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बाइडन ने चीन के प्रति नरमी के दिए संकेत, जिनपिंग से की फोन पर बात
Thu, 11 Feb 2021 04:31 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Thu, 11 Feb 2021 04:31 PM IST
सार
- एक-दूसरे से मिलकर आपसी समस्याओं और मतभेदों को दूर करने की पहल
- आंतरिक स्थिति मजबूत करने की दिशा में अमेरिका ने बनाई रणनीति
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Joe Biden and Xi Jinping
- फोटो : PTI (File Photo)
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विस्तार
जो बाइडन ने गुरुवार सुबह (भारतीय समय के अनुसार) अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से पहली बार फोन पर बातचीत की। इस दौरान उन्होंने हांगकांग और शिजियांग प्रांत में मानव अधिकारों के कथित हनन जैसे मुद्दे भी उठाए। उधर शी ने कहा कि चीन और अमेरिका के बीच अकेला सही रास्ता सहयोग है, क्योंकि टकराव दोनों देशों को विनाश की तरफ ले जाएगा। उन्होंने कहा कि दोनों देशों को एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए और अपने मतभेदों को रचनात्मक ढंग से हल करना चाहिए।
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जाहिर है, अमेरिका और चीन के राष्ट्रपतियों की बातचीत में जो अपेक्षित था, वो तमाम बातें इस दौरान दोहराई गईं। एक तरह से यह औपचारिक वार्ता थी। इसीलिए दोनों देशों के संबंधों की भावी दिशा के बारे में इससे कोई स्पष्टता बनने की संभावना पहले से नहीं थी।
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इस बात से वाकिफ बाइडन प्रशासन के अधिकारियों ने दोनों राष्ट्रपतियों की बातचीत से ठीक पहले चीन के बारे में नए राष्ट्रपति की नीतियों के बारे में अमेरिकी मीडिया को जानकारी दी। इसमें बताया गया कि चीन के मामले में बाइडन प्रशासन पूर्व ट्रंप प्रशासन की किन नीतियों को आगे बढ़ाएगा, और किन नीतियों या रुख में वह बदलाव लाएगा। इसके मुताबिक चीन के ‘अनुचित’ व्यापार व्यवहारों, हांगकांग में कार्रवाई, शिनजियांग में मानव अधिकारों के कथित हनन और पास-पड़ोस में चीन के शक्ति प्रदर्शन के प्रति नए प्रशासन के तहत अमेरिका सख्त रुख अपनाएगा। लेकिन कोरोना महामारी, जलवायु परिवर्तन, परमाणु अस्त्र प्रसार आदि जैसे मामलों में उसका रुख सहयोग का होगा।
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बाइडन प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अमेरिकी मीडिया से कहा- ‘ट्रंप प्रशासन ने गुजरे चार साल में क्या किया, उस पर हमने गौर किया है। हमने पाया कि चीन के साथ सघन प्रतिस्पर्धा के लेकर उसका नजरिया सही था। लेकिन उस प्रतिस्पर्धा में ट्रंप प्रशासन जिस तरह शामिल हुआ, हमें उस तरीके से समस्या है। उसके कारण प्रतिस्पर्धा में हमारी स्थिति कमजोर हुई है।’
जानकारों के मुताबिक बाइडन प्रशासन की निगाह में ट्रंप के रुख में मुख्य खामी यह थी कि उसके कारण अमेरिकी शक्ति के मुख्य स्रोत कमजोर हो गए। ट्रंप प्रशासन के नजरिए के कारण अमेरिका के उसूलों, उसकी घरेलू राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था, उसके गठबंधनों और अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व में सेंध लग गई। इसलिए बाइडन प्रशासन ने अमेरिकी स्थिति को मजबूत करने का रोडमैप तैयार किया है। इसके लिए पांच सूत्री कार्यक्रम तैयार किया गया है।
बाइडन प्रशासन की रणनीति में सबसे ऊंची प्राथमिकता घर संभालने पर है। उसकी समझ है कि अगर अमेरिका अपनी अर्थव्यवस्था की मरम्मत नहीं कर सका, आविष्कारों में बढ़त हासिल नहीं कर सका और अपने औद्योगिक ढांचे को पुनर्निमित नहीं कर पाया, तो बाकी सारी रणनीतियों का फेल होना तय है। इस रोडमैप में चीन का मुकाबला करने के लिए अमेरिका के सहयोगी देशों के साथ संबंध मजबूत करने को दूसरे नंबर पर रखा गया है। इनमें यूरोप और एशिया के देश शामिल हैं। खासकर बाइडन प्रशासन चौगुट यानी क्वैड (अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के समूह) को खास महत्व देगा।
बाइडन प्रशासन के रोडमैप में तीसरा सूत्र तकनीकी धार हासिल करना है। इसके लिए वह सेमीकंडक्टर्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बायोटेक और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्रों में भारी निवेश करने का इरादा रखता है। यह संभव हो सके, इसके लिए ये प्रशासन रिपब्लिकन पार्टी के साथ बातचीत शुरू करेगा, ताकि सीनेट में निवेश संबंधी मंजूरियों की राह में उसके सीनेटर बाधक ना बनेँ। इस खाके का चौथा बिंदु व्यापार है। अधिकारियों ने कहा है कि फिलहाल बाइडन प्रशासन ट्रंप के दौर में लगाए गए शुल्कों में बदलाव नहीं करेगा। पूरी समीक्षा के बाद ही इस मामले में कोई फैसला होगा।
व्यापार नीति के मामले में राष्ट्रपति बाइडन सहयोगी देशों खासकर यूरोपीय देशों से राय-मशविरा करके ही कोई फैसला लेंगे। बाइडन प्रशासन की चीन नीति का आखिर पहलू रक्षा क्षेत्र में मजबूती है। इसे दिखाने के लिए ही अमेरिका ने दक्षिण चीन सागर में मुक्त नौवहन पर जोर डाला है और अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर इसकी शुरुआत भी कर दी है। इसके अलावा बाइडन प्रशासन एशिया में मौजूद अमेरिकी सैनिकों की संख्या में कोई कटौती नहीं करेगा।
अधिकारियों के मुताबिक बाइडन प्रशासन अपनी समीक्षा से इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि अमेरिका के सहयोगी एशियाई देश अमेरिका की पुरानी भूमिका निभा सकने की क्षमता और उसके संकल्प को लेकर चिंतित हैं। खासकर ट्रंप प्रशासन के अस्थिर रुख के कारण उनमें अमेरिका को लेकर अविश्वास भी पैदा हो गया है। इसलिए अगले छह से आठ महीनों तक अमेरिका को आगे बढ़कर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में मजबूत भूमिका निभानी होगी, ताकि वह यह संदेश दे सके कि चीन के साथ निर्णायक रूप से पेश आने को वह तैयार है।
विश्लेषकों का कहना है कि जो रोडमैप बाइडन प्रशासन ने सामने रखा है, उससे यही संकेत मिलता है कि उसकी विदेश नीति में एशिया-प्रशांत क्षेत्र सबसे अहम होगा। यानी बाइडन प्रशासन इस निष्कर्ष पर है कि 21वीं सदी में इतिहास की मुख्य कथा एशिया-प्रशांत क्षेत्र में लिखी जाएगी।