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इंसान के आसमान में उड़ने की तमन्ना

Tue, 03 May 2016 03:00 PM IST
डेविड रॉबसन
डेविड रॉबसन Updated Tue, 03 May 2016 03:00 PM IST
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victorians who flew as high as jets
आसमान में उड़ने की तमन्ना - फोटो : BBC

आसमान में उड़ने की तमन्ना इंसान में हमेशा से रही है। आज हज़ारों विमान, बहुत से रॉकेट और हॉट एयर बलून की मदद से लाखों लोग रोजाना आसमान की सैर करते हैं।, लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था। आज से डेढ़-दो सौ साल पहले न विमान थे, न रॉकेट। बिना इनके आसमान की सैर करने का ख़्वाब, ख़्वाब ही होता, अगर कुछ लोगों के हौसले आसमान जितने ऊंचे न होते। आज ऐसे ही दो लोगों की दास्तान, जिन्हें आसमान में उड़ना, बादलों के बीच सैर करना बेहद पसंद था। इनके नाम थे, जेम्स ग्लैशर और हेनरी कॉक्सवेल। दोनों ने मिलकर उन्नीसवीं सदी में आसमान में बहुत सी उड़ानें भरीं। इनकी मदद से इंसान के काम आने वाली जानकारियां इकट्ठीं की गईं। इसने मानवता का बहुत भला किया। अगर इनके ख़्वाब आसमान जितने ऊंचे न होते, तो आज हम उनका क़िस्सा सुनने-सुनाने न बैठते। इनकी तमाम उड़ानों में से आज हम एक ख़ास उड़ान का ज़िक्र करेंगे, जिसमें जेम्स और हेनरी, आसमान में 11 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचने में कामयाब रहे थे। जेम्स ग्लैशर ने अपनी डायरी में इसका मज़ेदार तरीक़े से ज़िक्र किया है। जेम्स ने लिखा कि उनके साथ उड़ान पर गए छह कबूतरों में से पांच को इतनी ऊंचाई रास नहीं आई थी और वो मर गए थे। जेम्स ने लिखा, "एक कबूतर को तीन मील की ऊंचाई से फेंका गया। जब इसने अपने पंख फैलाए, तो वो काग़ज़ के एक टुकड़े की तरह ज़मीन की तरफ़ गिर पड़ा। दूसरे कबूतर को चार मील की ऊंचाई से फेंका गया और वो बहुत तेज़ रफ़्तार से धरती की तरफ़ उड़ चला। वो गोल-गोल घूमते हुए धरती पर गिर रहा था। तीसरे को चार-पांच मील की ऊंचाई से फेंका गया तो, ये एक पत्थर की तरह ज़मीन पर जा गिरा"।

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http://ichef-1.bbci.co.uk/news/ws/624/amz/worldservice/live/assets/images/2016/05/01/160501180101_balloon_glaisher_continued_to_be_inspired_by_teams_across_the_channel_624x351_getty.jpg
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यानि जब जेम्स और हेनरी धरती से पांच मील की ऊंचाई पर थे, तब जो कबूतर वो ले गए थे, उनमें से कुछ मर चुके थे। उनके लिए धरती से इतनी ऊंचाई पर जीना संभव नहीं रहा था। जब जेम्स अपने ये तजुर्बे नोट कर रहे थे, तब उनकी ख़ुद की हालत ख़राब हो रही थी। उन्हें ऊंचाई से परेशानी होने लगी थी, उनकी बांह सुन्न हो चुकी थी। जब उन्होंने अपने साथी हेनरी को पुकारना चाहा, तो आवाज़ जैसे उनके मुंह से निकलते ही जम गई...उनका सिर डोल रहा था। जेम्स को लगा कि वो मरने वाले हैं। उन्होंने लिखा, "अंधेरे ने मुझे घेर लिया था, मुझे लग रहा था कि अब मुझे मौत के सिवा कोई तजुर्बा नहीं होगा। हां, हम तभी बच सकते हैं, जब हम तेज़ी से धरती की तरफ़ लौटें"। हमारे लिए राहत की बात रही कि जेम्स और हेनरी दोनों ही उतनी ऊंचाई से सही सलामत धरती पर लौट आए।
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अगर ऐसा नहीं होता तो उतनी ऊंचाई पर पहुंचकर उनकी मौत तय थी।  उड़ान के इतिहास की तमाम घटनाओं में से ये सबसे अहम है। शायद आगे चलकर जेम्स और हेनरी के इसी हौसले की बुनियाद पर इंसान ने अंतरिक्ष में छलांग लगाई। जेम्स ग्लेशियर युवावस्था से ही आसमान में उड़ने की तमन्ना रखते थे, उन्होंने इसी को अपना करियर भी बना लिया। वो ग़ुब्बारे की मदद से आसमान की सैर करते थे, पहाड़ों की ऊंचाई नापते थे। बादलों के बीच सैर करना उन्हें बहुत पसंद था।  उन्होंने लिखा है, "मुझे आसमान में काफ़ी वक़्त बिताना पड़ता था। तब मैं आसमान की रंगत की वजह समझने की कोशिश करता था। बादल कैसे बनते हैं, इस सवाल का जवाब जानने की कोशिश करता था और बर्फ़ कैसे जम जाती है, ये पता लगाने की कोशिश करता था"।

