क्या ईसा मसीह के वजूद के ऐतिहासिक सबूत मौजूद हैं?
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पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने मुसलमानों के पैगंबर हजरत ईसा मसीह के ऐतिहासिक सबूत के बारे में बयान क्या दिया उसके बाद सोशल मीडिया पर बहसें शुरू हो गईं। इस बहस में इमरान के समर्थक और विरोधी दोनों शामिल थे जो बढ़-चढ़कर अपनी दलीलें दे रहे थे।
दरअसल, इमरान खान ने इस्लामाबाद में इंटरनेशनल रहमतुल लील आलमीन कॉन्फेंरेंस में कहा था कि 'बाकी पैगंबर अल्लाह की ओर से आए थे लेकिन इतिहास में उनका जिक्र ही नहीं है। बड़ा कम जिक्र है, हजरत मूसा का है, मगर हजरत ईसा का इतिहास में जिक्र नहीं है।' लेकिन क्या असल में हजरत ईसा मसीह की जिंदगी के बारे में कोई सबूत मौजूद है? और अगर है तो उनकी हैसियत और प्रकृति क्या है?
हमने इस सिलसिले में कुछ सवालों के जवाब ढूंढने की कोशिश की है और इस दौरान खुद को सिर्फ हजरत ईसा मसीह के बाद गुजरने वाली एक सदी तक ही सीमित रखा है। इसके अलावा हमने सिर्फ गैर-धार्मिक (सेक्युलर) ऐतिहासिक सूत्रों की जांच की है।
सबसे पुराना स्रोत यहूदी इतिहासकार जोजेफ फिलुइस की 20 खंड की किताब 'यहूदियों के कदीम आसार' में पाया जाता है। जिसमें हजरत आदम से लेकर उस दौर तक की स्थिति दर्ज है। यह किताब 93 ईस्वी में लिखी गई, यानी हजरत ईसा मसीह की मौत के 60 साल बाद।
यरुशलम का इतिहास बयान करते हुए जोजेफ एक यहूदी पेशवा अनानूस बिन अनानूस का जिक्र करते हैं जिसने जेम्स नाम के एक शख़्स को पत्थरों से मरवा डाला। हालांकि, उस दौर में जेम्स बहुत आम नाम था इसलिए जोजेफ ने स्पष्ट करने के लिए लिखा, 'जेम्स, ईसा का भाई, जिसे लोग मसीहा कहते हैं।'
बेहद छोटा ही सही लेकिन यह इतिहास में हजरत ईसा मसीह का पहला जिक्र है। इससे जाहिर होता है कि जोजेफ के खयाल में हजरत ईसा उतने जाने पहचाने थे और उनके मसीहा होने की कल्पना इतनी आम थी कि उसे उम्मीद थी कि इस कदर छोटा जिक्र करने भर से उसके पाठकों को जेम्स की पहचान का पता चल जाएगा।
इसी जोजेफ ने एक और जगह हज़रत ईसा का विस्तार से जिक्र किया है। जिसमें उनके सूली पर चढ़ाए जाने और दोबारा उठाए जाने का वर्णन है लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक ये हिस्सा तोड़ा-मरोड़ा गया है और इसे इसाई समर्थकों ने सदियों बाद अपनी तरफ़ से शामिल कर लिया है। हजरत ईसा जिस जगह पैदा हुए और पले-बढ़े वह मूर्ति उपासक रोमनों के प्रभाव में थी और रोमनों ने ही उन्हें सूली पर चढ़ाया था।
हालांकि, इस्लामी मान्यताओं के मुताबिक उनकी शक्ल का एक शख़्स सूली पर चढ़ाया गया था। उस जमाने में रोमन सुपर पावर का दर्जा रखते थे और वहां ज्ञान और कला ने ख़ासी तरक़्क़ी की थी, और इतिहास की किताबें लिखी जा रही थीं। तो क्या उन्होंने पहली सदी ईस्वी में हजरत ईसा का जिक्र किया है? इसका जवाब है एक नहीं कई बार।
पहला जिक्र प्लिनी खोर्द के लेखन में मिलता है। उनके चाचा को प्लिनी बुज़ुर्ग कहा जाता है और वह अग्रणी वैज्ञानिक और दार्शनिक हैं। प्लिनी खोर्द रोमन दरबार से सम्बद्ध थे और उन्होंने इस हैसियत से 247 पत्र लिखे हैं जो बहुत मशहूर हुए और उनसे इस दौर के बहुत से मामलों पर रोशनी पड़ती है।
