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ब्रिटेन में भारतीय छात्रों ने पीएम बोरिस को पत्र लिखकर न्याय की अपील की, अंग्रेजी वीजा परीक्षा में नकल का आरोप

Thu, 24 Sep 2020 10:11 PM IST
देव कश्यप पीटीआई, लंदन
पीटीआई, लंदन Published by: देव कश्यप Updated Thu, 24 Sep 2020 10:11 PM IST
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Indian students appeal to UK PM accused of cheating in a compulsory English language six years ago
लंदन में भारतीय छात्र (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock

कई भारतीय छात्रों सहित 200 से अधिक विदेशी विद्यार्थियों ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन को पत्र लिखकर न्याय की गुहार लगाई है। मामला छह साल पुराना है।  जानकारी के मुताबिक, 200 से अधिक विदेशी विद्यार्थियों ने पीएम बोरिस को लिखे पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें छह साल पहले वीजा के लिए हुए अनिवार्य अंग्रेजी भाषा की परीक्षा में उन पर धोखाधड़ी करने का आरोप लगाया गया है। गुरुवार को डाउनिंग स्ट्रीट में जॉनसन को सौंपे गए इस पत्र में इन छात्रों ने उनसे न्याय की गुहार लगाई है।

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बताया जा रहा है कि इस मामले में करीब 34 हजार अंतरराष्ट्रीय छात्र प्रभावित हुए हैं और यह ‘अंतरराष्ट्रीय संवाद के लिए अंग्रेजी की परीक्षा (टीओईआईसी) से संबंधित है जो कुछ छात्रों के वीजा मामलों में अनिवार्य होता है।
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इस मामले में फंसे छात्रों में से अधिकतर भारतीय हैं और इनका कहना है कि वे निर्दोष हैं। ये छात्र सरकार से मांग कर रहे हैं कि उन्हें उनकी बेगुनाही साबित करने का एक मौका दिया जाए।
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पत्र में लिखा है कि ‘हम निर्दोष हैं लेकिन हमारे वीजा को अस्वीकार या निरस्त कर दिया गया था और सरकार ने हमें अपना बचाव करने का कोई मौका नहीं दिया। हमारा भविष्य बर्बाद कर दिया गया और हमें एक साल की कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए छोड़ दिया गया, जिसमें हममें से प्रत्येक पर हजारों पाउंड का खर्च आया।’

जॉनसन को संबोधित पत्र में लिखा है कि ‘हम आपको यह पत्र इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि इस गलत को सही करना आपके अधिकार क्षेत्र में है जिससे हमारे निरोध, निर्वासन और अपमान को समाप्त किया जा सके। हमें एक स्वतंत्र और पारदर्शी योजना स्थापित करके हमें अपनी बेगुनाही साबित करने की अनुमति दें। जिसके माध्यम से हम अपने मामलों की समीक्षा करा सकते हैं।’

समूह को उसके संघर्ष में ‘माइग्रेंट वायस’ के कार्यकर्ताओं और लेबर पार्टी के सांसद स्टीफन टिम्स सहित कई सांसदों द्वारा समर्थन मिला है। इस समूह ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को इस सप्ताह लिखे पत्र में यह भी उजागर करने की कोशिश की है कि कोरोना वायरस महामारी के दौरान उनकी मुश्किलों को कैसे बढ़ाया गया है।

प्रवासी आवाज के निदेशक नाजेक रामदान ने कहा कि 'ये छात्र छह साल से एक बुरे सपने के साथ जी रहे हैं। उनके अधिकारों को छीन लिया गया और उनके भविष्य को नष्ट कर दिया गया है। कई निराश्रित हैं और गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित हैं। इनके पास सबूतों का एक पहाड़ है जो साबित करता है कि वे एक बड़े अन्याय के शिकार हुए हैं और सरकार अब इसे अनदेखा नहीं कर सकती है।'

यह मुद्दा फरवरी 2014 से पहले का है, जब बीबीसी की 'पैनोरमा' पड़ताल में ‘एजुकेशनल टेस्टिंग सर्विस’ (ईटीएस) द्वारा चलाए जा रहे अंग्रेजी भाषा के दो परीक्षा केंद्रों में संगठित धोखाधड़ी के सबूतों को उजागर किया गया था।


पिछले साल, प्रभावशाली लोक लेखा समिति (पीएसी) संसदीय निकाय ने घोटाले पर सरकार की प्रतिक्रिया पर कड़ी फटकार लगाई थी। 'अंग्रेजी भाषा टेस्ट: ए सिस्टेमिक फेल्योर इफेक्टिंग थाउजेंड्स' शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि "चीटिंग के मुद्दे पर गृह कार्यालय की प्रतिक्रिया की गति या तो पूरे जोर से या बहुत धीमी हो गई है, और इसके बीच का कोई रास्ता नहीं बचा है। अपूर्ण साक्ष्य पर कार्रवाई तेजी से की गई है, लेकिन यह संकेत देने के जवाब में धीमा है कि निर्दोष लोगों को इसके कार्यों में पकड़ा गया हो सकता है।" 

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