उनकी ये दिलचस्पी तब और बढ़ गई, जब वो कैम्ब्रिज और ग्रीनविच की वेधशालाओं से जुड़ गए। उस वक़्त तक ग़ुब्बारों की मदद से आसमान की उड़ान का चलन बढ़ चला था। पहली बार ले फ्रेरे रॉबर्ट्स भाइयों ने हाइड्रोजन गैस से भरे ग़ुब्बारे की मदद से आसमान में उड़ान भरी थी। यह एक दिसंबर 1783 की बात है और क़रीब अस्सी साल बाद, ग्लैशर के दौर में हाइड्रोजन और हीलियम गैसों की मदद से उड़ान भरने वाले ग़ुब्बारों की तादाद में इज़ाफ़ा हो चुका था। ब्रिटिश बैलून म्यूज़ियम के जॉन बेकर उस दौर के बारे में बताते हैं कि तब ग्लैशर जैसे वैज्ञानिक ग़ुब्बारों में हाइड्रोजन भरकर, उससे एक बड़ी टोकरी जोड़कर आसमान की सैर के लिए निकलते थे। ऊपर उठने के लिए वो अपनी टोकरी में भरे बालू का कुछ हिस्सा फेंकते थे। इसी तरह धरती पर लौटते वक़्त, वो अपने गुब्बारे से थोड़ी गैस निकालते थे। साथ ही धरती के क़रीब पहुंचकर वो एक लंगर किसी पेड़ या झाड़ियों से फंसाकर रुकने की कोशिश करते थे। ताकि ज़मीन पर घिसटना ना पड़े। उड़ान भरने वाले ज़्यादातर लोगों का ज़ोर धरती पर लौटने पर होता था। वहीं, ग्लैशर जैसे लोग आसमान में ज़्यादा से ज़्यादा ऊंचाई तक पहुंचना चाहते थे। अपनी उड़ानों के लिए पैसा जुटाने के लिए जेम्स ग्लैशर ने ब्रिटिश एसोसिएशन ऑफ़ एडवांसमेंट ऑफ़ साइंस को मना लिया। फिर उन्होंने ग़ुब्बारों के विशेषज्ञ हेनरी कॉक्सवेल को अपने मिशन में साझीदार बना लिया। दोनों ने मिलकर, आसमान में उड़ान भरने और धरती की फ़िज़ा समझने की कोशिश करने का फ़ैसला किया।

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हेनरी और जेम्स की पहली उड़ान 17 जुलाई 1862 में हुई थी। दोनों ने वॉल्वरहैम्पटन नाम की जगह से सुबह 9 बजकर 43 मिनट पर उड़ान भरी थी। बारह मिनट के भीतर ही वो बादलों से हाय-हैलो कर रहे थे और धूप की वजह से आसमान एकदम साफ़ नीला चमक रहा था। उनकी इस उड़ान के लिए ग़ुब्बारे में 2500 क्यूबिक मीटर गैस भरी गई थी। आज ग़ुब्बारे से उड़ना बेहद सस्ता और आसान है। मगर डेढ़ सौ साल पहले यह एक काम नहीं, बल्कि कारनामा था। उस वक़्त जेम्स और हेनरी उन मुट्ठी भर लोगों में शामिल थे, जिनके पास ये शौक़ पूरा करनी की कूवत थी, जो इतनी ऊंचाई पर जाकर दुनिया देख सकते थे। इतनी ऊंचाई पर जाकर जेम्स, रूमानी हो जाते थे, वो क़ुदरत की ख़ूबसूरती को कविताओं की तरह बयां करते थे। उनकी बाद की कुछ उड़ानें लंदन के क्रिस्टल पैलेस से हुईं, जिनमें उन्होंने लंदन का नज़ारा लिया। जेम्स ने लिखा कि बिग बेन के डायल आसमान से दो धुंधले चांद जैसे नज़र आते थे और लंदन की कमर्शियल रोड, आकाशगंगा की तरह टिमटिमाती थी, जिसमें सैकड़ों तारे बिखरे नज़र आते थे। मगर, जेम्स ग्लैशर और हेनरी कॉक्सवेल ने सबसे ऊंचाई पर जाने वाली उड़ान भरी 5 सितंबर 1862 को। ये उड़ान भी वॉल्वरहैम्पटन से शुरू हुई थी। जेम्स ने लिखा है, "उड़ान शुरू होते ही जैसे हम सूरज की रौशनी की बाढ़ में डूब गए। नीला आकाश बेहद ख़ुबसूरत लग रहा था, वहां एक भी बादल नहीं थे। नीचे बर्फ़ से ढंके पहाड़ों की लंबी कतार थी"।

