क्या अफगानिस्तान में तालिबान बनेगा राजनीतिक दल?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बुधवार 28 फरवरी को अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने तालिबान के सामने अपने प्रशासन का सबसे साहसी शांति प्रस्ताव रखा। उन्होंने ये बात 'पहले से किसी भी शर्त को रखे बिना' कही। इस प्रस्ताव में उन्होंने तालिबान के साथ न केवल बातचीत का प्रस्ताव दिया बल्कि अपने कार्यालय में उसे एक वैध राजनीतिक इकाई के तौर पर मान्यता देने की बात भी कही।
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति ने कहा, "हम सभी अफगानियों के लिए एक शांतिपूर्ण और प्रतिष्ठित जीवन का रास्ता प्रशस्त करने में विश्वास रखते हैं।" उन्होंने आगे कहा कि, "शांति स्वीकार करें और इसे सम्मान से स्वीकार करें।"
नागरिकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा
हाल में काबुल में हुए एक धमाके में 100 से ज्यादा लोग मारे गए थे, इस धमाके की जिम्मेदारी तालिबान ने ली थी। इसके खिलाफ गनी ने काफी तीखी प्रतिक्रिया दी थी। कुछ सप्ताह पहले उन्होंने तालिबान की निंदा करते हुए कहा था कि अफगान सरकार "अपने लोगों के खून का बदला लेगी।"
आम नागरिकों को निशाना बनाने की वजह से तालिबान को आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। इसके बाद उसने इन हमलों को उचित ठहराते हुए बयान जारी किया था। उसका कहना था कि उनका निशाना केवल "अमरीका और आक्रमणकारी देशों के नागरिक थे।"
जनवरी 2018 में हुआ हमला बीते कुछ सालों में ऐसा सबसे बड़ा कोई आत्मघाती हमला था। 15 फरवरी को अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन की रिपोर्ट में बताया गया था कि सरकार विरोधी तत्वों के हमलों में नागरिकों को जानबूझकर निशाना बनाया गया और 2017 में हुए हमलों में मारे गए लोगों में 27 फीसदी आम नागरिक थे। यहां तक कि काबुल वार्ता के दौरान अफगान मीडिया केंद्रों ने एक घटना को रिपोर्ट किया था जिसमें दक्षिणी प्रांत के उरुजगान में तालिबान ने 19 लोगों को अगवा किया था और छह पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी थी।
एक आखिरी प्रयास?
तालिबान की शांति
गनी के प्रस्ताव पर अभी तालिबान ने आधिकारिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। तालिबान के प्रवक्ता ने 28 फरवरी को बीबीसी अफगान सेवा को बताया था कि वे फिलहाल इस प्रस्ताव पर अपने समूह के बड़े नेताओं की प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहे हैं। 1 मार्च को तालिबान ने वाइस ऑफ जिहाद वेबसाइट पर एक लेख प्रकाशित किया जिसे खालिद अफगानजई नामक व्यक्ति ने लिखा था, इस लेख में उन्होंने शांति प्रयासों की जमकर आलोचना की।
लेख में लिखा गया है, ''तालिबान ने हमेशा से यही कहा है कि लड़ाई के पीछे उनका सबसे प्रमुख उद्देश्य विदेशियों को अफगान धरती से बाहर करना है, जब तक विदेशी उनकी जमीन पर नौकरी करते रहेंगे तब तक किसी तरह की शांति प्रक्रिया बेबुनियाद है।'' इससे पहले भी तालिबान ने अफगान सरकार के साथ बातचीत करने के तमाम प्रस्ताव ठुकरा दिए थे। तालिबान हमेशा से ही अफगान सरकार को 'कठपुतली का प्रशासन' कहता आया है।
