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पाकिस्तान का मंसूबाः वित्त मंत्री का एलान, देश में 2027 तक ब्याजमुक्त बैंकिंग सिस्टम करेंगे लागू
Wed, 09 Nov 2022 10:15 PM IST
Amit Mandal
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, इस्लामाबाद
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, इस्लामाबाद
Published by: Amit Mandal
Updated Wed, 09 Nov 2022 10:15 PM IST
सार
वित्त मंत्री इशाक डार ने कहा कि हमारी सरकार पूरी कोशिश करेगी कि पाकिस्तान में जितनी जल्दी हो सके इस्लामी व्यवस्था को लागू करने की कोशिश करेगी। तत्कालीन पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज सरकार ने इस फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी।
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इशाक डार
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
एक महत्वपूर्ण कदम के तहत पाकिस्तान के वित्त मंत्री इशाक डार ने बुधवार को घोषणा की कि देश 2027 तक इस्लामी कानून के तहत एक ब्याज मुक्त बैंकिंग प्रणाली की ओर बढ़ जाएगा। यह घोषणा वित्त मंत्री डार ने सरकार द्वारा एक शरिया अदालत के फैसले के खिलाफ अपील वापस लेने की जानकारी देने के साथ हुई। फेडरल शरीयत कोर्ट ने अप्रैल में फैसला दिया था कि पांच साल में देश से ब्याज खत्म किया जाए। फेडरल शरीयत कोर्ट (FSC) के अनुसार, पाकिस्तान में प्रचलित ब्याज-आधारित बैंकिंग प्रणाली शरिया कानून के खिलाफ है क्योंकि इस्लाम में ब्याज को किसी भी रूप में गलत माना गया है।
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वित्त मंत्री ने कहा, सुप्रीम कोर्ट से याचिका लेंगे वापस
प्रधानमंत्री की अनुमति और स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के गवर्नर के परामर्श से मैं संघीय सरकार की ओर से घोषणा कर रहा हूं कि एसबीपी और नेशनल बैंक ऑफ पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट से अपनी अपील वापस ले लेंगे। हमारी सरकार पूरी कोशिश करेगी कि पाकिस्तान में जितनी जल्दी हो सके इस्लामी व्यवस्था को लागू करने की कोशिश करेगी, एक रिपोर्ट में डार के हवाले से ये जानकारी दी गई। उन्होंने स्वीकार किया कि एफएससी के फैसले को लागू करने में चुनौतियां होंगी और पूरी बैंकिंग प्रणाली और इसकी प्रथाओं को तुरंत एक नई प्रणाली में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है, लेकिन फिर भी सरकार ने अगले कुछ दिनों में अपील वापस लेने का फैसला किया है।
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पांच साल में फैसला लागू करने के लिए पर्याप्त
डार ने कहा, 20 साल से मामला लंबित होने के बाद शीर्ष इस्लामिक कोर्ट का फैसला आया है। हमारा विचार है कि पांच साल की अवधि हमारे निर्णय को पूरी तरह से लागू करने के लिए पर्याप्त है। जून में स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान जो देश का सर्वोच्च बैंक है, उसने एफएससी के फैसले के खिलाफ वित्त मंत्रालय, कानून मंत्रालय और बैंकिंग काउंसिल के अध्यक्ष के साथ एक याचिका दायर की, जिसमें कहा गया कि एफएससी ने सुप्रीम कोर्ट रिमांड आदेशों पर ध्यान नहीं दिया।
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इसने अनुरोध किया कि संघीय शरीयत न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील की अनुमति दी जाए और निर्णय में उठाए गए बिंदुओं की सीमा में संशोधन किया जाए। डॉन अखबार के अनुसार, देश में ब्याज आधारित बैंकिंग प्रणाली के उन्मूलन के लिए पहली याचिका 30 जून, 1990 को एफएससी में दायर की गई थी। तीन सदस्यीय पीठ ने अपना फैसला सुनाया और 30 अप्रैल, 1992 तक इसे लागू करने की मांग की।
मुस्लिम लीग-नवाज सरकार ने शरिया कोर्ट के फैसले को दी थी चुनौती
तत्कालीन पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज सरकार ने इस फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी। 23 दिसंबर, 1999 को सुप्रीम कोर्ट ने एफएससी के फैसले को बरकरार रखा और फिर से अधिकारियों को 30 जून, 2000 तक इसके कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। इसके बाद 2002 में शीर्ष अदालत में एक समीक्षा अपील दायर की गई और 24 जून, 2002 को संघीय शरीयत अदालत के फैसले को निलंबित कर दिया गया और मामले को ब्याज की व्याख्या के लिए एफएससी को वापस भेज दिया गया था।