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लेकिन, जैसे ही वो पांच मील की ऊंचाई पर पहुंचे, तापमान माइनस बीस डिग्री सेल्सियस तक गिर गया और जेम्स को देखने में परेशानी होने लगी। उन्होंने लिखा है, "मेरी नज़र इतनी कमज़ोर हो गई थी कि थर्मामीटर में उठता गिरता पारा भी नहीं दिखाई दे रहा था, न ही दूसरे यंत्र नज़र आ रहे थे"। उन्हें तुरंत नीचे आ जाना चाहिए था, लेकिन इसके लिए गुब्बारे का जो वॉल्व खोलकर गैस निकालनी थी, उसने काम करना बंद कर दिया। हेनरी को रस्सी की मदद से ऊपर जाकर, अपने हाथों से उसे खोलना पड़ा। जब हेनरी इसके लिए चढ़ रहे थे, तो जेम्स बेहोशी की हालत में जा रहे थे। ऊपर पहुंचकर हेनरी पर भी बेहोशी छाने लगी थी और उन्होंने बड़ी मुश्क़िल से रस्सी पकड़कर ख़ुद को गिरने से बचाया। उन्होंने दांत से रस्सी को पकड़ा और अपने सिर को कई बार झटककर, ख़ुद को संभाला। इस बीच जेम्स ग्लैशर भी नीम बेहोशी से बाहर आए और उन्होंने हेनरी को कुछ बड़बड़ाते सुना। मगर इस हालत में भी उन्होंने फौरन क़लम उठाई और अपने तजुर्बे नोट करने शुरू कर दिए।

यह सारा क़िस्सा जेम्स ने अपनी क़िताब, 'ट्रैवेल्स इन द एयर' में बयां किया है। वो दोनों जिन 6 कबूतरों को अपने साथ ले गए थे, उनमें से सिर्फ़ एक ज़िंदा बचा और नीचे आने पर भी वो पंद्रह मिनट तक जेम्स के हाथों से लिपटा रहा। हेनरी और जेम्स के मुताबिक़, उस दिन वो 37 हज़ार फुट या सात मील (क़रीब 11 किलोमीटर) की ऊंचाई तक गए थे। उस वक़्त और उसके बाद भी काफ़ी समय तक ये सबसे ऊंची उड़ान थी। इतनी ऊंचाई पर अपनी बेहोशी की वजह न तो जेम्स समझ पाए और न ही हेनरी। अभी हाल में आए एक रिसर्च पेपर के मुताबिक़ दोनों अचानक ही इतनी ऊंचाई पर जा पहुंचे थे और ऊंचाई में अचानक हवा का दबाव बदल गया था। इसी वजह से दोनों पर बेहोशी छाने लगी थी, ऐेसी हालत में उल्टी, लकवा मारने और बेहोश हो जाने का एहसास होता है। इसके बाद जेम्स ग्लैशर ने और 21 उड़ानें भरीं, जिसमें उन्होंने मौसम में आने वाले बदलाव को समझने की कोशिश की, कैसे बारिश की बूंदें बनती हैं, कैसे गिरते वक़्त उनका वज़न बढ़ता जाता है।

उन्होंने ये भी समझा कि ऊंचाई पर जाते ही हवा की रफ़्तार तेज़ हो जाती है। जबकि आज इस तरह की जानाकारियों के लिए सिर्फ़ गुब्बारों को अंतरिक्ष में भेजा जाता है, उसमें इंसान सवार होकर नहीं जाते। हालांकि ग़ुब्बारों की मदद से अंतरिक्ष की उड़ान भरने वाले अभी भी कम नहीं हैं। हाल ही में फेलिक्स बॉमगार्टनर ने गुब्बारे से 39 किलोमीटर की ऊंचाई पर जाकर छलांग लगाई थी। बहुत सी कंपनियां, गुब्बारे में अंतरिक्ष की सैर का सपना दिखा रही हैं। नासा के एक वैज्ञानिक की मदद से एक स्पेनिश कंपनी ने गुब्बारे से अंतरिक्ष की सैर का पैकेज ऑफ़र किया है। हालांकि वर्जिन गैलेक्टिक की प्रस्तावित उड़ान के मुक़ाबले, ये ऊंचाई काफ़ी कम है। मगर इतनी ऊंचाई पर जाकर धरती को निहारना, अलग ही अनुभव है। जेम्स ग्लैशर को तो ये आइडिया बहुत पसंद आता, ऊपर जाकर आप तमाम शोर से दूर, शांति ही शांति का एहसास करते हैं।

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