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श्रीलंका में चीन कैसे बढ़ा रहा है भारत की चिंता

Sun, 30 Jul 2017 05:20 PM IST
बीबीसी हिन्दी
बीबीसी हिन्दी Updated Sun, 30 Jul 2017 05:20 PM IST
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India's concern is growing in Sri Lanka
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चीन और श्रीलंका के बीच दक्षिण समुद्री बंदरगाह हम्बनटोटा को लेकर 1।1 अरब डॉलर का समझौता हो गया है। इस समझौते पर श्रीलंका ने हस्ताक्षर कर दिया है। हम्बनटोटा पर चीन का नियंत्रण होगा और उसे वह विकसित करेगा। यह समझौता महीनों से लटका हुआ था। श्रीलंका की तरफ़ से इस बात की चिंता जताई जा रही थी कि कहीं बंदरगाह का इस्तेमाल चीनी सेना न करने लगे।
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चीन की तरफ़ से श्रीलंका को आश्वासन दिया गया है कि वह बंदरगाह का इस्तेमाल केवल व्यावसायिक रूप से करेगा। हम्बनटोटा का रूट एशिया से यूरोप तक है। श्रीलंका का कहना है कि इस समझौते से मिलने वाली रकम से विदेशी क़र्ज़ चुकाने में उसे मदद मिलेगी।
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विश्लेषकों के अनुसार हम्बनटोटा से भारत के लिए चिंता की बात ये है कि चीन दक्षिण में उसके और क़रीब आ गया है। इस समझौते के मुताबिक चीन की एक सरकारी कंपनी को हम्बनटोटा बंदरगाह 99 साल के पट्टे पर दिया गया है। इसके साथ ही पास में ही क़रीब 15,000 एकड़ जगह एक इंडस्ट्रियल ज़ोन के लिए जगह दी गई है।
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इस परियोजना से हज़ारों लोगों को विस्थापित होना पड़ेगा, लेकिन श्रीलंका के सरकार का कहना है कि वहां के निवासियों को नई जगह पर बसाया जाएगा। श्रीलंका में 26 सालों से जारी एलटीटीई और वहां के सैनिकों का संघर्ष 2009 में ख़त्म हुआ था। इस नागरिक युद्ध के अंत के बाद चीन ने श्रीलंका में लाखों डॉलर वहां के आधारभूत ढांचा के निर्माण में निवेश किया।


हम्बनटोटा बंदरगाह हिन्द महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी के तौर पर देखा जा रहा है। उम्मीद की जा रही है कि चीन के वन बेल्ट वन रोड में इस बंदरगाह की अहम भूमिका होगी। इसे न्यू सिल्क रोड के नाम से भी जाना जा रहा है। इसके तहत चीन और यूरोप को सड़कों और बंदरगाहों से जोड़ने की योजना है।


बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के दक्षिण एशियाई विशेषज्ञ एन्बारसन इथीराजन ने चीन के इस विस्तार पर अपने विश्लेषण में कहा है, ''श्रीलंका का कहना है कि उसे इस समझौते से क़र्ज़ के जाल से निकलने में मदद मिलेगी। श्रीलंका ने सड़क, बंदरगाह और एयरपोर्ट के निर्माण के लिए चीन से अरबों डॉलर का क़र्ज ले रखा है। 2009 में गृह युद्ध के अंत के बाद श्रीलंका तबाह हो गया था।"

India's concern is growing in Sri Lanka
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एन्बारसन ने लिखा है, ''अभी श्रीलंका इस भारी क़र्ज़ को चुकाने के लिेए जूझ रहा है। वहां के अधिकारियों का कहना है कि समझौते से मिली रकम के ज़रिए क़र्ज़ के कुछ हिस्से को चुकाया जाएगा। जो इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं उनका कहना है कि श्रीलंका अपनी महत्वपूर्ण ज़मीन चीन के हवाले कर रहा है।


पड़ोसी देश भारत के लिए चिंता की बात है कि चीन दक्षिण में और क़रीब आ गया है। चीन पाकिस्तान और म्यांमार में पहले से ही बंदरगाह बना रहा है।''


एन्बारसन ने लिखा है, ''ऐसा माना जा रहा है कि इन बंदरगाहों की चीन के वन बेल्ट वन रोड में अहम भूमिका होगी। इन पोर्टों में चीन भारी निवेश कर रहा है। इसे चीन को बाकी दुनिया से व्यापार करने में आसानी होगी। श्रीलंका इस बात को लेकर दृढ़ है कि हम्बनटोटा पोर्ट की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी श्रीलंकाई नौसेना की होगी।


इसके साथ ही किसी भी विदेशी नेवी को यहां बेस बनाने की इजाज़त नहीं होगी। फिर भी यहां सवाल है कि अगर भविष्य में चीन का इतना भारी निवेश ख़तरे में पड़ता है तो वह कितना आक्रामक होगा।''


अपने विश्लेषण में एन्बारसन ने कहा है, ''इन्हीं चिंताओं के बीच श्रीलंकाई सरकार ने घोषणा की है कि इस समझौते को संशोधित किया गया है। इसमें चीनी कंपनी का हिस्सा 70 फ़ीसदी ही होगा। श्रीलंकाई अधिकारियों ने यह भी आश्वासन दिया है कि चीनी आर्मी को इस पोर्ट का इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं होगी।


श्रीलंका के प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे ने शुक्रवार को पत्रकारों से कहा, ''हमलोग देश को एक बढ़िया समझौता दे रहे हैं जिससे सुरक्षा से जुड़ी कोई चिंता नहीं है। श्रीलंका को इससे विदेशी क़र्ज़ चुकाने में मदद मिलेगी।''
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