हाफिज सईद पर अमेरिका नरम क्यों?

Samarth SaraswatSamarth Saraswat Updated Tue, 26 Nov 2013 05:21 PM IST
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america soft behaviour on hafiz

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भारत और अमेरिका के दबाव के बावजूद मुंबई हमलों के लिए कथित रूप से ज़िम्मेदार लश्कर-ए-तैयबा के ख़िलाफ़ पाकिस्तान में अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
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लश्कर पर काम कर रहे विशेषज्ञों और अमेरिका में कुछ ही समय पहले जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में उसकी जड़ें अब काफी गहरी हो चुकी हैं।
पाकिस्तानी विश्लेषक और लेखक आरिफ जमाल लंबे अर्से से लश्कर पर काम कर रहे हैं और उनकी किताब 'कॉल फ़ॉर ट्रांसनेशनल जिहाद' जनवरी में प्रकाशित हो रही है।
उनका कहना है कि पिछले चार सालों में लश्कर काफ़ी ताकतवर हो चुका है और उसकी जड़ें अब सिर्फ़ पाकिस्तान के पंजाब सूबे में ही नहीं बल्कि बलूचिस्तान, सिंध और ख़ैबर पख़्तूनख्वाह सूबों तक फैल चुकी है।

लश्कर-ए-तैयबा अब पाकिस्तान में एक समाजी सियासी तंज़ीम जमात उद दावा के नाम से सक्रिय है।

आरिफ़ जमाल कहते हैं, "मुंबई हमलों के एक साल बाद तक तो उन पर सख़्ती थी, लेकिन अब उन्हें खुली छूट मिली हुई है।"

आतंकवाद के ख़िलाफ़ शोध करने वाली संस्था अमेरिकी सैन्य अकादमी की एक रिपोर्ट के अनुसार ऐसे भी मामले हैं जहां लश्कर चरमपंथी का भाई या पिता पाकिस्तानी फ़ौज या वायुसेना में काम करते हों।

रिपोर्ट की सहलेखिका क्रिस्टीन फ़ेयर का कहना है कि कुछ चरमपंथियों के संबंध ऐसे परिवारों से भी हैं जिनके सदस्य भारत के ख़िलाफ 1965 और 1971 की लड़ाई में शामिल रहे हैं।

वो कहती हैं, "एक मामला ऐसा भी दिखा, जिसमें एक लश्कर चरमपंथी के चाचा पाकिस्तानी आणविक ऊर्जा संगठन में कार्यरत हैं।"

पाकिस्तानी हुक़ूमत

पाकिस्तानी हुक़ूमत और फ़ौज दोनों ही लश्कर के साथ किसी तरह के संबंध से इन्कार करते हैं।

लश्कर-ए-तैयबा के नेता हाफ़िज सईद पाकिस्तान में बेरोकटोक घूमते हैं और रैलियों में भारत और अमेरिका के ख़िलाफ़ भाषण देते हैं। आरिफ जमाल का कहना है कि मीडिया भी उन्हें बढ़ावा देता है।

उनका कहना है, "पाकिस्तानी टीवी पर हाफ़िज सईद एक बहुत बड़ा चेहरा है और टीवी प्रस्तोता उन्हें एक इस्लामी विद्वान, एक आलम-ए-दीन, एक मज़हबी नेता की तरह पेश करते हैं न कि एक जिहादी के तौर पर।"

ऐसे में क्या कोई पाकिस्तानी हुक़ूमत चाहे भी तो लश्कर के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है?

अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रह चुके हुसैन हक्कानी का कहना है कि यह अब किसी हुकूमत के लिए आसान नहीं है।

उनका कहना है, "पाकिस्तान में अभी भी आम राय हर किसी तरह की दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ वैसी नहीं है, जैसी होनी चाहिए और इससे लश्कर की ताक़त और बढ़ी है।"

हक्कानी कहते हैं कि अगर कोई लश्कर की आलोचना करता भी है, तो उसे अमेरिका का एजेंट कहकर चुप करा दिया जाता है।

अल कायदा
पांच साल पहले मुंबई में हुए हमले के बाद लश्कर-ए-तैयबा ने कोई बहुत बड़ा हमला नहीं किया है।

लेकिन अमेरिकी ख़ुफिया एजेंसी सीआईए के कई पूर्व अधिकारी और विश्लेषकों का कहना है लश्कर-ए-तैयबा अब सिर्फ़ भारत के ख़िलाफ काम करने वाला संगठन नहीं रहा। उसके तार अल क़ायदा से जुड़ चुके हैं।

हुसैन हक्कानी कहते हैं अब अमेरिका में भी लश्कर को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।

उनका कहना है, "अगर भविष्य में फिर कोई हमला हुआ तो अमेरिका से लश्कर के ख़िलाफ़ सख़्त से सख़्त कार्रवाई की मांग बढ़ सकती है।"

मुंबई हमलों में जो मारे गए उनमें छह अमेरिकी भी थे और पिछले सालों में लश्कर नेताओं के अमेरिका विरोधी सुर और तीखे हुए हैं, लेकिन अमेरिका ने लश्कर पर कभी सीधा वार नहीं किया है।

विश्लेषकों का कहना है कि फ़िलहाल अमेरिका पाकिस्तान को और नाराज नहीं करना चाहता लेकिन उनका ख़याल है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज की वापसी के बाद हालात बदल सकते हैं।
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