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एक ईरानी महिला ने भारत को कैसा पाया?

Tue, 24 May 2016 12:22 PM IST
बीबीसी/ गुलनूश गुलशानी
बीबीसी/ गुलनूश गुलशानी Updated Tue, 24 May 2016 12:22 PM IST
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ईरानी महिला - फोटो : golnoosh golshani

बात 2004 की है। मैं और मेरी एक दोस्त लंदन में पढ़ रहे थे। वो कोच्चि से हैं और मैं तेहरान से। हम यूनिवर्सिटी के होस्टल में एक ही किचन में खाना पकाते थे। एक दिन जब हम खाना बना रहे थे तो वो मेरी ओर मुड़ी और पूछा कि क्या तुम ईरानी पारसियों के सातवीं सदी में भारत पहुंचने की कहानी के बारे में जानती हो? मैं नहीं जानती थी। इसलिए उसने बताना शुरू किया। 'पुराने लोग बताते हैं कि जब अरबों ने ईरान पर हमला किया, तो पारसियों का एक दल भाग कर भारत चला गया था और वो लोग गुजरात के संजान में पहुंचे थे। पारसियों ने अपना एक प्रतिनिधि वहां के हिंदू राजा जाधवा राणा के पास भेजा। उनके महल में पारसी प्रतिनिधि ने पूछा कि क्या राजा पारसियों को रहने के लिए जगह देंगे।'

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उसने अपनी बात जारी रखी, 'राजा ने उन्हें दूध से पूरी भरी हुई एक कटोरी दिखाई और कहा कि संजान इस कटोरे की तरह है। इसमें दूसरों के लिए कोई जगह नहीं है। पारसी प्रतिनिधि ने एक चुटकी चीनी ली और बिना दूध को कटोरे से बाहर गिराए उसमें डाल दी और कहा, हम इस चीनी की तरह बनने की कोशिश करेंगे। ये चीनी दूध को जैसे मीठा बना देती है वैसे ही हम आपकी जिंदगी में भी मिठास भरने की कोशिश करेंगे।' मेरी दोस्त ने हाथ के इशारे से बताया कि कैसे उस पारसी प्रतिनिधि ने दूध से भरे कटोरे में चीनी डाली होगी। मैंने मुस्कुराते हुए कहा, 'अच्छी कहानी है।'
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पूरे सेमेस्टर मे मैंने और मेरी भारतीय दोस्त ने उत्तरी लंदन के उस नीरस किचन में समय खाना बनाते हुए अपनी संस्कृति को जोड़ने वाली कई छोटी-छोटी चीजों को खोज निकाला था। इनमें कुछ अनोखे शब्द, वाद्ययंत्र, मसाले और पारंपरिक डिजाइन जैसी चीजें शामिल थी। ऐसा लगता था ईरान में लोग भारत को मुख्य तौर पर एक बड़ी चीज के लिए जानते थे, यानी फिल्म हेंदी (हिंदी फिल्मों) के लिए। वे भारतीय फिल्मों में दिखाए जाने वाली नाटकीयता, प्रेम कहानी और नाच-गाने को बहुत पसंद करते थे।
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मैं कुछ ऐसे लोगों को जानती थी जिन्होंने इन फिल्मों को देखकर थोड़ी-बहुत हिंदी सीखी ली थी। फिल्मों के अलावा, हम लोगों ने नादिर शाह के भारत आक्रमण और दरिया-ए-नूर हीरे को ईरान लाने की कहानी पढ़ रखी थी। हम भारत को इसकी विविध भाषाएं और संस्कृति के लिए भी जानते थे। इतना ज्यादा कि हम भारत का जिक्र '72 देशों की भूमि' के तौर पर करते थे। भारत के साथ बने इस नए रिश्ते के बाद मैं इसे वाकई देखना चाहती थी। आखिरकार जब मैं 2013 में यहां पहुंची तो यह मेरी कल्पनाओं से भी कहीं अधिक शानदार निकला।

ईरान के मुकाबले भारत का खाना ज्यादा स्वादिष्ट

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ईरानी महिला - फोटो : golnoosh golshani

मेरी कल्पनाओं के मुकाबले यहां का खाना ज्यादा स्वादिष्ट था, रंग अधिक चटख थे और यहां नजारे बहुत ही विविध और सुंदर थे। इस रंग बिरंगे देश में मेरे पश्चिमी स्टाइल वाली ईरानी पोशाकें फीकी थीं। इसलिए सबसे पहले मैं कोचीन में कुर्ता और सलवार की खरीदारी की। नए पहनावे से मुझे लगा कि मैं भारतीयों जैसी लगूंगी, लेकिन मैं गलत थी। मुझे लगता है कि मेरे घुंघराले बालों ने ऐसा नहीं होने दिया। मैं भारत में तीन हफ्ते तक रही। इस दौरान मैं कोच्चि, दिल्ली, आगरा, उदयपुर, मन्नार और कई अन्य जगहों पर गई।

मैं यहां की खूबसूरती को अपने कैमरे में भी नहीं समेट सकी। इसकी बजाए मैं उदयपुर के महल के ऊपर खड़े होकर खुद को एक राजा समझ कर पूरे शहर को देखने की कोशिश करती थी। या फिर सोचती थी कि सदियों पहले कोई सैनिक कैसे कुंभलगढ़ किले की पहरेदारी करते होंगे। और हर जगह भारतीय लोगों और उनसे होने वाली बातों ने मेरी यात्रा को यादगार बना दिया। भारत में आम तौर ईरानी पर्यटक ज्यादा नहीं आते हैं इसलिए मेरी राष्ट्रीयता लोगों के बीच बातचीत का विषय बन गई थी। वे मुझसे एक औरत के तौर पर ईरान में जिंदगी के अनुभवों के बारे में पूछते और मैं भी भारत में महिलाओं की स्थिति को देख रही थी। 

भारत ऐसे विरोधाभासों के मेलजोल वाला देश है, जो मैंने पहले कभी और कहीं नहीं देखा था। यहां की शासन व्यवस्था लोकतांत्रिक है और लोगों का निजी जीवन बेहद परंपरागत। मैंने अनुभव किया कि यहां महिलाएं कानून से कहीं अधिक परंपराओं से बंधी हुई हैं जो ईरान के मेरे अनुभव से उलट है। अपने देश की महिलाओं के बारे में सोचते हुए मैंने अपनी बहनों के लिए रंगीन कुर्ते और शॉल से सूटकेस भर लिए। जब मैं वापस लौट रही थी तो मुझे उन पारसियों की याद आ रही थी जो 1400 साल पहले भारत आए थे। हम इंसान शायद कभी भी दुनिया में एक जगह से दूसरी जगह जाना नहीं छोड़ेंगे, भले ही हम सभी को दूध में चीनी की तरह न अपनाया जाए।

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