उनमें से हमारे मतलब का जो पत्र है उसका नंबर दसवां है। प्लिनी सन 112 (यानी ईसा के तकरीबन 79 साल बाद) में इस इलाके के गवर्नर थे जो आज कल तुर्की में शामिल है। एक पत्र में प्लिनी रोमन बादशाह ट्रेजन को खत लिखकर मार्गदर्शन मांगते हैं कि उनके इलाक़े में जो एक नया संप्रदाय ईसाइयत के नाम से आया है, उसके अनुयायियों के साथ क्या सुलूक किया जाए।
वह पूछते हैं कि अगर कोई ईसाई मेरे सामने आकर हमारी मूर्तियों की पूजा करे और हजरत ईसा को बुरा भला कहे तो क्या उसे माफ कर दिया जाए? यह रोमन काल में ईसा का पहला जिक्र है जो हम तक पहुंचा है। इसके बाद हम एक और रोमन इतिहासकार सोई टूनिएस की किताब 'सीज़र की जीवनी' का अध्ययन करते हैं जो सन 115 में लिखी गई थी।
इस किताब में उल्लेख है कि रोमन बादशाह क्लॉडिएस के दौर (सन 41 से 54) में तमाम यहूदियों को रोम से निकाल दिया गया था क्योंकि वह 'क्रिस्तोस' के उकसाने पर शहर में दंगा कर रहे थे। विशेषज्ञों के मुताबिक़ यहां क्रिस्तोस का मतलब क्राइस्ट यानी हजरत ईसा से है। वहीं, सोई टूनिएस ने हजरत ईसा का नाम यूनानी भाषा में गलत लिखा है, यानी Christus की जगह Chrestus।
टिसीटस मशहूर रोमन इतिहासकार हुए हैं जिनकी किताब 'शाही रोम का इतिहास' आज भी पढ़ी जाती है। उन्होंने इस किताब में सन 14 से 68 का इतिहास बयान किया है। आपने सुना होगा कि बादशाह नीरो ने रोम को आग लगवा दी थी और खुद पहाड़ के ऊपर से बांसुरी बजाते हुए शहर के जलने का मंज़र देख रहा था।
बांसुरी बजाने की घटना गलत है लेकिन बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि ख़ुद शहर को आग लगवाने वाली बात में बेहद वजन है क्योंकि नीरो पुराने रोम को जलाकर इसकी जगह नया शहर आबाद करना चाहता था। लेकिनी किसी न किसी तरह ये बात छा गई कि बादशाह ने अपनी राजधानी को राख कर दिया।
जिन लोगों के घरबार जल गए थे उनके अंदर बेचैनी फैल गई और बादशाह को खतरा महसूस हो गया कि कहीं ये चिंगारी भड़क कर उनकी सत्ता को भी रोम की तरह राख न कर दे। इसी वजह से नीरो ने भी वही किया जो उस वक़्त से लेकर आज तक होता चला आया है, यानी किसी कमज़ोर को कुर्बानी का बकरा बना देना।
टिसीटस ने लिखा है कि नीरो ने चुन-चुनकर ईसाई इकट्ठा किए और उन्हें तड़पा-तड़पाकर मरवा डाला। आगे चलकर टिसीटस वर्णन करते हैं, "नीरो ने गलत तरीके से उन लोगों पर आरोप लगाया जिन्हें लोग ईसाई कहते हैं, जिसे प्रांत के खजांची पोंटिएस पायलट ने बादशाह टाइबेराइस के दौर में कत्ल करवा दिया था। लेकिन ये खतरनाक अंधविश्वास अस्थायी रूप से कुचले जाने के बावजूद न सिर्फ़ यहूदियों के इलाके बल्कि शहर (यानी रोम) तक भी फैल गया है।"
आपने देखा कि यहां हजरत ईसा के बारे में कहीं ज़्यादा विस्तार से जानकारी मौजूद है। वहीं, टिसीटस ने भी एक गलती की है। उन्होंने पोंटिएस पायलट को खजांची बताया है। हालांकि, आधुनिक इतिहासकारों के मुताबिक़, वह यहूदी प्रांत का गवर्नर था। तो उस सूली के उन टुकड़ों की क्या हकीकत है जो दुनियाभर के विभिन्न चर्च में पाए जाते हैं और जिनके बारे में कहा जाता है कि वह उसी असली सूली के हिस्से हैं जिस पर हजरत ईसा को चढ़ाया गया था।
इटली के लेखक अंबरतो इको के उपन्यास 'नीम ऑफ द रोज' में एक छात्र अपने शिक्षक से यही सवाल पूछता है तो शिक्षक जवाब देता है कि अगर वह तमाम 'असल' सूलियां इकट्ठा की जाए तो उनसे एक छोटा मोटा जंगल तैयार हो जाएगा। सूलियां एक तरफ लेकिन ऊपर की गई बहस से जाहिर है कि हजरत ईसा का जिक्र इतिहास में विभिन्न समय और विभिन्न स्रोतों की शक्ल में हमारे सामने आता है।