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G7 Meet: हिरोशिमा जी-7 शिखर सम्मेलन पर पड़ गया है अमेरिका के कर्ज सीमा विवाद का साया

Fri, 19 May 2023 03:52 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हिरोशिमा
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हिरोशिमा Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 19 May 2023 03:52 PM IST
सार

अमेरिका ने छह अगस्त 1945 को हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराया था, जिससे हजारों लोग मर गए थे। तब से हिरोशिमा का एक खास प्रतीकात्मक महत्त्व रहा है। जी-7 इस प्रतीक के जरिए रूस को कितना घेर पाएगा, इस पर दुनिया भर से यहां पहुंचे पत्रकार और विश्लेषक कयास लगा रहे हैं...

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G7 Meet: America's debt limit dispute overshadow Hiroshima G7 summit
G7 Summit 2023 - फोटो : Agency

विस्तार

जी-7 शिखर सम्मेलन में भाग लेने आए इस समूह के नेता शुक्रवार सुबह यहां परमाणु बम का शिकार हुए लोगों के स्मारक पर गए। जापान ने सबसे धनी देशों के इस समूह का शिखर सम्मलेन हिरोशिमा में आयोजित करने का फैसला एक खास मकसद से किया था। उद्देश्य इसके जरिए दुनिया को परमाणु बम की विभीषिका की याद दिलाना है, ताकि रूस पर यूक्रेन युद्ध में एटमी हथियारों का इस्तेमाल ना करने के लिए दबाव बनाया जा सके।

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अमेरिका ने छह अगस्त 1945 को हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराया था, जिससे हजारों लोग मर गए थे। तब से हिरोशिमा का एक खास प्रतीकात्मक महत्त्व रहा है। जी-7 इस प्रतीक के जरिए रूस को कितना घेर पाएगा, इस पर दुनिया भर से यहां पहुंचे पत्रकार और विश्लेषक कयास लगा रहे हैं। जबकि आम संकेत यह है कि जी-7 बैठक में अमेरिका में ऋण सीमा को लेकर चल रहा विवाद और चीन से संबंध विच्छेद के मुद्दे छाए हुए हैं। आशंका है कि अगर अगले हफ्ते- दस दिन में ऋण सीमा पर अमेरिका की दोनों प्रमुख पार्टियों में समझौता नहीं हुआ, तो अमेरिका डिफॉल्ट करने (ऋण ना चुका पाने) को मजबूर हो जाएगा। इससे पूरी दुनिया की वित्तीय व्यवस्था हिल जाएगी।

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अमेरिका और जापान के अलावा फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली और कनाडा जी-7 के सदस्य हैं। लेकिन हिरोशिमा शिखर बैठक के मौके पर मेजबान जापान ने भारत, ब्राजील, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीकन यूनियन और प्रशांत महासागर में मौजूद द्वीप देशों के नेताओं को भी यहां आमंत्रित किया है। आयोजन का दायरा चीन को यह संदेश भेजने के मकसद से बढ़ाया गया है कि उसकी ‘आर्थिक जोर-जबर्दस्ती’ के खिलाफ बाकी दुनिया एकजुट है।

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लेकिन जापान सहित कई देशों की नजर इस समय अमेरिका की अंदरूनी सियासी खींचतान पर टिकी हुई है। एशियाई देशों ने अमेरिकी ट्रेजरी बिल में 3.5 ट्रिलियन डॉलर का निवेश कर रखा है। इनमें अकेले जापान का हिस्सा 1.1 ट्रिलियन डॉलर है। अगर अमेरिका ने डिफॉल्ट किया, तो इस निवेश का मूल्य खतरे में पड़ सकता है। विश्लेषकों का कहना है कि ये सारा संकट अमेरिका की अंदरूनी राजनीति के ध्रुवीकरण के कारण खड़ा हुआ है, जबकि उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा।

इन्वेस्टमेंट फर्म पीजीआईएम वधवानी में मुख्य निवेश अधिकारी सुशील वधवानी ने वेबसाइट एशिया टाइम्स से कहा- ‘समझौते की कोशिश में जुटे अमेरिका के राजनेताओं को विश्व बाजार में संभावित उथल-पुथल का पूर्वानुमान जरूर लगा लेना चाहिए।’ विश्लेषकों के मुताबिक हिरोशिमा शिखर सम्मेलन का मकसद चीन के खिलाफ लामबंदी है, लेकिन अमेरिका की अंदरूनी सियासत से पैदा हुई आशंकाएं असल में चीन को फायदा पहुंचा रही हैं। इससे चीन की अपनी मुद्रा युवान को अंतरराष्ट्रीय कारोबार की मुद्रा बनाने के प्रयासों को मदद मिल रही है। जानकारों के मुताबिक अमेरिका की अंदरूनी स्थिति को लेकर आशंकाएं जितनी गहराएंगी, डॉलर को लेकर विभिन्न देशों का भरोसा कमजोर होगा और उसका फायदा युवान को मिलेगा।

विश्लेषकों ने कहा है कि शुक्रवार और शनिवार को होने वाली चर्चा में यहां जुटे जी-7 और आमंत्रित देशों के नेताओं को इस बात का अंदाजा लगाने का मौका मिलेगा, चीन से पूरी तरह संबंध विच्छेद से कितना नफा-नुकसान होगा। फिलहाल, यूरोपीय देश संबंध विच्छेद के लिए तैयार नहीं हैं। उनकी तरफ से पूरे संबंध विच्छेद के बजाय संबंध में जोखिम घटाने (डी-रिस्किंग) की रणनीति पर जोर दिया जा रहा है।

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