European Union: आसान नहीं रूसी तेल पर मूल्य सीमा लगाना, ईयू में उभर आए गंभीर मतभेद
European Union: जी-7 ने यूक्रेन पर हमला करने के दंड के रूप में रूसी तेल पर प्राइस कैप लगाने का एलान किया है। योजना यह है कि मूल्य सीमा लागू होने के बाद पश्चिमी कंपनियों से ऋण और बीमा की सुविधा तभी मिलेगी, जब कोई देश तेल तय सीमा कीमत तक पर ही खरीद रहा हो...
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रूस के कच्चे तेल पर प्राइस कैप (मूल्य सीमा) लगाने के मसले पर यूरोपियन यूनियन (ईयू) में तीखे मतभेद पैदा हो गए हैं। इस सवाल पर बुधवार को ईयू की कार्यकारी संस्था- यूरोपियन कमीशन की हुई बैठक में विभिन्न देशों के राजनयिकों के बीच जुबानी झड़पें हुईं। धनी देशों के समूह जी-7 ने अगले पांच दिसंबर से अंतरराष्ट्रीय बाजार में रूसी तेल पर मूल्य सीमा लगाने का प्रस्ताव रखा है। ईयू में जी-7 के उसी प्रस्ताव पर चर्चा हो रही थी।
ईयू की बैठक में कुछ राजनयिकों ने 70 रुपये प्रति बैरल की मूल्य सीमा लगाने की बात कही। अगर ये सीमा तय हुई, तो इससे अधिक दाम पर रूसी तेल की खरीदारी पर रोक लग जाएगी। लेकिन ईयू में इस बारे में फैसला तभी हो सकता है, जब इसके सभी 27 सदस्य देश इस पर सहमत हों। जी-7 ने यूक्रेन पर हमला करने के दंड के रूप में रूसी तेल पर प्राइस कैप लगाने का एलान किया है। योजना यह है कि मूल्य सीमा लागू होने के बाद पश्चिमी कंपनियों से ऋण और बीमा की सुविधा तभी मिलेगी, जब कोई देश तेल तय सीमा कीमत तक पर ही खरीद रहा हो।
समझा जाता है कि इस बारे में ईयू जो कीमत तय करेगा, जी-7 देश उसे स्वीकार कर लेंगे। वैसे इस मूल्य सीमा को जी-7 और ईयू के बाहर के सभी देश स्वीकार करेंगे, इस पर शक है। यूक्रेन पर हमले के बाद भारत और चीन जैसे देशों ने रूस से तेल का आयात बढ़ा दिया है। इन देशों के मूल्य सीमा पर राजी होने की संभावना कम मानी जा रही है।
अमेरिकी अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के मुताबिक ईयू के भीतर भी इस मुद्दे पर गंभीर मतभेद उभर गए हैं। दक्षिणी यूरोप के देशों को अंदेशा है कि इस कदम का उनके समुद्री कारोबार पर खराब असर होगा। हंगरी तो इस योजना का खुल कर विरोध कर चुका है। यूरोपियन कमीशन की बैठक में कुछ देशों ने 65 से 70 डॉलर के बीच मूल्य सीमा तय करने की वकालत की। लेकिन पोलैंड और बाल्टिक देशों ने इसे 20 से 40 डॉलर रखने का सुझाव दिया, ताकि रूस को अधिक नुकसान हो। बुधवार की बैठक में पोलैंड के राजदूत ने तो साफ कह दिया कि अगर 70 डॉलर जैसी ऊंची मूल्य सीमा तय की गई, तो उनका देश उस पर दस्तखत नहीं करेगा।
रूस यह साफ कह चुका है कि अगर किसी प्रकार की मूल्य सीमा लगाई गई, तो वह तेल का निर्यात बिल्कुल रोक देगा। विश्लेषकों के मुताबिक अगर रूस ने ऐसा कदम उठाया, तो उससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की महंगाई तेजी से बढ़ेगी। इसका अंदेशा अमेरिका को भी है। अमेरिका की वित्त मंत्री जेनेट येलेन ने कुछ दिन पहले एक मीडिया इंटरव्यू में कहा था कि अगर तेल की कीमतें बढ़ीं, तो अमेरिका अपने स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व से और अधिक तेल बेचने का फैसला करेगा।
वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक बुधवार को इस मुद्दे पर ईयू में जो गतिरोध दिखा, वह इस मसले पर पहले से जारी मतभेदों का नतीजा है। दरअसल, कई यूरोपीय देश अब ऐसा कदम उठाने के पक्ष में नहीं हैं, जिससे उनका ऊर्जा संकट और बढ़े।