अमेरिकी कांग्रेस और वहां की जनता के नाम एक ओपन लेटर प्रकाशित होने के दो हफ्ते के भीतर ही 26 फरवरी को तालिबान ने एक बयान जारी किया जिसमें उन्होंने शांतिपूर्ण समाधान के लिए अपनी तरफ से एक रास्ता भी सुझाया, इस बयान में कहा गया था कि अमरीका कतर में मौजूद तालिबान के राजनीतिक दफ्तर के साथ सीधी बातचीत करे।
'अफगान-नेतृत्व अफगान-स्वामित्व' वाली शांति प्रक्रिया
तालिबान की तरफ से दिए गए बातचीत के ताजा प्रस्ताव पर अमरीका ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया है। अमरीकी सरकार 'अफगान नेतृत्व और अफगान स्वामित्व' वाली शांति प्रक्रिया के लिए ही प्रतिबद्ध है। अमेरिकी गृह मंत्रालय ने 27 फरवरी को कहा, ''अंततः इस राजनीतिक स्थिति का एक राजनीतिक समाधान होना चाहिए। और अगर तालिबान बातचीत करने के लिए तैयार है तो यह सबसे बेहतर विकल्प हो सकता है, निश्चित तौर पर अमरीकी सरकार की भी इसमें अहम भूमिका रहेगी।''
वहीं पाकिस्तान की तरफ देखें तो उसने भी गनी के प्रस्ताव का स्वागत किया है, पिछले कुछ महीनों से अमरीका ने पाकिस्तान पर तालिबान और हक्कानी नेटवर्क को मदद पहुंचाने के आरोप लगाए हैं जिससे पाकिस्तान पर दबाव भी बढ़ा है। पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नसीर खान जनजुआ ने कहा, ''पाकिस्तान में शांति के लिए अफगानिस्तान में शांति होना बेहद जरूरी है, पाकिस्तान प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय राजनीतिक सुलह की कोशिशों का समर्थन करता है।''
तालिबान के साथ होने वाली किसी भी शांति प्रक्रिया की कोशिश में पाकिस्तान का समर्थन बेहद आवश्यक है। काफी समय पहले अफगानिस्तान सरकार ने पाकिस्तान पर तालिबान को आर्थिक मदद पहुंचाने और अपने क्षेत्र में शरण देने के आरोप लगाए थे।
तालिबान के पास क्या विकल्प?
तालिबान के पास सीधे तौर पर दो रास्ते हैं- पहला तो वह ग़नी के प्रस्ताव को ठुकरा दे और सीधे अमरीका से बातचीत करने की बात पर टिका रहे, दूसरा वह प्रस्ताव को मान ले और अपने हथियार डाल दे। पहला रास्ता अपनाने पर यथास्थिति ही लंबे समय तक बरकरार रहेगी, और इस लंबे संघर्ष में कोई भी पक्ष जीतता हुआ नज़र नहीं आता। अमरीकी राष्ट्रपति का भी कहना है कि वह अफगानिस्तान में अमरीकी सेना की कार्रवाई की समयसीमा बेवजह नहीं बढ़ाना चाहते।
वहीं अगर तालिबान दूसरा रास्ता अपनाता है तो निश्चित तौर पर शांति प्रक्रिया की तरफ यह अहम पहल होगी। एक अफगान विशेषज्ञ जमशीदी ने नूर टीवी चैनल के साथ बातचीत में कहा, ''अगर तालिबान इस प्रस्ताव को मान जाता है तो इसका मतलब है कि काबुल वार्ता एक अच्छे माहौल में हुई थी।''
वैसे अगर तालिबान अफगानिस्तान सरकार के प्रस्ताव को मान भी लेता है फिर भी उसके भीतर मौजूद तमाम दूसरे नेतृत्व उसमें बाधा खड़ी कर सकते हैं। पिछले कुछ महीनों में तालिबान के दो प्रमुख धड़े बन गए हैं। एक मुल्ला हेबतुल्लाह अखुंद्जादा के नेतृत्व वाला और दूसरा मुल्ला रसूल के नेतृत्व वाला।
दोनो ही धड़े एक दूसरे से विपरीत कार्य करते नजर आते हैं। एक जहां शांति प्रयासों की तरफ अग्रसर है तो दूसरा उसे मानने से इंकार करता है। और अगर तालिबान आधिकारिक तौर पर भी इस प्रस्ताव को मान लेता है, तब भी यह मानना मुश्किल है कि उसके सदस्य आसानी से हिंसा का रास्ता छोड़ देंगे। जैसा कि अफगान मामलों के जानकार सलीम सफी ने पाकिस्तान के चैनल दुनिया में 28 फरवरी को कहा था, ''तालिबान अफगानिस्तान में शांति बहाल करने के लिए एकजुट और उतना ताकतवर नहीं है।''