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भारत-पाक के मां-बाप अपने ही बच्चे चुराते है
Updated Wed, 18 Dec 2013 09:08 PM IST
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ब्रिटेन में माता-पिता के अपने ही बच्चों को बहला-फुसला कर किसी और देश में ले जाने के मामले पिछले एक दशक में दोगुने हो गए हैं।
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विदेश और राष्ट्रमंडल कार्यालय (एफ़सीओ) और सामाजिक संगठन रीयूनाइट का कहना है अदालत के आदेश के विरुद्ध या किसी एक अभिभावक की इजाजत के बिना औसतन रोज दो बच्चों को ब्रिटेन से बाहर ले जाया जा रहा है।
साल 2003-04 में माता-पिता के बच्चों का अपहरण करने के 272 मामले दर्ज किए गए थे जबकि 2012-13 में ऐसे मामलों की संख्या बढ़कर 580 हो गई।
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एफ़सीओ ने इस विषय की पड़ताल करती 'कॉट इन दि मिडिल' नाम की एक फ़िल्म जारी की है। यह फ़िल्म क्रिसमस से पहले चलाए जा रहे जागरूकता अभियान के तहत यू ट्यूब पर जारी की गई है।
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इसका मक़सद इस तरह बच्चों को ले जाने से बच्चों और परिवार को होने वाले स्थायी नुक़सान के बारे में अभिभावकों को बताना है।
हेग समझौता
इस तरह की मामलों को रोकने के लिए 1980 में एक समझौता किया गया था, इसे हेग समझौते के नाम से जानते हैं।
एफ़सीओ का कहना है कि जिन देशों ने हेग समझौते पर दस्तख़त नहीं किए हैं, उन देशों में ले जाए गए बच्चों को वापस ला पाना बहुत ही कठिन काम है।
पाकिस्तान, थाईलैंड और भारत ने दस्तखत नहीं किए हैं। वहीं अमरीका, पोलैंड और आयरिश गणराज्य ने इस पर दस्तख़त किए हैं।
इसके बाद भी 2012-13 में ब्रिटेन से इन देशों में बच्चों को ले जाने के क्रमश: 32, 29 और 28 मामले सामने आए। इसके अलावा ब्रिटेन से पाकिस्तान 35, थाईलैंड 17 और भारत 16 बच्चों को उनके मां-बाप ले गए
रीयूनाइट का कहना है कि अब तक वह इस तरह के 447 मामलों में कार्रवाई कर चुका है, इन मामलों में 616 बच्चे शामिल हैं।
विदेश मंत्रालय के एक उच्च अधिकारी मार्क सायमंड्स का कहना है कि बच्चों को बहला-फुसला कर दूसरे देशों में ले जाने के बढ़ते मामले को लेकर वो चिंतित हैं।
वह कहते हैं कि माता-पिता को इसे एक चेतावनी के रूप में देखना चाहिए कि उनमें से कोई एक बच्चे को कहीं ले जा सकता है। ''एक बार जब बच्चा बाहर चला गया तो उसे वापस ब्रिटेन ला पाना बहुत कठिन हो सकता है।''
एफ़सीओ का कहना कि इन मामलों का समाधान होने में 10 साल तक का समय लग जाता है और कभी तो बच्चा वापस ही नहीं आ पाता।
रीयूनाइट के प्रमुख कार्यकारी अलिसन सालाबी कहते हैं, छुट्टियां परिवारों के लिए बहुत तनावपूर्ण समय होता है, ख़ासकर उन परिवारों में जहाँ माता-पिता अलग हो चुके हैं।
वो कहते हैं, ''पिछले साल हमने इस तरह के 412 मामलों को रोका, इनमें 586 बच्चे शामिल थे। ये मामले दिखाते हैं कि इस तरह आपके साथ न हो, इसके लिए कुछ करने की ज़रूरत है।''
सालाबी कहते हैं कि माता-पिता की ओर से बच्चों को बहला-फुसला कर किसी दूसरे देश में ले जाना केवल विश्वास और किसी ख़ास देश का ही मामला नहीं है।
एफसीओ के मुताबिक़ आमराय के इतर बच्चों को इस तरह बहला-फुसला कर बाहर ले जाने के 70 फ़ीसदी मामलों में माँओं का हाथ था।