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पुराने अखबारों से बन सकती है बड़े पैमाने पर सस्ती कार्बन नैनो ट्यूब्स
Mon, 25 Nov 2019 07:26 AM IST
संजीव कुमार झा
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
Published by: संजीव कुमार झा
Updated Mon, 25 Nov 2019 07:26 AM IST
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कार्बन नैनो ट्यूब्स
- फोटो : pixabay
पढ़ने के बाद रद्दी में जाने वाले पुराने अखबारों की मदद से कार्बन नैनो ट्यूब्स को बनाया जा सकता है। इतना ही नहीं यह निर्माण बड़े पैमाने पर भी संभव है। इस कदम से इन ट्यूब्स को पर्यावरण के अनुकूल तरीके को बनाना संभव होगा और इससे इनकी कीमत भी काफी कम हो सकती है।
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अमेरिका में राइस विश्वविद्यालय के भारतीय मूल के शोधकर्ता वरुण शेनॉय गांगोली सहित अन्य शोधकर्ताओं ने बताया कि कार्बन नैनोट्यूब में अविश्वसनीय भौतिक गुण होते हैं। ये गुण उन्हें टच स्क्रीन डिस्प्ले, लचीले इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पाद, एंटीना से लेकर ऊर्जा पैदा करने में सक्षम कपड़ों और 5जी नेटवर्क को बनाने में खासी मदद करते हैं।
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जर्नल ऑफ कार्बन रिसर्च में प्रकाशित इस अध्ययन से पता चलता है कि अखबारों के बड़े सतह वाले क्षेत्र ने रासायनिक रूप से कार्बन नैनोट्यूब को संश्लेषित करने का एक आदर्श तरीका खोज लिया गया है।
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राइस यूनिवर्सिटी के इस शोध के सह-लेखक ब्रूस ब्रिंसन ने कहा कि समाचार पत्रों को रोल-टू-रोल की प्रक्रिया का प्रयोग कम लागत वाली नैनौ ट्यूब्स को बनाने में किया जा सकता है। गांगोली ने कहा टैल्क, चूना यानी कैल्श्यिम कार्बोनेट और टाइटेनियम डाइऑक्साइड सहित कई पदार्थों का उपयोग ऐसे कागजों में साइजिंग में किया जा सकता है जो अवशोषण और अन्य दूसरे स्तर के साथ मदद करने के लिए भराव का काम करते हैं।
इस भारतीय मूल के वैज्ञानिक ने कहा कि हालांकि यह उनका अवलोकन है कि काओलिन साइजिंग, न कि कैल्शियम कार्बोनेट साइजिंग ने दिखाया है कि कैसे वह इस वृद्धि में उत्प्रेरक का काम कर सकता है। उन्होंने कहा कि उनके शोध में लोहे रासायनिक रुप से प्रभावित हो गया।
शोधकर्ताओं ने कहा कि पिछले अध्ययनों से पता चला था कि ग्राफीन जो कि कार्बन परमाणुओं की एक संरचनात्मक रूप से वैकल्पिक व्यवस्था होती है, उसे कार्बन नैनोट्यूब और कार्बन डॉट्स को विभिन्न प्रकार के पदार्थों के साथ संश्लेषित किया जा सकता है। हालांकि इस शोध को सीमित कर दिया गया था।
सभी अखबारों से नहीं बन सकते हैं नैनो ट्यूब्स
हालांकि, शोधकर्ताओं ने कहा कि सभी समाचार पत्रों से यह काम नहीं किया जा सकेगा। इसकी वजह है कि सबकी गुणवत्ता अलग अलग होती है। केवल वही अखबारों से नैनो ट्यूब्स बन सकेंगी जिनमें काओलिन नामक एक चीनी मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है और इसी के परिणामस्वरूप कार्बन नैनोट्यूब का विकास कर पाना संभव होता है।