Nepal: नेपाल में क्यों इस हद तक फैल गई हैं मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं?
तकरीबन पांच फीसदी महिलाएं और दो फीसदी कहीं अधिक गंभीर समस्या से पीड़ित हैं। ये लोग डिप्रेशन (अवसाद) का शिकार हैं। इसमें अक्सर मायूसी महसूस होना और किसी काम में मन ना लगना शामिल है। 14 फीसदी महिलाएं और सात प्रतिशत पुरुष खुद को हमेशा आक्रोश की भावना से ग्रस्त पाते हैं...
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नेपाल में महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से पीड़ित होने के मामलों में तेजी से उछाल आया है। ऐसी समस्याएं पुरुषों में भी बढ़ी हैं, लेकिन महिलाएं इसका ज्यादा शिकार हुई हैं। यह बात नेपाल के जनसंख्या संबंधी एवं स्वास्थ्य सर्वे-2022 से सामने आई है। इस सर्वेक्षण की अंतिम रिपोर्ट अब जारी कर दी गई है। इसके मुताबिक देश में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से पीड़ितों में महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में दो गुना है।
यह सर्वे नेपाल के स्वास्थ्य एवं जनसंख्या मंत्रालय ने यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (यूसएड) के सहयोग से किया। सर्वे के लिए तकनीकी और वित्तीय सहायता यूएसएड ने उपलब्ध कराई। सर्वे से यह निष्कर्ष सामने आया कि देश की 15 से 49 वर्ष उम्र वर्ग की आबादी में 11 फीसदी पुरुष और 22 फीसदी महिलाएं मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से पीड़ित हैं। इन समस्याओं में अत्यधिक चिंता, घबराहट, हमेशा भयभीत रहना आदि शामिल हैं।
तकरीबन पांच फीसदी महिलाएं और दो फीसदी कहीं अधिक गंभीर समस्या से पीड़ित हैं। ये लोग डिप्रेशन (अवसाद) का शिकार हैं। इसमें अक्सर मायूसी महसूस होना और किसी काम में मन ना लगना शामिल है। 14 फीसदी महिलाएं और सात प्रतिशत पुरुष खुद को हमेशा आक्रोश की भावना से ग्रस्त पाते हैं। 13 फीसदी महिलाएं और सात प्रतिशत पुरुष लगातार नर्वसनेस महसूस करते रहते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक ये मानसिक समस्याएं सामाजिक-आर्थिक पहलुओं का परिणाम हैं। साथ ही मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से ना लेने का चलन भी इसके लिए जिम्मेदार है। नेपाल जैसे गरीब देश में आम स्वास्थ्य देखभाल की व्यवस्था कमजोर है। मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल का सिस्टम आबादी के कुछ हिस्सों को ही उपलब्ध है।
विशेषज्ञों के मुताबिक पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का अधिक संख्या में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से पीड़ित होना एक विश्वव्यापी ट्रेंड है। उनके मुताबिक यहां तक कि विकसित देशों में भी ऐसी समस्याएं महिलाओं को ज्यादा होती हैं। नेपाल मेंटल हॉस्पिटल के निदेशक डॉ. अनंत अधिकारी ने अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘चिंता और डिप्रेशन के कारण अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग होते हैं। इसलिए इलाज में भी सबके लिए अलग नजरिया अपनाने की जरूरत होती है। जिन समस्याओं से देश में हजारों लोग पीड़ित हैं, उनके इलाज पर अब अधिकारियों को विशेष ध्यान देना चाहिए।’
विशेषज्ञों के मुताबिक डिप्रेशन के आम लक्षणों में अक्सर या हमेशा थकान महसूस होना, उत्साह महसूस ना होना और निराशा से घिरे रहना शामिल है। डिप्रेशन के मरीजों को नींद आने में दिक्कत होती है या अगर नींद आ जाती है, तो बार-बार टूटती रहती है। ऐसे लोगों को कोई काम करने में आनंद महसूस नहीं होता।
देखा यह गया है कि चिंताग्रस्त होने की समस्या 40 से 44 वर्ष उम्र वर्ग की महिलाओं में अधिक होती है। लेकिन ऐसा कोई ठोस पैटर्न नहीं है। इसलिए कई बार 15 से 19 वर्ष उम्र वर्ग के लोग भी ऐसी समस्या का शिकार बन जाते हैँ। सर्वे से सामने आया कि अशिक्षित महिलाओं के चिंताग्रस्त होने की आशंका अधिक रहती है।