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बेपरदा औरतों की पर्दानशीं होने की चाहत

Fri, 01 Feb 2013 06:40 PM IST
बीबीसी हिंदी/कैट्रीन नाइ
बीबीसी हिंदी/कैट्रीन नाइ Updated Fri, 01 Feb 2013 06:40 PM IST
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some women want wear hijab

इंग्लैंड में कुछ संजीदा गैर-मुस्लिम औरतें एक फरवरी को दुनिया भर में पहली बार मनाए जा रहे ‘वर्ल्ड हिजाब डे’ के मौके पर यह समझने की कोशिश में हैं कि पारंपरिक रूप से पहने जाने वाले हिजाब के साये से दुनिया कैसी लगती है।

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एक सवाल यह भी है कि क्या ऐसी कोशिशें धार्मिक सहिष्णुता और समझदारी की भावना को बढ़ा सकती हैं। हिजाब या बुर्के को लेकर सबके अपने-अपने अनुभव हैं।

इंग्लैंड के नॉर्विक की जेस रोड्स महज 21 साल की हैं। वह हमेशा से सिर पर स्कार्फ पहनना चाहती थीं लेकिन मुसलमान न होने की वजह से यह मुश्किल था। लेकिन जब एक दोस्त ने उन्हें हिजाब पहनने का मौका दिया तो जेस ने कोशिश की।
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अनूठा प्रयोग
अपने तजुर्बे के बारे में जेस कहती हैं, “क्योंकि मैं बहुत हुनरमंद नहीं हूं पर मैंने जो पहन रखा है, आप उसे हिजाब कह सकते हैं और उसे अपने सिर के ऊपर रख सकते हैं। मैंने पाया कि इसे कई तरीकों से पहना जा सकता है।”
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जेस ने अपनी दोस्त के बारे में कहा, “उसने मुझे भरोसा दिलाया कि हिजाब पहनने के लिए मुसलमान होना जरूरी नहीं है। बेशक इसे इस्लाम से जोड़ा जाता हो लेकिन यह शर्म और लिहाज की निशानी भर है। मुझे लगा कि इसे क्यों न पहनूं।”

जेस उन सैंकड़ों गैर-मुस्लिम महिलाओं में से एक हैं जो एक फरवरी को दुनिया भर में पहली बार मनाए जा रहे ‘वर्ल्ड हिजाब डे’ के मौके पर हिजाब पहनेंगी।

इस मुहिम को चलाने वाली न्यूयॉर्क की नजमा खान ने सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स पर लोगों ने खूब सराहा है। 50 से भी ज्यादा देशों की मुस्लिम और गैरमुस्लिम महिलाओं ने इस आयोजन में अपनी दिलचस्पी जाहिर की है।

लोगों की राय
बहुत से लोग यह मानते हैं कि हिजाब दमन और भेदभाव का प्रतीक है। पश्चिम में इस्लाम को लेकर चलने वाली बहसों में हिजाब को अक्सर निशाना बनाया जाता रहा है।

वर्ल्ड हिजाब डे इन्हीं विवादों का जवाब देने के लिए आयोजित किया जा रहा है। यह गैरमुस्लिम औरतों को और यहां तक कि कभी कभार हिजाब पहने वाली महिलाओं को भी इसे पहनने के लिए प्रोत्साहित करता है ताकि वे इस अनुभव को महसूस कर सकें।

इसे धार्मिक समझदारी बढ़ाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है।

बांग्लादेश से महज 11 साल की उम्र में न्यूयॉर्क आ बसने वाली नजमा खान कहती हैं, “ब्रॉन्क्स में बड़े होने के दौरान मैंने कई बार अपने हिजाब की वजह से भेद-भाव का सामना किया”।

नजमा अपने स्कूल में हिजाब पहनने वाली इकलौती लड़की थीं और हिजाबी नाम से पुकारी जाती थीं।

आयोजकों का इरादा
नजमा कहती हैं, “मिडिल स्कूल में मुझे निंजा या बैटमैन कहा जाता था। सितंबर 11 के बाद जब मैं कॉलेज पहुंची तो वे मुझे ओसामा बिन लादेन या आतंकवादी कहने लगे। यह बहुत तकलीफदेह था।”

उन्होंने कहा, “इस भेद-भाव को खत्म करने का मुझे यही जरिया लगा कि मैं अपनी साथी बहनों को इसे पहनने के लिए कहूं ताकि वे खुद महसूस कर सकें।” नजमा को इस बात का कोई अंदाजा नहीं था कि उनके विचार को दुनिया भर में इतनी सराहना मिलेगी।

सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स पर उनके ग्रुप का साहित्य 22 भाषाओं में उपलब्ध है। इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, इंडिया, पाकिस्तान, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों से लोग नजमा के संपर्क में आए।

जेस रोड्स भी सोशल नेटवर्किंग के जरिए ही विचार से जुड़ी हैं। ऑस्ट्रेलिया में रह रही जेस की दोस्त विद्यान अल उबुदी ने उन्हें इसके बारे में बताया था।

दमन का प्रतीक
महीने भर तक हिजाब पहनने के जेस के फैसले पर उनके अभिभावकों ने हैरत जाहिर किया था। जेस ने बताया, “वे फिक्रमंद थे कि उदारता की कमी की वजह से लोग मुझ पर हमला कर सकते हैं।”

लोगों की प्रतिक्रिया को लेकर रोड्स भी शुरुआत में हिचक रही थीं लेकिन आठ दिन तक इसे आजमाने के बाद उन्होंने सकारात्मक बदलाव महसूस किया।

वह कहती हैं, “मैं बता नहीं सकती कि लोग किस तरह से मदद करते हैं, खासकर दुकानों में।” वर्ल्ड हिजाब डे के आयोजकों का कहना है कि वे हिजाब को दमन का प्रतीक करार दिए जाने से आहत हैं।


वे इस बात से भी इनकार करती हैं कि औरतें घर के पुरुषों के दबाव में ही हिजाब पहनती हैं। यह दिन इसलिए मनाया जा रहा है ताकि लोग यह समझ सकें कि कोई अपनी खुशी से भी हिजाब पहन सकता है।

जेस कहती हैं कि हिजाब उन्होंने खुद चुना है और वे इसे जारी रखेंगी।

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