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अस्पताल में मोबाइल का इस्तेमाल क्यों ख़तरनाक है?
Updated Tue, 28 May 2013 07:59 AM IST
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जब युवावस्था में मैं वॉलंटियर के तौर पर एक अस्पताल में काम करती थी, तब मैंने देखा था कि किसी मरीज को अपने नाते रिश्तेदारों से बात करने के लिए कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था।
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पे-फोन को उनके बेड के पास बारी-बारी से लाया जाता था और वे चंद मिनटों के लिए ही अपने सगे-संबंधियों से बात कर पाते थे। लेकिन इसके लिए दो-तीन दिनों का इंतजार तो आम बात थी।
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फिर आया मोबाइल फोन। इसके बाद मरीजों के लिए अपने सगे संबंधियों से बात करना मुश्किल नहीं रहा।
लेकिन दुनियाभर के कई अस्पतालों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर पाबंदी है। इस पाबंदी की सबसे बड़ी वजह तो यही है कि अस्पताल प्रबंधन को ये लगता है कि मोबाइल फोनों के इस्तेमाल से महंगे उपकरणों पर खराब असर हो सकता है।
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पाबंदी का उल्लंघन
लेकिन इस पाबंदी का उल्लंघन भी धड़ल्ले से होता है। मरीज तो मरीज यहां तक कि अस्पताल के कर्मचारी भी इस पाबंदी को नहीं मानते।
इस विषय पर 2004 में हुए एक सर्वेक्षण के मुताबिक 64 फ़ीसदी डॉक्टरों ने ये माना था कि वे अस्पताल के बेहद संवेदनशील इलाकों में भी अपना मोबाइल फ़ोन स्विच ऑन रखते हैं।
हालांकि मौजूदा दौर के अस्पताल प्रबंधक मरीज के रिश्तेदारों के लिए कॉरीडोर में मोबाइल फोन के इस्तेमाल की इज़ाजत देने लगे हैं।
कनाडा के क्यूबेक प्रांत के एक अस्पताल ने महज छह महीने पहले मोबाइल फोन के प्रयोग पर लगी पाबंदी हटा दी थी।
उपकरणों पर असर
लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या मोबाइल फोन के इस्तेमाल से अस्पतालों के महंगे उपकरण ख़राब होते हैं?
2006 में जाने-माने महामारी रोगों के विशेषज्ञ मार्टिन मैकी ने अपने शोध पत्र में ये बताया था कि अस्पताल की दूसरी गतिविधियों, ख़ासकर मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल से मरीजों के इलाज पर असर पड़ता है।
मार्टिन मैकी ने इस सिलसिले में यूरोप के आठ देशों के अस्पताल पर अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि हर देश में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर किसी न किसी तौर पर पाबंदी लगी हुई है। फ़्रांस जैसे देश में तो अस्पताल के अंदर मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल के ख़िलाफ़ कानून लाने की भी तैयारी है।
शुरुआत के कुछ अध्ययनों में ये भी पाया गया कि अगर मोबाइल फ़ोन उपकरणों के एक मीटर के दायरे में होता है तो उस पर असर पड़ता है। हालांकि ऐसा अस्पताल के महज एक से चार फ़ीसदी उपकरणों के साथ ही होता है।
साफ है कि ये कोई बहुत डराने वाली संख्या नहीं है, लेकिन अगर इन उपकरणों का इस्तेमाल मरीज की जान बचाने के लिए किया जा रहा हो तो ये मसला बेहद गंभीर हो सकता है।
हालांकि 2007 में हुए शोध तक मोबाइल के चलते किसी मरीज की मौत का मामला सामने नहीं आया था।
अस्पताल के उपकरणों पर मोबाइल फोन के इस्तेमाल से होने वाला असर तीन चीजों पर निर्भर करता है- रेडियो संकेत की तीव्रता पर, रेडियो संकेतों की फ्रीक्वेंसी और इसके दायरे में आने वाले उपकरण की संवेदनशीलता?
