Nepal: ट्रेड एंड ट्रांजिट एग्रीमेंट के नाम पर चीन ने नेपाल को उल्लू बनाया?
इस समझौते के तहत नेपाल को चीन के चार समुद्री बंदरगाहों- तियानजिन, शेनझेन, लियांयुंगगांग और झेनजियांग का इस्तेमाल करने की सुविधा मिली। इनके अलावा नेपाल को तीन भूमि बंदरगाहों लानझाऊ, ल्हासा और शिगास्ते का इस्तेमाल करने की इजाजत भी मिली...
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नेपाल और चीन के बीच ट्रेड एंड ट्रांजिट एग्रीमेंट (व्यापार और पारगमन समझौते) पर दस्तखत हुए सात साल गुजर गए हैं। इस समझौते के तहत नेपाल को चीन के बंदरगाहों का उपयोग करने की सुविधा मिली थी। लेकिन असल में इस लंबी अवधि में चीनी बंदरगाहों के जरिए नेपाल एक भी खेप मंगवाने में विफल रहा है।
नेपाल और चीन के बीच यह समझौता सात साल पहले भारत के साथ नेपाल के बढ़े तनाव का नतीजा था। आरोप है कि तब नेपाल में नया संविधान लागू किए जाने पर अपनी कथित नाराजगी जताने के लिए भारत ने नेपाल पर ब्लॉकेड (घेराबंदी) लागू कर दिया। उससे बने माहौल के बीच नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने अप्रैल 2016 में चीन की यात्रा की थी। वहां दोनों देशों के बीच ट्रेड एंड ट्रांजिट एग्रीमेंट पर दस्तखत हुए।
इस समझौते के तहत नेपाल को चीन के चार समुद्री बंदरगाहों- तियानजिन, शेनझेन, लियांयुंगगांग और झेनजियांग का इस्तेमाल करने की सुविधा मिली। इनके अलावा नेपाल को तीन भूमि बंदरगाहों लानझाऊ, ल्हासा और शिगास्ते का इस्तेमाल करने की इजाजत भी मिली। समझौते में प्रावधान है कि नेपाल की किसी तीसरे देश से आयात के लिए इन बंदरगाहों का उपयोग कर सकता है। समझौते के तहत नेपाल और चीन के बीच पारगमन के लिए छह विशेष ट्रांजिट स्थलों के इस्तेमाल की इजाजत भी नेपाल को मिली थी।
सात साल पहले इस समझौते को लेकर नेपाल में गहरे संतोष का भाव देखने को मिला था। नेपाली अधिकारियों ने उसके तुरंत बाद उन प्रोटोकॉल को अंतिम रूप देने पर बातचीत शुरू कर दी थी, समझौते को लागू करने के लिए जिन पर सहमति जरूरी थी। नेपाल की तत्कालीन राष्ट्रपति बिद्यादेवी भंडारी ने अप्रैल 2019 में चीन की यात्रा की थी। उस दौरान संबंधित प्रोटोकॉल्स पर भी दस्तखत हो गए।
लेकिन अब नेपाल के उद्योग, वाणिज्य और आपूर्ति मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया है कि पिछले सात साल में एक भी खेप का आवागमन नहीं हुआ है। आरोप है कि चीन ने प्रोटोकॉल्स को लागू नहीं किया। कुछ समय पहले नेपाल ने इस सिलसिले में जरूरी बैठक बुलाने का आग्रह चीन से किया था। लेकिन अब तक चीन से कोई जवाब नहीं आया है। मंत्रालय के संयुक्त सचिव ने मीडियाकर्मियों को बताया- ‘हमने चार महीने पहले साझा बैठक के लिए अनुरोध भेजा था, ताकि प्रोटोकॉल्स पर अमल हो सके। लेकिन अब तक चीन ने कोई जवाब नहीं भेजा है।’
यह समझौता करने के पीछे सोच यह थी कि नेपाल चीन की पाइपलाइन का इस्तेमाल करते हुए कजाखस्तान से पेट्रोलियम पदार्थ अपने यहां ला सकेगा। चीन में नेपाल के राजदूत रह चुके महेश मास्के ने कहा है- हमें पूरा भरोसा था कि हम कजाखस्तान के साथ ऐसा करार कर लेंगे। लेकिन कजाखस्तान से पेट्रोलियम पदार्थ लाने में ना के बराबर कामयाबी ही मिली।
नेपाल दशकों से किसी तीसरे देश से सामान मंगाने के लिए भारत पर निर्भर रहा है। भारत के साथ उसका सड़क संपर्क भी मजबूत है। लेकिन सात साल पहले उसने चीन पर भरोसा करके भारत का विकल्प ढूंढने की कोशिश की। लेकिन अब साफ है कि इस कोशिश में उसे निराशा हाथ लगी है।