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Pakistan: टीटीपी से पाक सरकार की जारी बातचीत पर देश में उभर रहे हैं गहरे मतभेद

Wed, 15 Jun 2022 03:05 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, इस्लामाबाद
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, इस्लामाबाद Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 15 Jun 2022 03:05 PM IST
सार

पीपीपी सूत्रों के मुताबिल बिलावल भुट्टो-जरदारी के साथ बैठक में पार्टी नेताओं ने ये सवाल पूछा कि टीटीपी से बातचीत करने के पीछे आखिरी मकसद क्या है। सूत्रों के मुताबिक सत्ताधारी गठबंधन में एक बड़े हिस्से की राय यह है कि पाकिस्तान को टीटीपी के आगे ज्यादा नहीं झुकना चाहिए...

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In the opinion of the Government of Pakistan, progress is being made in its talks with the terrorist organization Tehreek-e-Taliban Pakistan
तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान - फोटो : Amar Ujala (File Photo)

विस्तार

पाकिस्तान सरकार की राय में आतंकवादी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के साथ उसकी बातचीत में प्रगति हो रही है। सत्ताधारी पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) की तरफ से यह दावा भी किया जा रहा है कि उसने जो नीति अपनाई, उसका परिणाम सामने आ रहा है। लेकिन कुछ जानकार ऐसी उम्मीद को बेबुनियाद मानते हैं। उनकी राय है कि टीटीपी अपनी ताकत बढ़ाने के लिए बातचीत की आड़ भर ले रहा है।

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पाकिस्तान सरकार ने अब टीटीपी से प्रस्तावित शांति समझौते पर देश के अंदर आम सहमति बनाने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों से विचार-विमर्श का सिलसिला शुरू करने का फैसला किया है। विदेश मंत्री और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो-जरदारी ने इस मकस से एक समिति बनाई है। ये समिति विभिन्न राजनीतिक दलों से चर्चा करेगी। उसके बाद इस बारे में संसद में चर्चा कराने का इरादा है।

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अफगान तालिबान है मध्यस्थ

बिलावल भुट्टो ने पीपीपी की एक बैठक में टीटीपी के साथ चल रही बातचीत की जानकारी दी। उसी बैठक में तीन सदस्यों की एक समिति बनाने का फैसला हुआ। समिति में कमर जमान कैरा, शेरी रहमान, और फरहतुल्ला बाबर को रखा गया है। टीटीपी के साथ पाकिस्तान सरकार की बातचीत की मध्यस्थता अफगानिस्तान में सत्ताधारी तालिबान कर रहा है। हाल में बातचीत में प्रगति के कारण दोनों पक्षों ने युद्धविराम की अवधि अनिश्चित काल तक के लिए बढ़ाने का फैसला किया था।

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लेकिन सुरक्षा जानकारों के मुताबिक टीटीपी की मुख्य मांगों पर अभी बात ज्यादा आगे नहीं बढ़ी है। इस महीने का आरंभ में टीटीपी ने अफगानिस्तान में अपने समर्थक कबीलों की बड़ी सभा आयोजित की थी। उसमें यह तय हुआ कि पाकिस्तान के प्रांत खैबर पख्तूनवा में संघ शासित कबीलाई इलाकों (फाटा) का विलय करने का फैसला जब तक पाकिस्तान सरकार नहीं पलटती है, तब तक अब आगे कोई और बात नहीं होगी।

पीपीपी सूत्रों के मुताबिल बिलावल भुट्टो-जरदारी के साथ बैठक में पार्टी नेताओं ने ये सवाल पूछा कि टीटीपी से बातचीत करने के पीछे आखिरी मकसद क्या है। सूत्रों के मुताबिक सत्ताधारी गठबंधन में एक बड़े हिस्से की राय यह है कि पाकिस्तान को टीटीपी के आगे ज्यादा नहीं झुकना चाहिए। बल्कि उसे अपनी ताकत को जताते हुए इस आतंकवादी संगठन से बातचीत करनी चाहिए।

सेना ने किया वार्ता का विरोध

टीटीपी से जारी वार्ता के सवाल पर ही बीते हफ्ते इस्लामाबाद स्थित थिंक टैंक पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर पीस स्टडीज ने एक चर्चा आयोजित की। इसमें सांसदों, शिक्षाशास्त्रियों, पूर्व राजनयिकों, सेना के रिटायर्ड अधिकारियों और सुरक्षा एवं अफगान मामलों के विशेषज्ञों ने भाग लिया। इसमें सेना के कुछ अधिकारियों ने टीटीपी से वार्ता का विरोध किया। पूर्व फ्रंटियर कॉर्प्स के कोर कमांडर और इंस्पेक्टर जनरल लेफ्टिनेंट जनरल तारिक खान ने कहा- ‘अगर किसी प्रतिबंधित गिरोह से बातचीत की जा रही है, तो यह सिर्फ उसके सरेंडर करने की शर्तों के बारे में होनी चाहिए।’



नेशनल काउंटर टेररिज्म अथॉरिटी के पूर्व राष्ट्रीय को-ऑर्डिनेटर एहसान ग़नी ने कहा कि टीटीपी के साथ शांति कायम करने में पाकिस्तान सफल होगा, इसकी संभावना कम है। अगर ऐसा कोई समझौता हुआ भी, तो वह आंख में धूल झोंकने वाला होगा और बहुत कम समय तक ही टिक पाएगा।

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