Israel: उग्र दलों के समर्थन से सरकार चलाना आसान नहीं होगा नेतन्याहू के लिए
Israel: नेतन्याहू इसके पहले 14 वर्ष प्रधानमंत्री पद पर रह चुके हैं। लेकिन इस बार जब वे इस पद पर आ रहे हैं, तब अंतरराष्ट्रीय हालात बदले हुए हैं। ईरान के साथ उनके रिश्ते हमेशा बेहद तनावपूर्ण रहे। इस बीच अंतरराष्ट्रीय मंच पर ईरान की भूमिका बढ़ी है...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
बेंजामिन नेतन्याहू जल्द ही एक बार फिर इस्राइल के प्रधानमंत्री का पद संभालेंगे। लेकिन समझा जाता है कि इस बार उन्हें अधिक चुनौती भरे घरेलू और अंततराष्ट्रीय माहौल के बीच काम करना होगा। देश के अंदर इस्राइल के कब्जे में मौजूद फिलस्तीनी इलाकों में उन्हें पहले से ज्यादा मुश्किलें पेश आएंगी। इसकी वजह उनके गठबंधन में ऐसे दलों की बढ़ी भूमिका है, जो फिलस्तीनी आबादी के खिलाफ सख्त रुख रखते हैं।
नेतन्याहू इसके पहले 14 वर्ष प्रधानमंत्री पद पर रह चुके हैं। लेकिन इस बार जब वे इस पद पर आ रहे हैं, तब अंतरराष्ट्रीय हालात बदले हुए हैं। ईरान के साथ उनके रिश्ते हमेशा बेहद तनावपूर्ण रहे। इस बीच अंतरराष्ट्रीय मंच पर ईरान की भूमिका बढ़ी है। यूक्रेन युद्ध में रूस ने जिस तरह वहां बने ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल किया है, उससे ईरान को अब अधिक मजबूत शक्ति के रूप में देखा जा रहा है। इसके अलावा उसके परमाणु कार्यक्रम को नियंत्रित रखने के लिए पश्चिमी देशों के साथ बातचीत टूट जाने के बाद आशंका है कि ईरान जल्द ही परमाणु हथियार बनाने में सफल हो सकता है।
नेतन्याहू के नेतृत्व वाले नए गठबंधन में उग्र रुख रखने वाले दल शामिल हैं। इन दलों का रुख न सिर्फ फिलस्तीनियों, बल्कि ईरान को लेकर भी खासा गरम है। इस वजह से समझा जाता है कि नेतन्याहू के लिए इन दोनों पक्षों से किसी प्रकार की सहमति बनाना बहुत कठिन होगा। ऐसे में खास कर फिलस्तीनी मामले में इस्राइल के अपने खास समर्थक देश अमेरिका से रिश्तों में भी पेंच आ सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन फिलस्तीनियों के प्रति नरम रुख अपनाने के समर्थक हैं। वे इस्राइल के साथ ही अलग देश के रूप में फिलस्तीन की स्थापना के भी समर्थक हैं।
इस्राइल की राजनीति में नेतन्याहू का उदय 1990 के दशक में हुआ था। उन्हें इस्राइल की स्थापना में शामिल रहे मशहूर नेताओं की पीढ़ी के बाद का सबसे बड़ा नेता समझा जाता है। नेतन्याहू का उदय फिलस्तीनियों के प्रति सख्त रुख के इजहार के साथ हुआ था। इसके पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री यित्जाक राबिन ने फिलस्तीनी नेतृत्व के साथ शांति समझौता किया था। उससे नाराज एक इस्राइली आतंकवादी ने 1995 में राबिन की हत्या कर दी। विश्लेषकों के मुताबिक उस घटनाक्रम के बीच नेतन्याहू ने इस्राइली यहूदियों के उग्र मानस को समझा और उस पर अपनी सियासत खड़ी की।
इसके बावजूद माना जाता है कि अपने पिछले कार्यकाल तक नेतन्याहू अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक तरह का संतुलन बनाए रखने में सफल हुए थे। इसी को उनकी खास सियासी महारत माना जाता है। लेकिन इस बार वे ऐसे दलों के समर्थन से सरकार बना रहे हैं, जो फिलस्तीनियों से किसी प्रकार की नरमी के खिलाफ हैं।
इससे आशंकित फिलस्तीनी नेता महमूद अब्बास ने पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से फोन पर बातचीत की। इस दौरान ने बाइडन ने उन्हें आश्वस्त किया कि अमेरिका दो राष्ट्र सिद्धांत पर कायम है और वह इस्राइल के कब्जे वाले इलाकों में शांति बनाए रखने के लिए काम करेगा। लेकिन दो राष्ट्रों के सिद्धांत के मुताबिक अलग देश के रूप में फिलस्तीन की स्थापना पर बातचीत शुरू करने की कोई पेशकश उन्होंने नहीं की। इससे फिलस्तीनी उम्मीदों को झटका लगा। साथ ही इससे उस क्षेत्र में अशांति पैदा होने की आशंका बढ़ी है। ऐसा हुआ तो नेतन्याहू को अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा।