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बारूदी सुरंगों से लोहा ले रहे 'बहादुर' चूहे
बीबीसी हिंदी/जोनाथन कैलन
Updated Tue, 26 Feb 2013 06:05 PM IST
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भारत के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों समेत दुनिया भर में अशांत कहे जाने वाले इलाकों में बारूदी सुरंगों के इस्तेमाल आम बात बन गई है।
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सरकारी एजेंसियों के लिए इन बारूदी सुरंगों से निपटना बड़ा सरदर्द साबित हुआ है लेकिन कुछ 'बहादुर' चूहे इन बारूदी सुरंगों की पहचान करने और इन्हें हटाने में इंसान की मदद कर रहे हैं !
बेल्जियम के एक गैर सरकारी संगठन अपोपो ने इन चूहों का पहली बार इस्तेमाल किया और इन्हें नाम दिया 'हीरो माइस।'
मुलायम रोयें वाले इन बहादुर चूहों को जब पहली बार मोजम्बीक के एक बारूदी सुरंग वाले मैदान में उतारा गया था तो वहां मौजूद सरकारी अफसरों को इस प्रयोग के बारे में शंका थी।
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बारूदी सुरगें खोजने में माहिर चूहे
मोजम्बीक में बारूदी सुरंगों को हटाने वाली सरकारी एजेंसी के निदेशक अलबर्तो अगस्तो ने तो इस बारे में खासा मजाक भी किया।
अलबर्टो ने कहा, “मोजम्बीक में हम चूहे खाते हैं। इन्हें बारूदी सुरंगों के बीच काम करते हुए देखना अचरज भरा अनुभव है। हम उन्हें पकाने की सोच रहे थे।”
न्यूयॉर्क की नालियों में पलने वाले चूहों से बड़े आकार वाले ये 'बहादुर' अपने मालिकों को बारूदी सुरंगों की पहचान करके बताते हैं। फिर सुरक्षाकर्मी इन्हें हटाने में जुट जाते हैं।
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चूहों की मदद लेने वाले इंसानों को इनके इशारे समझने में कोई परेशानी नहीं होती है।
अगस्तो इन बहादुर चूहों से बेहद प्रभावित हैं। वो कहते हैं, “ये सामान्य चूहे नहीं हैं। ये बेहद खास चूहे हैं।” इन बहादुर चूहों को आधिकारिक रूप से माइन डिटेक्शन रैट्स का नाम दिया गया है।
जानलेवा बारूदी सुरंगें
गैर सरकारी संगठन अपोपो ने इन बहादुर चूहों को प्रशिक्षण दिया है। अपोपो बारूदी सुरंगों को हटाने के लिए नई तकनीकों के विकास पर काम करता है।
बारूदी सुरंगों को दुनिया के सबसे खतरनाक हथियारों में गिना जाता है और खासकर उन देशों में जहां अशांति का इतिहास रहा हो।
युद्ध के ये हथियार दशकों तक जमीन के भीतर दबे रहे जाते हैं और वक्त के साथ-साथ इनकी मारक क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता है।
रेड क्रॉस की एक समिति की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में हर महीने 800 लोग मारे जाते हैं और 1200 लोग अपंग हो जाते हैं। इनमें ज्यादातर औरतें, बच्चे और बुजुर्ग लोग होते हैं।