जब एक फोन स्वीच ऑन होता है तो उससे रेडियो तरंगें निकलती हैं ताकि वह अपने बेस स्टेशन के संपर्क में रहे और उससे वह फोन कॉल, मोबाइल संदेश, ईमेल और डाटा इत्यादि आ-जा सके।
आईसीयू में इस्तेमाल ख़तरनाक
जब ये तरंगें प्रवाहित होती हैं तो मेडिकल उपकरणों से जुड़े तार उनके लिए एंटीना का काम करने लगते हैं और उससे करंट प्रवाहित होता है। ऐसे में उपकरण के काम करने की क्षमता प्रभावित होती है।
यही वजह है कि आजकल मेडिकल उपकरणों से जुड़ने वाले तारों को यथासंभव छोटा रखने की कोशिश की जाती है।
कुछ अध्ययनों से ये भी जाहिर हुआ कि मोबाइल फोन के इस्तेमाल से इंफ्यूजन पंप काम करना बंद कर देता है।
ऐसा करीब 20 फ़ीसदी चिकित्सीय उपकरणों के साथ हो सकता है, लेकिन इसमें महज 1.2 फ़ीसदी उपकरण ही चिकित्सीय तौर पर अहम होता है।
डेनमार्क में हुए शोध अध्ययन में दूसरे और तीसरे जेनरेशन के क्लिक करें स्मार्ट फोन के इस्तेमाल का 61 मेडिकल उपकरणों पर असर देखा गया और इसमें करीब 43 फ़ीसदी उपकरणों पर मोबाइल फोन की तरंगों का असर दिखा।
इसमें वेंटिलेटर के बंद होने , सिरिंज पंप के बंद होने से लेकर बाहरी पेसमेकर का अपनी जगह से हिल जाना जैसे असर शामिल थे, लेकिन ये सब तब हुआ जब मोबाइल फोन तीन सेंटीमीटर के दायरे में इस्तेमाल हुआ था।
हालांकि इसकी एक वजह ये भी बताई गई कि प्रयोग के दौरान मोबाइल फोन का इस्तेमाल बैटरी के बजाए जेनरेटर से किया गया था।
ब्रिटेन के नेशनल हेल्थ सर्विस की गाइडेंस के मुताबिक अस्पतालों के इंटेंसिव केयर यूनिट में फोन का इस्तेमाल करने पर पाबंदी लगी हुई है क्योंकि डायलिसिस मशीन, वेंटिलेटर, मॉनिटर और डिफाइब्रिलेटर पर मोबाइल फोन की तरंगों का असर पड़ता है।
ग़लती की संभावना बढ़ती है
इसके लिए ये भी कहा जा रहा है कि ऐसे मेडिकल उपकरण बनाए जाने चाहिए जिन पर मोबाइल फोन की तरंगों का कोई असर नहीं पड़े। या फिर अस्पतालों के अंदर मोबाइल फोन के बेस स्टेशन का निर्माण होना चाहिए। लेकिन इन सबके लिए अस्पताल को बहुत ज़्यादा निवेश करना होगा।
अमेरिका के अंदर चार हजार डॉक्टरों के बीच हुए सर्वे में ये पाया गया है कि मोबाइल फोन के चलते चिकित्सकों से गलती होने की आशंका छह गुना तक बढ़ जाती है।
इसके अलावा दूसरी अहम वजहें भी हैं जिसके चलते अस्पताल के अंदर मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई जाती है।
सबसे बड़ी वजह तो यही है कि हमारे मोबाइल फोन काफी गंदे होते हैं और अमूमन हम उसकी साफ-सफाई नहीं करते।
दक्षिण भारत के स्वास्थ्य सेवा के कर्मचारियों के बीच हुए एक सर्वे में ये देखा गया है कि करीब 95 फ़ीसदी कर्मचारियों के मोबाइल फोन बैक्टीरिया से भरे हुए थे।
निजता को ख़तरा
साफ-सफाई के अलावा दूसरी बड़ी वजह प्राइवेसी भी है। आजकल के तमाम मोबाइल फोनों में कैमरे लगे होते हैं, जिससे लोग तस्वीरें लेने से ख़ुद को रोक नहीं पाते।
लास एंजलिस टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक एक अस्पताल के कर्मचारी ने 60 साल के एक शख्स, जिसकी मौत चाकू से गोदे जाने से हुई थी, उसकी तस्वीर लेकर फेसबुक पर डाल दी। इसके चलते अस्पताल प्रबंधन की काफी आलोचना हुई थी।
इन सब वजहों से तो यही लगता है कि अस्पताल के अंदर मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर पाबंदी तो होनी ही चाहिए।
क्लाउडिया हैमंड/हेल्थ चेक शो प्रजेंटर, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस