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ये मस्जिद करेगी समलैंगिकों का भी स्वागत
Updated Thu, 13 Jun 2013 01:55 PM IST
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उत्तरी लंदन में कामकाजी दिनों की ये एक ख़ुशनुमा शाम है। धूप अब सिमटने वाली है और करीब दो दर्जन ब्रितानी मुसलमान नियमित अंतराल पर होने वाली बैठक के लिए जमा हो रहे हैं।
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इस बैठक का आयोजन एक नए समूह इंक्लूसिव मॉस्क इनिशिएटिव (आईएमआई) की ओर से होता है।
इस समूह का गठन बीते साल नवंबर में हुआ और इसका उद्देश्य साफ है- ये लोग मस्जिद के दरवाजे को हर किसी के लिए खोलने के हिमायती हैं। मसलन समलैंगिक मुसलमान, महिला और विकलांग- सभी के लिए।
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इस संस्था के ब्रितानी संयोजक तमसिला तौक़ीर कहती हैं, “हम मुसलमानों को एक वैकल्पिक जगह मुहैया कराना चाहते हैं जहां वे अपनी प्रार्थना कर सकते हैं, एक दूसरे से मिल सकते हैं।
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हम किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करेंगे। वे चाहे सुन्नी हों या फिर शिया। आम हों या समलैंगिक हों या परिवार वाले हों या फिर बिना परिवार वाले।”
परंपरागत समाज को चुनौती
हालांकि इस आंदोलन को विवादों का सामना करना पड़ सकता है। ब्रिटेन में करीब बीस लाख मुसलमान रहते हैं। ये समुदाय काफी विविधता भरा है और कइयों को ये आंदोलन इस्लाम के लिए चुनौती लग रहा है।
आईएमआई का कहना है कि महिलाओं को नमाज अदा करने की इजाजत देने के अलावा संस्था उन्हें प्रार्थना को संचालित करने और पुरुषों के साथ बराबरी से नमाज अदा करने का अवसर देगी। इससे भी कई मुसलमानों में नाराजगी है।
इमाम अदनान राशिद लंदन स्थित इस्लामिक थिंक टैंक द हिट्टन इंस्टीट्यूट से संबंधित हैं। वे कहते हैं कि धर्म से जुड़े नियम पहले से ही तय हैं।
राशिद कहते हैं, “इस्लाम से जुड़े परंपरागत मूल्य बेहद स्पष्ट हैं। मुसलमान सदियों से चली आ रही मान्यताओं में विश्वास रखते हैं और वे बदलाव को नहीं मानेंगे। कुरान बदलने वाला नहीं हैं, धार्मिक मान्यताएं नहीं बदलेंगी।
मुसलमानों की सोच और उनकी जीवनशैली नहीं बदलेगी। इसलिए इस मस्जि़द की क्या जरूरत है, मैं नहीं जानता।”
कई मस्जिदों में महिलाओं को शुक्रवार की नमाज में शामिल होने की इजाज़त नहीं हैं क्योंकि वहां महिलाओं के लिए अलग से कमरे नहीं हैं या फिर पर्देदारी की व्यवस्था मौजूद नहीं है।
'दूसरी मस्जिदों पर पड़ेगा असर'
बीबीसी ने कई इस्लामी समूहों से संपर्क किया। ब्रिटेन में इस्लामी संस्था के तौर पर जाने जाने वाले दो सबसे बड़े समूह द मुस्लिम काउंसिल ऑफ़ ब्रिटेन (एमसीबी) और द मॉस्क एंड इमाम नेशनल एडवाज़री बोर्ड (एमआईएनएबी) ने इस मसले पर प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया।
उत्तरी इंग्लैंड में स्थित लैंकाशर काउंसिल ऑफ़ मॉस्क करीब 60 मस्जिदों का प्रतिनिधित्व करता है। उसने भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इस नए आंदोलन के बारे में मुसलमानों में मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।
लैंकाशर के ब्लैकबर्न स्थित वैहली रेंज में बने एक नए मॉस्क के बाहर मौजूद मुसलमानों में कइयों ने इस आंदोलन से असहमति जताई।
बीस-पच्चीस साल के बेरोज़गार युवक मोहम्मद शाहिद ने कहा, “मेरे ख्याल से पुरुषों और महिलाओं का एक साथ मस्जिद में जाना उचित नहीं है।
पुरुषों का ध्यान इससे भंग होगा। कुछ पुरुष महिलाओं के प्रति अच्छा व्यवहार नहीं रखते, ऐसे में महिलाओं को घर पर ही प्रार्थना करना चाहिए।”
उनके दोस्त शहजाद ख़ान कहते हैं, “मेरे ख्याल से समलैंगिकों को मस्जिद में प्रवेश नहीं देना चाहिए। वे मुसलमान नहीं होते, ऐसे में वे नमाज कैसे पढ़ सकते हैं?”
करीब तीस साल के स्नातक अली नूर थोड़े ज्यादा वस्तुपरकता दिखाते हुए कहते हैं, “मेरे ख्याल से ये विचार तो अच्छा है। इससे विकलांगों को बराबरी के मौके मिलेंगे। ये काफी पहले होना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया है।”
अब हम लौटते हैं उत्तरी लंदन के उस बेसमेंट स्थित कमरे में जहां एक युवती के संचालन में प्रार्थना अभी पूरी हुई है। अब ये लोग इस्लाम और इतनी आलोचना झेल रहे इस आंदोलन से जुड़ने के मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं।
इस प्रार्थना में शामिल कोई भी शख्स अपनी पहचान ज़ाहिर नहीं करना चाहता क्योंकि उसे समुदाय से बहिष्कृत होने का डर है।
एक युवा मुसलमान पुरुष ने कहा, “हमें मस्जिदों के अंदर की पितृसत्तात्मकता से शिकायत है। अगर महिलाओं को मस्जिद में आने की इजाज़त मिलती भी है तो उन्हें कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। उन्हें पुरुषों के साये में ही रहना होता है, इसे ना तो मैं सही मानता हूं और ना ही इस्लामिक।”
'हम अलगाववादी नहीं'
क्या उनका ये आंदोलन कामयाब होगा, आम लोगों को जोड़ पाएगा? ये पूछे जाने पर युवा ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि उनकी संस्था लोगों को रास्ता दिखाएगी।
इस युवा के मुताबिक अगर लोगों को यकीन होगा कि कोई विकल्प मौजूद है तो वे आगे आएंगे। अगर वे इनकी संस्था आईएमआई में नहीं आते हैं तो भी दूसरी मस्जिदों पर दबाव पड़ेगा।
एक मुसलमान छात्र ने कहा, “यहां कोई ऐसा नहीं है जो नियम बनाकर कहे कि आपको ऐसे ही जीना होगा। यह काफी कुछ इस पर निर्भर करता है कि आप तथ्यों को किस तरह समझते हैं और उससे किस नतीजे पर पहुंचते हैं। इसके लिए आपको किसी इमाम और सामुदायिक नेता के पास जाने की जरूरत नहीं है।”
हालांकि इस आंदोलन से अभी कम लोग ही जुड़े हैं। ब्रिटेन में यह उस ग्लोबल नेटवर्क का हिस्सा है जिसकी शाखा श्रीनगर और कुआलालंपुर में भी मौजूद है।
इसके अलावा इनके सहयोगियों का नेटवर्क अमरीका, कनाडा, दक्षिण अफ़्रीका, ऑस्ट्रेलिया और स्वीडन में भी मौजूद है।
इन लोगों का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय मस्जिदों का नेटवर्क बनाना है। तौकीर यह मानती हैं कि उन लोगों का ये कदम कइयों को भड़का सकता है।
वह कहती हैं, “कुछ लोगों की राय में ये विवादास्पद है लेकिन हम लोग सबका स्वागत करना चाहते हैं। हम मुख्यधारा वाले समुदाय को बताना चाहते हैं कि हम अलगाववादी नहीं हैं, बस हम विविधता में रचे बसे लोग हैं।”
राहिला बानो
संवाददाता, बीबीसी एशियन नेटवर्क