हैं कि मेरे परिवार में 13 सदस्य हैं जिनमें तीन महिलाएं और आठ बच्चे शामिल हैं। हम चार दिन तक बर्फीली हवाओं में पैदल चलते रहे और तब जाकर पेशावर पहुंचे।

दर्दनाक दास्तां
वहीं मुमताज गुल की उम्र 50 साल है और वो 25 सदस्यों वाले परिवार के साथ अपनी जान बचाकर भागे। वो ऐसे बच्चों और उम्रदराज लोगों के किस्से सुनाते हैं जो या तो मारे गए या फिर गुम हो गए।

गुल बताते हैं कि लड़ाई से बचकर भागने वाले परिवारों में एक ऐसी भी महिला थी जिसके पास घर से निकलते वक्त अपने 18 महीने के बच्चे को सही से कपड़े पहनाने का भी वक्त नहीं था।

बच्चे को न्यूमोनिया हो गया और वो दूसरे दिन की दुनिया को अलविदा कह गया। वो बताते हैं कि हम दो घंटे के लिए रुके और बच्चे को दफनाया। उसकी मां को समझ ही नहीं आया कि क्या करे।

उसने अपने शॉल के जरिए बच्चे को बचाने की लाख कोशिशें की, लेकिन उसे गर्मी नहीं मिल सकी। उस वक्त हम तीन फीट बर्फ की मोटी परत के बीच से गुजर रही थे।

विस्थापन जारी
सईद बताते हैं कि अपने गांव को छोड़े हुए उन्हें कुछ घंटे हुए थे कि उनके परिवार की एक महिला फिसल गई और उसका टखना टूट गया। इसके बाद सईद और उनके 18 वर्षीय भतीजे को बारी बारी से इस महिला को अपनी पीठ पर बिठाकर चलना पड़ा।

खैबर पख्तून ख्वाह से 2008 में लोगों के विस्तापित होने का सिलसिला शुरू हुआ। तब से प्रांतीय सरकार के पास आंतरिक रूप से विस्थापित हुए 2,98,000 परिवारों का ब्यौरा दर्ज है।


इनमें से अब भी 1,63,000 परिवार विस्थापित हैं। या तो ये विस्थापितों के लिए बने शिविरों में रह रहे हैं या अन्य तरह के सामुदायिक आश्रय स्थलों में जिंदगी काट रहे हैं।

वहीं पहाड़ी कबायली इलाकों में इस्लामी चरमपंथ लगातार परवान चढ़ रहा है और लोगों के वहां से जाने का सिलसिला भी जारी है।

एम इलियास खान
बीबीसी संवाददाता, पेशावर से

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