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द्वितीय विश्व युद्ध के “भगोड़ों” को माफ़ी
Updated Thu, 09 May 2013 07:45 AM IST
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आयरलैंड के विश्वयुद्ध स्मारक उद्यान के पत्थरों में दोनों विश्वयुद्ध की तारीखें खुदी हुई हैं। ये बात अलग है कि आयरलैंड 1939 और 1945 के दोनों विश्वयुद्ध में उदासीन था।
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हालांकि द्वितीय विश्वयुद्ध के वक्त इसके हज़ारों सैनिक देश छोड़कर चले गए थे और ब्रिटिश सेना में शामिल हो गए थे।
बाद में उन्हें 'भगोड़ा' कहा गया। हालांकि जब वो नाज़ीयों को हराकर वापस लौटे तो लोगों ने उनका स्वागत हीरो की तरह किया लेकिन वो 'भगोड़े' बने रहे।
पैडी रीड के घर में उनके पिता की वो तस्वीरें आज भी हैं जब उनके पिता पैडी सीनियर बर्मा में अंग्रेज़ सैनिकों के साथ मोर्चे पर थे। कई सालों तक वो तस्वीरें अटारी में उपेक्षित पड़ी रही।
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रीड कहते हैं, “मैं ये पक्के तौर पर कह सकता हूं कि जब मेरे पिता लौटकर आए थे तो उन्हें शर्म नहीं महसूस हुई होगी। लेकिन उन्हें ऐसा महसूस कराया गया। मुझे बचपन में बताया गया था कि मेरे पिता 'भगोड़े' थे इसलिए मुझे इसके लिए शर्मिंदा होना चाहिए।”
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संसद में माफ़ी पर चर्चा
आयरलैंड के भगोड़ों को वहां की सैन्य अदालत ने बिना छुट्टी लिए ही गायब हो जाने का दोषी पाया था।
जब वो वापस लौटकर आयरलैंड आए तो उन्हें सज़ा भी सुनाई गई। उन लोगों के सरकारी नौकरी पाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। उनके पेंशन के अधिकार छीन लिए गए और उनके साथ भेदभाव किया गया।
पिछले साल आयरलैंड सरकार ने इस व्यवहार के लोगों से माफ़ी मांगी थी।
इस बारे में कानून भी लाया जा रहा है।
ये कानून उन 5000 सैनिकों को माफ़ी और सज़ा के खिलाफ़ सुरक्षा प्रदान करेगा जो विश्वयुद्ध में मित्र देशों के साथ लड़े थे।
कम होगा कलंक
समाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अब मुट्ठी भर 'भगोड़े' ही जिंदा हैं। लेकिन ये उनकी उस लंबी लड़ाई की जीत है जो सैन्य सेवा की मान्यता के लिए चलाई गई थी।
आयरिश शोल्डर्स पार्डन्स कैम्पेन के पीटर मुलवैनी कहते हैं,“राजनेताओं के लिए ये एक ऐतिहासिक मसला हो सकता है लेकिन परिवार वालों के लिए ऐसा नहीं है। ये ऐसी सज़ा थी जिसके वो हकदार नहीं थे। ये माफ़ी उनके कष्ट को कम करेगी।”
निश्चित रूप से इन सिपाहियों को नाज़ी सेना के खिलाफ लडा़ई में हिस्सा लेने का गर्व है। हालांकि 40 के दशक में एक सेना को छोड़कर दूसरी सेना में शामिल होना विवादास्पद माना जाता था।
आंशिक रूप से आजाद आयरलैंड और ब्रिटेन के बीच के संबंध तनावपूर्ण थे। यही वजह है कि लोग नाराज थे। कई लोगों का मानना था कि इन लोगों को घर में होना चाहिए था।
अपने घर में पैडी के पास उस सैनिक का पत्र हैं जो विश्व युद्ध के दौरान आयरिश सेना में रह चुका था। पत्र में उस सैन्य अधिकारी ने 'भगोड़ों' के साथ किए जाने वाले व्यवहार की आलोचना की है। हालांकि वो ये भी मानते हैं कि आयरलैंड की सेना के भीतर उन लोगों के फ़ैसले को लेकर असंतोष था।
उन लोगों का मानना था कि हर सैनिक को उस वक्त आयरलैंड में होना चाहिए ताकि आक्रमण की स्थिति में देश की रक्षा की जा सके।
बुरे बर्ताव का असर
जो भी हो पूर्व सैनिकों के साथ जो बर्ताव किया गया उसका असर शांति के समय में उनके परिवार पर पड़ा।
दशकों पहले हुए उस बुरे बर्ताव को याद करने के बाद रीड के चेहरे पर उभर आई परेशानी साफ़ तौर से जाहिर हो जाती है।
वो कहते हैं, “मेरे पिता को नौकरी ही नहीं मिल रहा थी।मेरी मां ही जीवन चलाने का तनाव झेल रही थी। दूसरों की गाली खाते हुए, बिना पैसों के अपने बच्चों को पालना बेहद कठिन था।”
वक्त ने आयरलैंड के भगोडे़ लोगों के बारे में एक नया नजरिया पेश किया है। उनके परिवार वालों को उम्मीद है कि इस माफ़ी का मतलब ये होगा कि भविष्य में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाएगा।